Wednesday, 30 March 2016

9 ता० को जे एन यू  कैम्पस में जो कुछ हुआ वह पूरे देश ने देखा,हर देश भक्त के दिल से एक ही आवाज निकली अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश द्रोह स्वीकार्य नहीं है।सरकार के पैसे से चलने वाला शिक्षण संस्थान जिसमें छात्रों को पढ़ने के लिए स्कालरशिप,ठहरने और खाने पर सब्सिडी जैसी सुविधाओं का उपयोग देश के विरुद्ध करने वालों के इस आचरण को राजद्रोह के अन्तर्गत ही लिया जाना चाहिए।यह आवाज इस देश के हर उस नागरिक की थी जिसकी रगों में देश भक्ति का लहू जोश मारता है।इस नागरिक की एक ही पहचान है --"भारतीय" किसी राजनैतिक दल से कोई लेना देना है।
आज इस देश का सौभाग्य है कि केंद्र में सरकार के पास देश द्रोह की सीमा में आने वाले क्रत्यों को समझने का विवेक है। urhtu राष्ट्र हित को ध्यान में रखते हुए कार्यवाही की गई,और दोषी छात्रों को गिरफ्तार कर लिया गया।तुरंत ही राहुल गाँधी, सीता राम येचुरी समेत वामपंथी नेताओं के स्वर विरोध में उठने लगे।
क्या ये लोग भारत की जनता को इतना बेवकूफ समझते हैं कि यह होने वाली घटनाओं का विशलेषण करने में असक्षम है? क्या देश को यह नहीं दिख रहा कि जब जे एन यू में राष्ट्र विरोधी गतिविधियाँ हो रही थीं, तो उसके विरोध में उठने वाली आवाज़ों में इनकी आवाज़ नहीं थी! तब ये ध्रतराष्ट्र जैसे मूक  दर्शक बने बैठे थे! ध्रतराष्ट्र तो फिर द्रष्टीहीन थे किन्तु ये --? जब राष्ट्र हित में इनको आवाज उठाकर देश भक्ति का सुबूत देने का अवसर मिला था, तो शान्त खड़े होकर तमाशा देख रहे थे और जैसे ही इन गतिविधियों के खिलाफ जनमानस द्वारा अपेक्षित कार्यवाही की गई,ये राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में लिप्त देश द्रोहियों के रक्षा कवच बनकर बेशर्मी के साथ आवाज उठाने लगे?
आज राहुल गाँधी कहते हैं कि छात्रों की आवाज दबाने की कोशिश करने वाले देश द्रोही हैं तो देश के खिलाफ बोलने वाले कौन हैं? देश के खिलाफ बोलने वालों का साथ देने वाले कौन हैं?
देश की न्यायपालिका के अनुसार फाँसी की सजा पाये आतंकवादियों का महिमामंडन करते हुए वामपंथी समर्थन प्राप्त छात्र संगठनों द्वारा सम्पूर्ण हदें पार कर दी गईं हैं --सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सवाल उठाना, कश्मीर की आज़ादी माँगना ,भारत में रहते हुए पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लगाना -क्या ये सब स्वीकार्य है? और इस सबके पक्ष में कांग्रेस एवं वामपंथियों का आना अपने आप में बहुत कुछ कहता है।
आइये अब कुछ बातें वामपंथियों के बारे में -ये ही वे लोग हैं जो भारत की आजादी की लड़ाई में जब जगह जगह लोग विदेशी कपड़ों की होली जला रहे थे तो ये भरी गर्मी के दिनों में लंका शायर के सूट पहन कर घूमा करते थे।ये वही लोग हैं जिन्होंने महात्मा गाँधी को साम्राज्यवादियों का दलाल और सुभाष चन्द्र बोस को तोजो का कुत्ता तक कहा था।यही वो लोग हैं जिन्होंने पाकिस्तान निर्माण का समर्थन करते हुए भारत को खण्डों में बाँटने की बहुराष्ट्रीय योजना को सहयोग दिया था।1962 के युद्ध में चीन का साथ दिया था।आज इन्हीं वामपंथी नीतियों का नतीजा है कि आज जे एन  यू एक शिक्षण संस्थान न होकर राजनैतिक अखाड़ा बनकर रह गया है जहाँ वामपंथी विचार धारा छात्रों के आगे परोसी जा रही है।

