Saturday, 1 July 2017

जीएसटी अधूरा ज्ञान या फिर दुष्प्रचार

जीएसटी अधूरा ज्ञान या फिर दुष्प्रचार

30 जून 2017  भारतीय इतिहास में 8 नवंबर के बाद एक और ऐतिहासिक तारीख़
यहाँ 8 नवंबर का जिक्र इसलिए किया गया है क्योंकि नोटबंदी काले धन पर प्रहार करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम था  ( वह कदम कितना सफल हुआ यह एक अलग विषय है)
जीएसटी को उसी लक्ष्य को हासिल करने हेतु अगला कदम समझा जा सकता है।
क्योंकि नोटबंदी के बाद सरकार के पास सबसे बड़ी चुनौती काले धन को दोबारा नहीं पनपने देने की है।
इस बात को समझने के लिए पहले यह समझना होगा कि काला धन बनता कैसे है।
तो काला धन दो तरह का होता है एक वो जो भ्रष्टाचार के द्वारा सरकारी अधिकारियों द्वारा रिश्वत के रूप में लिया जाता है और दूसरा वो जो सरकार को कर न देकर बचाया जाता है।
अधिकारियों द्वारा जो रिश्वत ली जाती है उस काले धन से आम आदमी पिसता है उसकी मेहनत की कमाई किसी और के लिए अय्याशी करने का साधन बनती है और सरकार पर से आम आदमी का  विश्वास धीरे धीरे उठने लगता है।
जबकि कर बचाकर जो काला धन बनाया जाता है उससे सरकार को राजस्व की हानि होती है।
क्या यह आश्चर्य जनक नहीं है कि वह देश जिसकी आबादी सवा करोड़ है उसमें कर देने वालों की संख्या मात्र 1.5% है  ?
कुल मिलाकर इन परिस्थितियों में नुकसान देश का  ही है।
तो भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का  जीएसटी रूपी यह कदम उस काले धन पर लगाम लगाने की कोशिश कहा जा सकता है  जो  कर चोरी द्वारा पनपता है।
जीएसटी,दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की  कर प्रणाली में आजादी के बाद अब तक का सबसे बड़ा परिवर्तन,
वो परिवर्तन जो अपने साथ भारतीय अर्थव्यवस्था में व्यापक बदलाव लाने की क्षमता रखता है
वो बदलाव जो अपने साथ कर व्यवस्था में सुधार लेकर आ रहा है
वो व्यवस्था जो पारदर्शी  है
वो पारदर्शिता जिसके परिणामस्वरूप एक वस्तु की कीमत पूरे भारत में एक समान ही होगी
वो समानता जिससे भारत देश में व्यापार करने की प्रक्रिया  सरल हो जाएगी
तो इस सरलता के बाद भी जीएसटी का देश भर में विरोध क्यों?
विपक्ष का विरोध करना स्वाभाविक है लेकिन देश के व्यापारी?
क्या अधूरा ज्ञान ?
या फिर दुष्प्रचार ?
तो आइए विरोध या समर्थन से पहले कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं को समझ लें
कर दो प्रकार के होते हैं एक प्रत्यक्ष और दूसरे अप्रत्यक्ष।प्रत्यक्ष कर वो जो हम सरकार को सीधे तौर पर देते हैं जैसे आयकर, सम्पत्ति कर आदि।
अप्रत्यक्ष कर वो जो व्यापारी या फिर सर्विस प्रोवाइडर अपने ग्राहक से लेकर सरकार को देता है।
सर्वप्रथम समझने वाली बात यह है कि जीएसटी के दायरे में केवल अप्रत्यक्ष कर आ रहे हैं प्रत्यक्ष कर यथावत् ही हैं।
अब जो अप्रत्यक्ष कर हैं वो अभी तक ग्राहक से तो ले लिए जाते थे लेकिन सरकार के खाते में पहुँच नहीं पाते थे।
बात केवल इतनी भी नहीं है दरअसल भारतीय कर प्रणाली जो अभी तक चल रही थी उसमें जटिलताएं भी बहुत थीं।
अभी तक भारतीय संविधान के अनुसार वस्तुओं की बिक्री पर राज्य सरकार कर लेती थीं और वस्तुओं के उत्पादन व सेवाओं पर केन्द्र सरकार।
किसी सामान के निर्माण के साथ ही सर्वप्रथम उस पर एक्साइज ड्यूटी और किसी किसी मामले में एडीशनल एक्साइज ड्यूटी भी लगती थी।इसके बाद लगता था सर्विस टैक्स। यदि माल एक राज्य से दूसरे राज्य में जाता है तो देना होता था एन्ट्री टैक्स।इसके बाद उस पर लगता था उस राज्य का वैट यानी सेल्स टैक्स।और अगर उस सामान का नाता  मनोरंजन से है तो मनोरंजन अथवा लग्जरी टैक्स लगता था।
टैक्स का यह सिलसिला काफी लम्बा था, कुल मिलाकर अलग अलग लगभग 18 टैक्स लगते थे।
और सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह कि भारत का उपभोक्ता एक आम आदमी इन परिस्थितियों में टैक्स पर टैक्स देने को विवश था बावजूद इसके सरकारी खजाना खाली रहता था और काले धन से व्यापारियों की तिजोरियाँ भरी।
लेकिन जीएसटी के लागू हो जाने से न सिर्फ इतने अलग अलग प्रकार के टैक्सों से छुटकारा मिलेगा बल्कि चूंकि टैक्स भरने की प्रक्रिया कम्प्यूटर पर होने के कारण टैक्स जमा करने के लिए सरकारी कार्यालयों के चक्कर काटने से भी आजादी मिलेगी।
अगर इसके तकनीकी पहलू पर बात करें तो
20 लाख के टर्नओवर वाले व्यापारियों को जीएसटी के दायरे से बाहर रखा गया है जबकि 75 लाख के टर्नओवर वाले व्यापारियों को कम्पोसिट स्कीम के अन्तर्गत केवल 1% टैक्स चुकाना है। यहाँ यह जानकारी विशेष महत्व रखती है कि
भारत में लगभग 68% व्यापारी इन्हीं दो श्रेणियों में आते हैं ।
तो कुल मिलाकर इतना तो तय है कि जीएसटी भारतीय अर्थव्यवस्था में न सिर्फ खुद एक बुनियादी बदलाव है बल्कि सरकार द्वारा राजस्व प्राप्ती में भी ठोस बदलाव लाने वाला एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगा।
काले धन के एक प्रकार पर सरकार के जीएसटी रूपी वार के बाद देश को इंतजार रहेगा भ्रष्टाचार रूपी काले धन पर लगाम का।
क्योंकि सरकार होती तो जनता के लिए है लेकिन जब तक उसे चलाने वाले नेता और अधिकारियों के भ्रष्ट आचरण को रोकने में वह नाकाम रहेगी नोटबंदी और जीएसटी जैसे कदम भी अपना मकसद हल करने में नाकाम ही सिद्ध होंगे।
डॉ नीलम महेंद्र