कश्मीर का अलगाववाद दिल्ली के जे एन यू तक पहुँच गया है।अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर अलगाववादी विचार धारा और देश द्रोही गतिविधियों की इजाज़त नहीं दी जा सकती।जे एन यू से कश्मीर के केसर की खेती होती तो बेहतर था लेकिन यहाँ तो बारूद की खेती हो रही है।यह पहला अवसर नहीं है जब वामपंथियों द्वारा जे एन यू में इस तरह की गतिविधियों को प्रोत्साहित किया गया हो,2010मे कालेज प्रशासन के सामने दंतेवाड़ा में मारे गए सैनिकों की शहादत का जश्न मनाया गया!यही वो जगह है जहाँ कश्मीर से सेना वापसी का जश्न मनाया जाता है,नक्सलियों का खुले आम समर्थन होता है,कुल मिलाकर हर प्रकार की राष्ट्र विरोधी गतिविधियों का अड्डा बनाता जा रहा है ।
कितने शर्म की बात है कि इस विश्वविद्यालय की जमीन से कुछ ही दूरी पर शहीद हनुमनथप्पा अपनी अंतिम सांसें ले रहे थे और इस धरती पर देश विरोधी नारे लग रहे थे।शायद ये नारे उन्होंने सुन लिए थे।और इसीलिए प्राण त्याग दिए।जो देश भक्त शायद दुशमन की गोली से छलनी शरीर से भी बच जाता लेकिन अपने ही देश के नागरिक की बोली उसकी आत्मा छलनी कर गई!
हमारे दुशमन वो नहीं हैं जो देश के बाहर से रिमोट कंट्रोल द्वारा गतिविधियाँ संचालित कर रहे हैं बल्कि वे असली दुश्मन हैं जो उनके रिमोट द्वारा संचालित होते हैं क्योंकि रिमोट तभी काम करता है जब सिग्नल पकड़ता है।हमारे यहाँ बैठे लोग अगर उनका सिग्नल पकड़ना छोड़ दें तो उनके रिमोट स्वतः बेकार हो जाएंगे और जो उनका सिग्नल पकड़ रहे हैं वे भारत माता के अपराधी हैं।न्याय पर पहला अधिकार पीड़ित का होता है आज भारत माता की आत्मा पीड़ित है, उसे न्याय चाहिए।
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डॅा नीलम महेंद्र
आज के सामाजिक परिवेश में यह वाकई में चिंतनीय विषय है कि valentine day पर युवा वर्ग एक अलग ही दुनिया में खो जाना चाहता है और हिन्दू वादी संगठनों के विरोध का सामना करना पड़ता है।
यह वर्ग विशेष या संगठन या पीढ़ियों की लड़ाई नहीं यह विचारों की लड़ाई है।
दो पीढ़ियों के बीच विचारों में मतभेद आरंभ से ही चले आ रहे हैं, हम अपने ऊपर भी देखें तो पायेंगे कि जब हम बच्चे थे, तो किन्हीं किन्हीं विषयों पर माता पिता से मतभेद होते थे और आज जब हम माता पिता बन गए तो हमारे बच्चों के हमसे होते हैं -इसी को generation gap कहते हैं किन्तु एक सबसे बड़ा अंतर जो तब के बच्चों और आज के बच्चों में है वो यह कि उस जमाने के बच्चे मतभेदों को मनभेदों में बदलने नहीं देते थे उनके संस्कार जो उन्हें विरासत में मिलते थे वो उन्हें विद्रोह करने से रोक लेते थे इसी को शायद बड़ों का लिहाज भी कह सकते हैं।पर यह लिहाज़ बोलने से या भाषण देने से बच्चों में पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित नहीं होता क्योंकि यह अनुवांशिक गुण नहीं है,यह तो व्यवहार में लाने से पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित होता है क्यूंकि यह एक व्यवहारिक गुण है।आज की पीढ़ी में हम संस्कार डाल नहीं पाए और लिहाज उन्हें सिखा नहीं पाए।
देखा जाए तो इसमें दोष हमारे बच्चों का नहीं है, बच्चे तो कच्ची मिट्टी होते हैं उन्हें जिस परिवेश में बड़ा किया जाता है वे वैसे ही विचारों वाले युवक युवती बनेंगे।
हम में से कुछ आज चेते हैं जब तक काफी देर हो चुकी है और दुख की बात यह है कि कुछ तो अभी भी नहीं चेते।
हम लोगो ने परिवार और समाज के महत्व को स्वयं ही खत्म कर लिया,संयुक्त परिवार इतिहास बनने की कगार पर है और समाज की परवाह करना हम छोड़ चुके हैं आज हम खुद ही सोचते हैं कि हमें जो सही लगे हम वो ही करेंगे समाज की नज़र में गलत हो तो क्या!पहले गांव के गांव सांझे होते थे किसी भी मुद्दे पर पंचायत बैठती थी समाज के बढ़े बूढ़ों से सलाह ली जाती थी आज घर के बढ़े बूढ़ों से सलाह लेना तो दूर कोई बात करना भी पसंद नहीं करता।संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवारों ने ले ली है जिसमें माता पिता दोनों को काम करना पड़ता है,बच्चों के लिए माता पिता के पास पैसे तो है लेकिन समय नहीं है जो बच्चे पहले दादी नानी की कहानियां सुन कर बड़े होते थे वे आज स्मार्ट फोन और इंटरनेट की दुनिया में बड़े हो रहे हैं।जो बच्चे पहले बड़ों के आगे शादी के दिन तक बच्चे रहते थे आज स्कूल में पहला कदम रखते ही कहते हैं कि मैं बड़ा हो गया हूँ।पहले जिस बच्चे का जीवन साथी भी माता पिता तय करते थे आज वो बच्चा अपने स्कूल का पहला बैग भी अपनी खुद की पसंद से लेता है।
पहले बच्चे शुरू से बंधन के महत्व को समझते थे -परिवार का बन्धन ,समाज का बन्धन, एकता का बन्धन आज उन्हें स्वतंत्रता की राह भी तो हमीं ने दिखाई है जब एक छोटा सा बच्चा कपड़े तक अपने पसंद के पहनता है तो वह बड़ा हो कर आपसे किस बात की सलाह मांगेगा?अगर समस्या का समाधान निकालना है तो जड़ को समझना होगा।
नई पीढ़ी को बदलने से पहले पुरानी पीढ़ी को बदलना होगा। संयुक्त परिवार के परिवेश में अपनों के सुरक्षित हाथों में इन फूलों को खिलने दो,प्रकृति को करीब से देखने दो, नेट और स्मार्ट फोन से दूर रखो (एक  निश्चित आयु तक)।अपना अनमोल समय इनके साथ व्यतीत करो।बच्चे तो शुरु से प्यार के भूखे रहे हैं अगर माता पिता का प्यार और समय इन्हें मिलेगा तो क्यों ये प्यार की तलाश में बाहर भटकेंगे।
लेकिन आज बच्चा रोता है,तो टीवी का रिमोट हाथ में दे दिया जाता है,फोन दे दिया जाता है क्योंकि हमारे पास इतना समय नहीं है कि उसे गोद में उठा कर बगीचे के फूल दिखाएँ,प्रकृति से मिलाएँ,अपने देवी देवताओं के किस्से सुनाकर बहलाएँ।हम समय के अभाव में उन्हें न तो प्यार दे पाते हैं और न ही ज्ञान।अपना समय बचाने के लिए जो उपकरण (फोन और कम्प्यूटर)उन्हें थमा देते हैं वो उन्हें एक अलग ही ज्ञान देकर हमसे दूर कर देते हैं।नतीजा हमारे सामने हैं-
दोष किसका?