Monday, 19 June 2017

आहार से उपजे विचार ही शिशु के व्यक्तित्व को बनाते हैं

आहार से उपजे  विचार ही  शिशु के व्यक्तित्व को बनाते हैं




क्या मनुष्य केवल देह है या फिर उस देह में छिपा व्यक्तित्व?
यह व्यक्तित्व क्या है और कैसे बनता है?

भारत सरकार के आयुष मन्त्रालय द्वारा हाल ही में गर्भवती महिलाओं के लिए कुछ सुझाव दिए गए हैं जिसमें कहा गया है कि गर्भावस्था के दौरान गर्भवती महिलाओं को माँस के सेवन एवं सेक्स से दूर रहना चाहिए।
इस विषय पर जब आधुनिक विज्ञान के डाक्टरों से उनके विचार माँगे गए तो उनका कहना था कि  गर्भावस्था में महिला अपनी उसी दिनचर्या के अनुरूप जीवन जी सकती है जिसका पालन वह गर्भावस्था से पूर्व करती आ रही थी। अगर शारीरिक रूप से वह स्वस्थ है तो गर्भावस्था उसके जीवन जीने में कोई पाबंदी या बंदिशें लेकर नहीं आती।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की सबसे बड़ी समस्या यह ही है कि वह इस मानव शरीर के केवल भौतिक स्वरूप को ही स्वीकार करता है और इसी कारण  चिकित्सा भी केवल भौतिक शरीर की ही करता है।

जबकि भारतीय चिकित्सा पद्धति ही नहीं भारतीय दर्शन में भी मानव शरीर उसके भौतिक स्वरूप से कहीं बढ़कर है।  जहाँ आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में स्वास्थ्य की कोई निश्चित परिभाषा नहीं है, वह रोग के आभाव को ही स्वास्थ्य मानता है उसके अनुसार स्वस्थ व्यक्ति वह है जिसके शरीर में बीमारियों का आभाव है और शायद इसीलिए  अभी भी ऐसे अनेक प्रश्न हैं जिनके उत्तर वैज्ञानिक आज तक खोज रहे हैं।
लेकिन भारतीय चिकित्सा पद्धति की अगर बात करें तो आयुर्वेद में स्वास्थ्य के विषय में कहा गया है,
समदोषा: समाग्निश्च समधातु मलक्रिय: ।
प्रसन्नात्मेन्द्रियमन: स्वस्थ इत्यभिधीयते ।।
अर्थात जिस मनुष्य के शरीर में सभी दोष अग्नि धातु मल एवं  शारीरिक क्रियाएँ समान रूप से संचालित हों तथा उसकी आत्मा शरीर तथा मन प्रसन्नचित्त हों इस स्थिति को स्वास्थ्य कहते हैं और ऐसा मनुष्य स्वस्थ कहलाता है।
1948 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी स्वास्थ्य या आरोग्य की  परिभाषा देते हुए कहा है कि,
" दैहिक,मानसिक और सामाजिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ होना ही स्वास्थ्य है"
कुल मिलाकर सार यह है कि मानव शरीर केवल एक भौतिक देह नहीं है वह उससे बढ़कर बहुत कुछ है क्योंकि आत्मा और मन के अभाव में इस शरीर को शव कहा जाता है    
         