@डॅा नीलम महेंद्र

Tuesday, 29 March 2016

केरल की पम्पा और दिल्ली की यमुना 
डॅा नीलम महेंद्र
तारीख 11/3/2016 से 13/3/2016 आर्ट ऑफ लिविंग के अन्तर्गत श्री श्री रवि शंकर द्वारा वर्ल्ड कलचरल फेस्टिवल अर्थात विश्व सांस्कृतिक महोत्सव का आयोजन किया गया स्थान -दिल्ली में यमुना नदी के किनारे।यह भारत के लिए गर्व का पल था जिसमें सम्पूर्ण विश्व के 155देशों के 35 लाख से ज्यादा लोगों ने भाग लिया जिनमें उन देशों के गणमान्य अतिथि उपस्थित थे।इतने बड़े आयोजन से यमुना प्रदूषित न हो,इसको ध्यान में रखते हुए 650 बायो टायलेट (जैव शौचालय) बनाए गए।
तीन दिन तक सम्पूर्ण विश्व की निगाहें भारत पर टिकी थीं।विश्व की सभी संस्कृतियों का मिलन और भारतीय संस्कृति को उसके श्रेष्ठतम रूप में प्रस्तुत करने का गौरवपूर्ण अवसर!भौतिकता की अन्धी दौड़ में शामिल आज का मनुष्य शांति की तलाश में भारत के आध्यात्म और हमारे आध्यात्मिक गुरुओा की शरण में आते हैं।ऐप्पल के स्टीव जोब्स
और फेसबुक के मार्क जुकरबर्ग सम्पूर्ण विश्व के सामने भारत के आध्यात्म की शक्ति को स्वीकार कर चुके हैं।
श्री श्रीरविशंकर के इस कार्यक्रम ने विश्व को शांति एवं प्रेम का उपदेश दे कर भारत को एक गरिमा प्रदान की है।
एक तरफ जहां विदेशों में इस कार्यक्रम के प्रति लोगों में उत्साह था और सबकी निगाहें भारत पर टिकी थीं, वहीं दूसरी तरफ भारत का मीडिया (कुछ खास चैनल)इस कार्यक्रम में बाधाएँ डालने का प्रयास करने में लगे थे।नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एवं पर्यावरणविद  यमुना के प्रदूषण की चिंता के प्रति  संवेदनशील होने लगे।मीडिया द्वारा बेहद गंभीरता से इस मुद्दे को उठाया जाने लगा लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में जो बातें नहीं बताई गई अब जरा उन पर रोशनी डाली जाए तो स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो जाएगी।
2010 से आर्ट ऑफ लिविंग द्वारा पूरे देश की नदियों की सवच्छता के लिए एक अभियान चलाया जा रहा है जिसका नाम है --"मेरी दिल्ली मेरी यमुना"लगभग पाँच हजार स्वयंसेवी देश की प्रमुख नदियों की सफाई में लगे हैं।इस पूरी प्रक्रिया में अकेली यमुना नदी से इन स्वयं सेवकों द्वारा 512 टन से अधिक कचरा निकाला जा चुका है।यमुना के अलावा केरल की पंपा समेत अनेक नदियों की सफाई इस अभियान के अंतर्गत की जा चुकी है।प्रश्न यह उठता है कि 2010 से 2015 तक जब इन स्वयं सेवकों द्वारा सफाई का अभियान चलाया जा रहा था किसी भी पर्यावरणविद अथवा एन जी टी के किसी कर्मचारी का ध्यान इस ओर आकर्षित क्यों नहीं हुआ?न तो इनकी तरफ से किसी मदद की पेशकश की गई और न ही अच्छे कार्य के लिए प्रशंसा!।लेकिन जैसे ही श्री श्री रवि शंकर ने अपने ही कार्यकर्ताओं द्वारा साफ की हुई जगह पर इस कार्यक्रम के आयोजन की घोषणा की गई सभी को अपने कर्तव्यों का बोध होने लगा।यहाँ यह तथ्य जानना रोचक होगा कि एन जी टी की शुरुआत 2010 में सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी द्वारा की गई थी इसका मुख्य उद्देश्य पर्यावरण की रक्षा करना था लेकिन आज तक इसके द्वारा इस दिशा में अथवा यमुना की सफाई की दिशा में एक भी कदम उठाए जाने की कोई जानकारी प्राप्त नहीं है।यह एक कटु सत्य है कि इन सभी संस्थाओं के होने के बावजूद आज यमुना एक नदी से ज्यादा कचरा फेंकने वाली जगह में तब्दील हो चुकी है।