और जब एक स्त्री शरीर में नवजीवन का अंकुर फूटता है तो माँ और बच्चे का संबंध केवल शारीरिक नहीं होता।
आज विभिन्न अनुसंधानों के द्वारा यह सिद्ध हो चुका है कि हम जो भोजन करते हैं उससे हम न सिर्फ शारीरिक पोषण प्राप्त करते हैं अपितु हमारे विचारों को भी खुराक इसी भोजन से मिलती है।
जैसा आहार हम ग्रहण करते हैं वैसा ही व्यक्तित्व हमारा बनता है।
इसलिए चूँकि गर्भावस्था के दौरान शिशु माता के ही द्वारा पोषित होता है जो भोजन माँ खाएगी शिशु के व्यक्तित्व एवं विचार उसी भोजन के अनुरूप हो होंगे।
इसी संदर्भ में महाभारत का एक  महत्वपूर्ण प्रसंग का उल्लेख यहाँ उचित होगा कि किस प्रकार महाभारत में अभिमन्यु को चक्रव्यूह के भीतर जाने का रास्ता तो पता था लेकिन बाहर निकलने का नहीं क्योंकि जब अर्जुन सुभद्रा को चक्व्यूह की रचना और उसे भेदने की कला समझा रहे थे तो वे अन्त में सो गई थीं।
इसलिए माँ गर्भावस्था के दौरान कैसा आहार विहार रखती है कौन सा साहित्य पढ़ती है या फिर किस प्रकार के विचार एवं आचरण रखती है वो शिशु के ऊपर निश्चित ही प्रभाव डालते हैं।
जिस प्रकार माता पिता के रूप और गुण बालक में जीन्स के द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित होते हैं उसी प्रकार गर्भावस्था में माँ का आहार विहार भी शिशु के व्यक्तित्व विकास में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
प्रकृती में भी किसी  बीज के अंकुरित होने में मिट्टी में पाए जाने वाले पोषक तत्वों एवं जलवायु की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
इसलिए गर्भावस्था किसी महिला के लिए कोई पाबंदी या बंदिशें बेशक लेकर नहीं आती
हाँ लेकिन (अगर वह समझें  तो) एक अवसर और जिम्मेदारी निश्चित रूप से लेकर आती है कि अपने भीतर पोषित होने वाले जीव के व्यक्तित्व निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका और उसकी गंभीरता को समझें। क्योंकि यह जीव जब इस दुनिया में प्रवेश करेगा तो न सिर्फ उसके जीवन का अपितु उस समाज का, इस देश का भी हिस्सा बनेगा।
भरत को एक ऐसा वीर बालक बनाने में जिसके नाम से इस देश को नाम मिला उनकी माँ शकुन्तला का ही योगदान था।
शिवाजी की वीर छत्रपति शिवाजी बनाने वाली जीजाबाई ही थीं।
तो ईश्वर ने स्त्री को सृजन करने की शक्ति केवल एक शिशु के भौतिक शरीर की नहीं उसके व्यक्तित्व के सृजन की भी दी है।
आवश्यकता स्त्री को अपनी शक्ति पहचानने की है।
डॉ नीलम महेंद्र

Friday, 9 June 2017

अन्नदाता आखिर कब तक केवल मतदाता बना रहेगा

अन्नदाता आखिर कब तक केवल मतदाता बना रहेगा

चाहे तमिलनाडु हो आन्ध्रप्रदेश हो महाराष्ट्र हो या फिर अब मध्यप्रदेश पूरे देश की पेट की भूख मिटाने वाला हमारे देश का किसान आज आजादी के 70 साल बाद भी खुद भूख से लाचार क्यों है?
इतना बेबस क्यों है कि आत्महत्या करने के लिए मजबूर है?
और जब हमारे देश का यही अन्नदाता अपनी ही सरकार से अपनी माँगो को मनवाने के लिए पाँच दिन से शांतिपूर्ण आन्दोलन कर रहा था तो छटे दिन अचानक क्यों वो उन आतंकवादियों से भी खतरनाक हो गया जिन पर पैलेट गन के उपयोग से भी मानवाधिकारों के हनन की बातें उठती हैं, लेकिन किसानों पर काबू पाने के लिए गोलियों का सहारा ले लिया गया और किसके आदेश पर?
और उससे भी शर्मनाक यह कि सरकार न तो किसानों की तकलीफ समझ पाई, न उनका आक्रोश और न ही परिस्थितियों को, शायद इसीलिए अपने अफसरों को बचाने में जुट गई। गृहमंत्री कहते रहे कि गोली पुलिस ने नहीं चलाई, आन्दोलन में असामाजिक तत्वों का बोलबाला था और एक जाँच कमेटी का गठन कर दिया गया यह जानने के लिए कि गोली 'किसने' चलाई जबकि महत्वपूर्ण एवं जांच का विषय यह था कि गोली 'क्यों' चलाई गई?

भारत एक कृषि प्रधान देश है। जब भारत आजाद हुआ था तब हम सभी जानते हैं कि 600 सालों तक मुग़ल शासन और उसके बाद लगभग 200 साल तक ब्रिटिश शासन से वह देश जो कभी सोने की चिड़िया के नाम से जाना जाता था एक उजड़ा चमन बन चुका था। देश आर्थिक रूप से इतना कमज़ोर था कि पूरी आबादी दो वक्त का भोजन भी ठीक से नहीं कर पाती थी। ये वो दिन थे जब युद्ध के हालात में देश के प्रधानमंत्री को देश की जनता से एक वक्त उपवास करने की अपील करनी पड़ी थी। पूरे देश के साथ लाल बहादुर शास्त्री जी स्वयं एक समय का भोजन करके  देश के स्वाभिमान की रक्षा के लिए लड़ रहे थे।
ये ही वो दौर था जब देश के किसानों ने सरकार के सहयोग से वो मेहनत करी कि देश की मिट्टी सोना उगलने लगी ।
यह वो मेहनत और लगन ही थी कि देश के प्रधानमंत्री ने अपने देश की नींव चार शब्दों में बयान कर दी  "जय जवान जय किसान"
इस देश के हर नागरिक की भूख मिटाने वाला किसान है और देश की सरहद पर गोली खाने वाला एक सिपाही भी इसी किसान का बेटा है ।

 जी हाँ सेना में भर्ती होने जवान किसी नेता  या अफसर के नहीं इन्हीं किसानों के बेटे होते हैं।
वो मध्यप्रदेश जो कभी "बीमारू राज्य" हुआ करता था इन्हीं किसानों की कमरतोड़ मेहनत के दम पर
लगातार पांच बार कृषि कर्मण अवार्ड जीत चुका है उसी राज्य में किसानों के साथ यह व्यवहार? किसान आंदोलन में असामाजिक तत्व कैसे और क्यों आ गए? वजह कोई भी हो अन्ततः यह केवल सरकार एवं प्रशासनिक तंत्र की लापरवाही के सिवाय और कुछ नहीं है।
सवाल तो बहुत हैं कि हमारी अर्थव्यवस्था का काफी हिस्सा कृषी पर आधारित होने के बावजूद क्यों किसानों को कर्ज माफी की मांग क्यों उठानी पड़ रही है?
यहाँ गौर करने लायक बात यह है कि किसानों की ताजा मुश्किल मौसम की मार या फिर कम पैदावार नहीं है। इनकी तकलीफ़ यह है कि
सरकार की नीतियों के कारण बेहतर मानसून एवं पैदावार के बावजूद फसल के सीजन में प्याज आलू टमाटर और अन्य सब्जियों के दाम एक से दो रुपए तक गिर गई तो कमाई तो छोड़िये यह सोचिए कि क्या वे ऐसे में अपनी लागत भी निकाल पाएंगे?
दिन भर धूप में कड़ी मेहनत के दाम ए सी कमरों में लगाए जाएंगे?
हमारे देश के नेता आखिर कब तक अन्नदाता को केवल मतदाता समझ कर अपने स्वार्थ की रोटियाँ सेकते रहेंगे?
सत्ता पाने के लिए सभी राजनैतिक पार्टियाँ किसानों को कर्ज माफी का लालच दिखा देती हैं जबकि वे खुद इस बात को जानती हैं कि यह कोई स्थाई हल नहीं है इससे न तो किसान सक्षम बनेगा और न ही देश की अर्थव्यवस्था।
नेताओं की सोच केवल चुनाव जीतने और सत्ता हासिल करने तक सीमित रहती है और किसान कर्ज माफी के तत्कालीन लालच में आ जाता है।
अब किसान जागा है तो पूरा जागे
इस बात समझे कि भले ही अपनी फसल वो एक या दो रुपए में बेचने को विवश है लेकिन इस देश का आम आदमी उसके दाम एक दो रूपए नहीं कहीं ज्यादा चुकाता है तो यह सस्ता अनाज किसकी झोलियाँ भर रहा है?
किसान इस बात को समझे कि उसकी जरूरत कर्ज माफी की भीख नहीं  अपनी मेहनत का पूरा हक है
वह सरकार की नीतियाँ अपने हक में माँगे बैंकों के लोन नहीं
और सबसे महत्वपूर्ण बात अपने आंदोलन को शांतिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ाए और असामाजिक तत्वों से दूरी बनाए क्योंकि देश किसान के साथ है लेकिन हिंसा के नहीं
सरकार को भी चाहिए कि पूरे देश को जीवन देने वाला स्वयं अपना जीवन लेने के लिए भविष्य में कभी भी विवश न हो।
डॉ नीलम महेंद्र