एक और तथ्य जो इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है वह यह कि केरल की तीसरी सबसे प्रमुख नदी -"पंपा" के किनारे ईसाइयों का भारत ही नहीं एशिया का सबसे बड़ा सम्मेलन -"मेरामाँन दीक्षांत समारोह"हर साल जनवरी फरवरी में होता है। सात से दस दिन चलने वाले इस कार्यक्रम का स्थल नदी क्षेत्र ही होता है।केरल सरकार द्वारा इस कार्यक्रम के लिए अनेक अस्थायी बांधो का निर्माण कराया जाता है।एक ऐसी नदी जिस पर केरल की जनसंख्या का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अपने जीवन यापन के लिए निर्भर हो,उसके प्रवाह को रोकने जैसे गम्भीर मुद्दों पर देश के पर्यावरणविद एवं एन जी टी खामोश रहते हैं लेकिन यमुना से सुरक्षित दूरी पर बिना पर्यावरण की क्षति पहुँचाए विश्व में शांति एवं सद्भावना का संदेश देने वाले वैश्विक कार्यक्रम को करने पर पांच करोड़ का जुर्माना लगाया जाता है।
तो इस सब से यह समझा जाए कि जुर्माना भरकर आप पर्यावरण दूषित कर सकते हैं?और यदि आप किसी अल्पसंख्यक समुदाय से हैं तो आप यह कार्य बिना जुर्माना भरे भी कर सकते हैं।

@डॅा नीलम महेंद्र

Sunday, 27 March 2016

मैं भी हूँ, तुम भी हो, यह राष्ट्रवाद है।
भारत का आम आदमी आज जिस दौर से गुजर रहा है, वह अचम्भित है  कि इतनी विविध प्रकार की जो घटनाएँ घटित हो रही हैं उन्हें वह किस रूप में देखे क्योंकि  अचानक आज देश में  विवादों की बाढ़ सी आ गई है ।एक ओर विश्व में भारत एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था के रूप में दिखाई देने लगा  ,हमारे प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं में न केवल एन आर आई बल्कि उस देश के नागरिक भी"मोदी मोदी" के नारे लगाने पर विवश हो गए,भारत निवेश के लिए विश्व को एक फायदेमंद जगह दिखने लगी,स्वच्छता अभियान के द्वारा देश की स्वच्छता में आम आदमी को अपने योगदान का एहसास होने लगा,शौचालयों के निर्माण से गावों में आम आदमी के जीवन स्तर में सुधार होता दिखा,देश के हर नागरिक का बैंक खाता खुलवाकर भ्रष्टाचार पर नकेल कसने की दिशा में एक ठोस कदम दिखने लगा,मेक इन  इंडिया के द्वारा देश में रोजगार के अवसर उपलब्ध होते दिखने लगे , देश के बुनियादी ढांचे में सुधार के द्वारा भारत को एक सुनहरे भविष्य की ओर बढ़ते देख रहा था कि अचानक कई विवादों के बादलों ने उसकी दृष्टि धूमिल कर दी।
उत्तर प्रदेश में दादरी कांड,अवार्ड वापसी अभियान,हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या का राजनीतिकरण ,जे एन यू परिसर में देश विरोधी नारों का लगना ,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर तर्क हीन मुद्दों को उछालना, भारत माता के जयघोष को ही विवाद बना देना आदि आदि।
आश्चर्य इस बात का है कि ये सभी मुद्दे बुद्धि जीवी वर्ग द्वारा उठाए जाने के बावजूद तर्कहीन हैं क्योंकि इनका राष्ट्रीय अथवा अन्तराष्ट्रीय स्तर पर देश के विकास या उसकी मूलभूत समस्याओं मसलन गरीबी,बेरोजगारी,राष्ट्रीय सुरक्षा आदि से कोई लेना देना नहीं है बल्कि यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इन सभी मुद्दों ने भारतीय समाज को न सिर्फ भीतर से तोड़ कर बाँटने का काम किया है अपितु अन्तराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि धूमिल भी की है।