Wednesday, 7 June 2017

क्यों न फिर से निर्भर हो जाए

क्यों न फिर से निर्भर हो जाए 
आज की दुनिया में हर किसी के लिए आत्मनिर्भर होना बहुत आवश्यक माना जाता है। स्त्रियाँ भी स्वावलंबी होना पसंद कर रही हैं और माता पिता के रूप में हम अपने बच्चों को भी आत्मनिर्भर होना सिखा रहे हैं।
इसी कड़ी में आज के इस बदलते परिवेश में हम लोग प्लैनिंग पर भी बहुत जोर देते हैं। हम लोगों के अधितर काम प्लैनड अर्थात पूर्व नियोजित होते हैं। अपने भविष्य के प्रति भी काफी सचेत रहते हैं इसलिए अपने बुढ़ापे की प्लैनिंग भी इस प्रकार करते हैं कि बुढ़ापे में हमें अपने बच्चों पर निर्भर नहीं रहना पड़े। यह आत्मनिर्भरता का भाव अगर केवल आर्थिक आवश्यकताओं तक सीमित हो तो ठीक है लेकिन क्या हम भावनात्मक रूप से भी आत्मनिर्भर हो सकते हैं?
क्या हमने कभी रुक कर सोचा या फिर पलट कर स्वयं से यह सवाल किया कि क्यों हम अपने बच्चों पर निर्भर क्यों नहीं होना चाहते? सम्पूर्ण जीवन जिस परिवार को सींचने में लगा दिया उसे एक पौधे से वृक्ष बना दिया और जब उस वृक्ष की शाखाओं में लगे फलों का आनंद लेने का समय आए तो आत्मनिर्भरता का राग क्यों गाया जाता है?
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है अपने भोजन कपड़े मकान इलाज आदि जीवन की हर छोटी बड़ी चीज़ के लिए हम एक दूसरे पर निर्भर रहते ही हैं। केवल मनुष्य ही क्यों सम्पूर्ण सृष्टि जीव और जड़ जगत एक दूसरे पर निर्भर है तो फिर अपने ही बच्चों से यह दूरी क्यों?
आज क्यों हम अपने बच्चों से अपेक्षा नहीं करना चाहते? जिस बच्चे को हमने अँगुली पकड़ कर बचपन में चलना सिखाया क्यों बुढ़ापे में हम उसकी अँगुली की अपेक्षा न करें?
हमारा समाज जिसकी नींव परिवार की यही शक्ति थी हम सभी क्यों उसे खत्म करने पर तुले हैं?
हम सभी किस घमंड में जी रहे हैं?
यह तो प्रकृति का चक्र है बचपन से जवानी, जवानी से बुढ़ापा प्रकृति के इस नियम को हम सहजता के साथ स्वीकार क्यों नहीं करते ?
जब हम सभी को एक दुसरे की जरूरत है तो इसे मानते क्यों नहीं ?
आज क्यों हम और हमारे बच्चे दोनों इस बात को स्वीकार करने में संकोच करते हैं कि जिस प्रकार बचपन में एक बालक को माता पिता की आवश्यकता होती है उसी प्रकार औलाद माता पिता की बुढ़ापे की लाठी होती है?
क्यों हम इस सच्चाई से मुँह छिपाते हैं कि बुढ़ापा तो क्या जीवन का कोई भी पड़ाव केवल पैसों के सहारे नहीं गुजारा जा सकता?
क्यों हम अपने बच्चों को बचपन से ही परिवार की मजबूत डोर से बाँध कर रखने में असफल हो रहे हैं?
क्यों माता पिता बच्चों से और बच्चे माता पिता से दूर होते जा रहे हैं?
क्यों आज संयुक्त परिवार तो छोड़िये एकल परिवार भी टूटते जा रहे हैं?
जरा एक पल रुक कर सोचिए तो सही कि यह भौतिकवादी संस्कृति हमें कहाँ लेकर जा रही है?
क्यों हमारे समाज में जहाँ समाज और परिवार एक दूसरे के पूरक थे आज उन दोनों के बिखराव को झूलाघरों एवं वृद्धाश्रमों द्वारा पूरा किया जा रहा है?
शायद इन सभी सवालों के जबाव इन सवालों में ही है।
डॉ नीलम महेंद्र