लेकिन कहते हैं न कि बुराई में भी अच्छाई छिपी होती है तो यह अच्छा हुआ कि इन घटनाओं ने देश में राष्ट्रवाद और देश भक्ति पर एक ऐसी बहस को जन्म दिया जिसमें केवल बुद्धि जीवी ही नहीं बल्कि आम आदमी भी शामिल हो गया है ।देश के इस बुद्धिजीवी वर्ग ने जो तर्कहीन मुद्दे उठाए,अनजाने में मधुमक्खी के छत्ते को छेड़ दिया।दरअसल पिछले दो सालों में विपक्ष और मीडिया को सरकार के खिलाफ कोई भ्रष्टाचार का मामला अथवा घोटाला नहीं मिला तो इन तर्कहीन मुद्दों को ही परोस दिया।भूल यह हुई कि चूँकि यह मुद्दे आम आदमी से जुड़े थे इसलिए जनमानस आहत हुआ।आज वह जानना चाहता है कि हमारे देश में आखिर कितने प्रतिशत लोग हैं जो गोमांस का सेवन करते हैं (मात्र  20%)--!अवार्ड वापसी अभियान जो देश के बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा चलाया गया घोषणा तो बहुत हुई लेकिन कितनों ने लौटाए (मात्र 33) और क्यों यह खोज का विषय है।
हैदराबाद विश्वविद्यालय के एक छात्र द्वारा आत्महत्या का राजनीतिकरण करके उसको दलित उत्पीड़न का मामला बनाकर क्यों प्रस्तुत किया गया जबकि वह छात्र दलित था ही नहीं!जे एन यू में जब राष्ट्र विरोधी नारे लगे तो पूरा देश एकजुट क्यों नहीं था क्यों राष्ट्रवाद पर एक बहस शुरू कर दी गई क्यों देश बँटा हुआ नज़र आने लगा?यह बात भी आश्चर्य जनक है कि 9 तारीख को जो जे एन यू में हुआ वह पहली बार नहीं हुआ था इस प्रकार की घटनाएँ वहाँ आम बात थी तो देश के सामने पहली बार क्यों आईं?क्यों देश की राजधानी में स्थित एक अन्तराष्ट्रीय विश्वविद्यालय की बातें इतने सालों तक देश से छिपी रहीं?इन सभी बातों को संविधान का सहारा लेकर सही ठहराने की कोशिश और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर प्रस्तुत किए गए तर्कहीन बातों ने आम आदमी को झकझोर दिया। अभी देश का आम आदमी इन बातों को समझने की कोशिश में लगा था कि ओवेसी ने संविधान का हवाला देते हुए कहा कि मैं भारत माता की जय नहीं बोलूँगा ?इस प्रकार के तर्कहीन मुद्दों का औचित्य क्या है? क्या आप से किसी ने जबरदस्ती की कि कहना  पड़ेगा ? आप से कोई नहीं पूछ रहा कि आप अपनी माँ अपनी जन्मभूमी का जयघोष कैसे करते हैं ! अगर आप उसका सम्मान करते हैं तो निश्चित ही उसके सम्मान में कुछ शब्दों का प्रयोग करेंगे उन शब्दों पर राजनीति कहाँ तक उचित है?आप अपने घर में अपनी मातृभाषा का प्रयोग करते हैं किन्तु राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उस भाषा का प्रयोग करते हैं जो सभी के द्वारा स्वीकार्य हो  ।आप अपने क्षेत्र में अपनी क्षेत्रिय भाषा का प्रयोग कर सकते हैं और करना भी चाहिए लेकिन अगर राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय स्तर पर भी अपना अलग राग अलापेंगे तो स्वयं को ही हँसीं का पात्र बनाएँगे । 
आज देश में असहिष्णुता  जैसे नए शब्दों की उत्पत्ति ही नहीं हो रही अपितु राष्ट्रवाद और देशप्रेम की नई नई परिभाषाएँ भी गढ़ी जा रही हैं।आज जितने लोग हैं उतनी ही परिभाषाएँ हैं!इन सभी को पढ़ने व सुनने के बाद यदि समझ शेष बचे,तो अपने अन्तरमन में आप भी अपने लिए एक नई परिभाषा को जन्म दीजिए नहीं तो इनमें से एक का चयन कर लीजिए।
आम आदमी बेहद सरल होता है उसे कानून की ज्यादा समझ नहीं होती लेकिन सही और गलत का ज्ञान अवश्य होता है उसे पता है कि राष्ट्र का हित क्या है और राष्ट्र विरोध क्या है।आज आचार्य चाणक्य की कही बात का उल्लेख उचित होगा जिसमें वह स्पष्ट करते हैं कि देश  के प्रति निष्ठा और देश के प्रमुख के प्रति निष्ठा दो अलग अलग बातें हैं।आज यही बात हमें समझनी होगी कि  देश पहले आता है --नेशन कमस् फर्सट ।आज अगर राष्ट्रवाद  मुद्दा  बना है तो इस पर बहस होनी ही चाहिए  न कि विवाद और साजिश!