ना फैलाएँ नफरत का वातावरण

ना फैलाएँ नफरत का वातावरण

पशुओं के प्रति क्रूरता के लिए रोकने केंद्र के नए कानून का  विवेकहीन विरोध या फिर उसका समर्थन करने से पहले कुछ महत्वपूर्ण बातें

1
सम्पूर्ण विश्व में अन्तराष्ट्रीय स्तर पर पशुओं के साथ क्रूरता रोकने के लिए आन्दोलन चल रहे हैं।

2
कहा जा रहा है कि कृषि और पशुपालन राज्यों का विशिष्ट अधिकार है और इस आदेश से केंद्र उनके इस अधिकार का अतिक्रमण कर रही है।
तो सबसे पहले तो राज्य सरकारें इस बात को समझ लें कि राज्य चलाने के लिए जो कानून और संविधान बनाया गया है वह उनका सुचारु रूप से पालन करना उनका  "फर्ज़" है न कि  "अधिकार"
दूसरा, देश को सुचारु रूप से चलाने के लिए देश को केंद्र और राज्य दो भागों में बाँटा गया ताकि हर राज्य अपने देश काल वातावरण और रहन सहन के हिसाब से अपने नागरिकों जीव जंतुओं एवं पर्यावरण की रक्षा कर सके
हर राज्य की अपनी नगर निगम व्यवस्था होती है कानून व्यवस्था होती है अपनी पुलिस फोर्स होती
है लेकिन सेना पूरे देश की एक ही होती है ।
उसी प्रकार देश का पर्यावरण मंत्रालय पूरे देश के वन्यजीवों एवं जलवायु के संरक्षण के लिए होता है ।
इसलिए इस मंत्रालय द्वारा बनाया गया कोई भी कानून देश के पर्यावरण एवं वन्य जीवों की रक्षा के लिए ही होता है।

3 "
बीफ" केवल गोमांस नहीं होता है। बीफ में भैंस बैल सांड आदि का मांस होता है और इस नए कानून ने देश के वैध बूचड़खाने बन्द नहीं किए हैं और न ही बीफ पर प्रतिबंध लगाया है।

4
बीफ के नाम पर गोवध करना और विरोध स्वरूप बीफ पार्टी करके गोमांस का सेवन या तो विकृत मानसिकता है या फिर देश की भोली भाली जनता को मूर्ख बनाकर अपने राजनैतिक हित साधने की गंदी राजनीति।

5
और आखिरी लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात कि राज्यों में सरकार किसी भी पार्टी की हो उसका केवल एक लक्ष्य होना चाहिए कि वह एक दूसरे एवं केंद्र के साथ मिलकर देश को विकास एवं आपसी सौहार्द के पथ पर आगे ले जाएं न कि अपने अपने अधिकारों की दुहाई दे कर अपनी अपनी पार्टी के राजनैतिक हितों को साधने के लिए पूरे देश में अशांति और नफरत का वातावरण फैलाएँ

इस देश के हर नागरिक का अधिकार है कि वह हर नेता हर मंत्री हर पार्टी हर सरकार से कहे कि वे अपने अधिकारों की बात करने से पहले अपने फर्जों का निर्वाह करें क्योंकि अधिकार फर्ज निभाने के बाद खुदबखद  प्राप्त होते हैं छीने नहीं जाते

डॉ नीलम महेंद्र