राष्ट्रवाद अथवा राष्ट्रीयता अर्थात् उस देश के नागरिकों का अपने देश के प्रति पायी जाने वाली स्वाभाविक सामूहिक भावना।जब बात देश की होती है तो वह केवल एक अन्तराष्ट्रीय भौगोलिक नक्शे पर बना जमीन का एक टुकड़ा नहीं होता।देश बनता है वहाँ वास करने वाले नागरिकों से।भारत केवल भूमि का टुकड़ा नहीं है,वह एक ऐसी संस्कृति है जो अनेक संस्कृतियों का मिलन है,सम्पूर्ण विश्व में शायद भारत ही एक ऐसा देश है जिसमें इतनी विविधता है -धर्म,संस्कृति,भाषा,परम्परा ,सभ्यता में इतनी अनेकता के बावजूद एकता!भारत में रहने वाला हर नागरिक भारतीय हैं हिन्दू धर्म को ही लें तो इसमें अनगिनत सम्प्रदाय है,देवी देवता हैं,जातियाँ हैं,सबकी अपनी अपनी संस्कृति अपना अपना रहन सहन है और यही हिन्दू धर्म की विशालता  है कि आप चाहें किसी भी भगवान को मानें,आप मन्दिर में या गुरुद्वारे में जाएं किसी भी जाति या सम्प्रदाय से जुड़े हों (जैन,कृष्ण,आर्यसमाज आदि)अन्त में आप हिन्दू ही है।यह धर्म से जुड़ी बात न होकर जन्म से जुड़ी बात है।भारत में जन्म लेने वाला हर व्यक्ति हिन्दू हैं,हिन्दुस्तान का हर नागरिक हिन्दू हैऔर  हिन्दू धर्म में इतनी विविधता को स्वीकार करना उसके मूलभूत संस्कारों में शामिल है और यही राष्ट्रवाद है।

अंग्रेजी के लेखक कैरी ब्राउन ने अपनी पुस्तक"द असेन्शियल टीचिंगस् आफ हिन्दुइज्म " में लिखा है --"आज हम जिस संस्कृति को हिन्दू संस्कृति के रूप में जानते हैं और जिसे भारतीय सनातन धर्म या शाश्वत नियम कहते है वह उस मजहब से बढ़ा सिद्धांत है जिस मजहब को पश्चिम के लोग समझते हैं।कोई किसी भगवान में विश्वास करे या ना करे फिर भी हिन्दू है,यह जीवन की एक पद्धति है।" 1996 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जे एस वर्मा ने हिन्दुत्व की व्याख्या करते हुए कहा कि हिन्दुत्व पूजा पद्धति नहीं जीवन दर्शन है । 
देश के प्रति प्रेम और भक्ति की कोई सीमाएँ नहीं होती और जहाँ सीमाएं होती हैं वहाँ प्रेम और भक्ति नहीं हो सकते।प्रेम और भक्ति में समर्पण होता है, कर्तव्यबोध होता है न कि अधिकार बोध! प्रेम वह होता है जो भगत सिंह ने किया था,इस मिट्टी से जिसकी गोद में वह खेला था भक्ति वह होती है जो सीमाओं पर की जाती है हनुमनथप्पा जैसे सैनिकों द्वारा  ।दोनों देशभक्त शहीदों का देश व काल भिन्न हैं लेकिन भावना एक ही है राष्ट्रवाद ।यही भावना आज देश की जरुरत है ।यह तभी संभव है जब सभी धर्मों के  लोग आपस में मिलकर प्रेम से रहें और 
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यह तब  संभव जब वे एक दूसरे के धर्म को सम्मान दें सिर्फ मेरा धर्म महान है यह कहने कि बजाय मेरा धर्म भी महान है और तुम्हारा धर्म भी महान है ऐसा कहें।एक दूसरे को स्वीकार करना ही राष्ट्रवाद है! मैं भी हूँ, तुम भी हो, यह राष्ट्रवाद है।मशहूर शायर सरशार  कहते हैं ना --
"
हमीं हम हैं तो क्या हम हैं
तुम्हीं तुम हो तो क्या तुम हो"
मैं से हम होकर पूरे राष्ट्र को एक सूत्र में बाँधना राष्ट्रवाद है।राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को समझना राष्ट्रवाद है।देश की एकता और अखन्डता की रक्षा राष्ट्रवाद है।

डॉ नीलम महेंद्रा

Sunday, 20 March 2016

प्रतिभाशाली युवा जब राजनीति में आयेंगे
देश को प्रगति की राह दिखाएंगे
अभी कुछ ही दिन पहले रोहित वेमुला द्वारा आत्महत्या की घटना और अभी  जे एन यू की  घटना। इन घटनाओं ने छात्र राजनीति पर एक प्रश्न चिह्न लगा दिया है और इस विषय पर पुनः सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या पढ़ने वाले बच्चों को राजनीति में रुचि लेनी चाहिए या नहीं।हमारे देश की 60% आबादी युवा है ये युवा अपने मताधिकारों का प्रयोग करके सरकारें चुनने एवं बनाने में अपना योगदान देते हैं। ऐसे में इनकी राजनीति में दिलचस्पी होना चाहिए या नहीं ?
यह एक उलझा हुआ विषय है जिसे हम आगे क्रमानुसार सुलझाने का प्रयास करेंगे। इसके लिए हमें आज के परिवेश से निकल कर इतिहास के झरोखे में झाँकना होगा,आखिर आज की नींव अतीत में ही कभी रखी गई होती है।
भारतीय छात्र आंदोलन का संगठित रूप सबसे पहले 1828 में कोलकाता में आकादमिक संगठन के रूप में सामने आया था जिसकी स्थापना एक पुर्तगाली छात्र हेनरी विवियन डीरोजियो द्वारा की गई थी।
हमारी आजादी की लड़ाई में देश के युवाओं का योगदान हम कभी नहीं भुला सकते। जिस छात्र राजनीति ने देश की आजादी के महासमर में अपना अभूतपूर्व योगदान दिया वो आज सबसे अधिक लाचारी के दौर से गुजर रही है। भारतीय स्वतंत्रता से लेकर स्वतंत्रता के बाद तक जितने बड़े आंदोलन हुए हैं उनमें छात्रों की सक्रिय भागीदारी रही।
पहली बार 1905 में छात्रों ने स्वदेशी आंदोलन शुरू किया।
1920
में गांधी जी के असहयोग आंदोलन में सभी युवा एक आवाज पर कूट पड़े थे।
1922
में चौरी चौरा कांड को राम प्रसाद बिस्मिल और चन्द्र शेखर आजाद के नेतृत्व में युवाओं ने ही अंजाम दिया था।
1942
में जब गांधी जी के आह्वान पर अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में लगभग सभी बड़े नेता गिरफ्तार कर लिए गए थे तो छात्रों और युवाओं ने ही इसे आगे बढ़ाया था।अशफ़ाक ख़ान,रोशन सिंग लहिधी ओर भगत सिंग सभी यूवा ही तो थे।
1936
में आल इंडिया स्टूडेन्ट फेडरेशन की स्थापना हुई और इसका स्वतंत्रता के आंदोलन में उल्लेखनीय योगदान रहा।
स्वतंत्रता के बाद भी हमारे देश को छात्र राजनीति ने आज तक कई बड़े बड़े राजनेता दिए हैं।
सुषमा स्वराज 1970 एबीवीपी 
लालूप्रसाद यादव 1973 पटना यूनिवर्सिटी
अजय माकन 1985 दिल्ली यूनिवर्सिटी
सीता राम येचुरी 1974 जे एन यू
इसी प्रकार प्रफुल्ल कुमार महन्त ,अरूण जेटली, नीतीश कुमार, सी पी जोशी जैसे कद्दावर नेता छात्र राजनीति की ही देन हैं।लेकिन यह बेहद अफसोस की बात है कि आज छात्र संघों के चुनाव लगभग पूरे देश में प्रतिबंधित हैं। एक प्रश्न यह भी है कि आज यही छात्र राजनीति इतने कुत्सित रूप में कैसे पहुँच गई! आइए इस रहस्य को भी समझ लें।
दरअसल स्वतंत्रता के बाद हमारे नेताओ द्वारा छात्रों को पढ़ाई तक सीमित रहने की सलाह दी। उनका कहना था कि छात्रों का ध्यान केवल पढ़ाई तक सीमित रहे,राजनीति में हिस्सा न लें ।
आपको यह जानकारी शायद कुछ अजीब लगे कि पंजाब सरकार विद्यार्थी के कालेज में दाखिले के पहले उससे इस आशय के सन्धि पत्र पर हस्ताक्षर करवाती है कि वह किसी प्रकार की राजनीति में दिलचस्पी नहीं लेंगे।
हमारी आज की शिक्षा प्रणाली कुछ ऐसी है जो बच्चों को केवल किताबी ज्ञान के आधार पर उनका एकमुखी विकास कर उनकी प्रतिभाओं को सीमित करने का कार्य करती है। हमारे बच्चों को ऐसी शिक्षा परोसी जा रही है जिसमें व्यवहारिक ज्ञान नगण्य है यही कारण है कि आज एक पढ़ा लिखा विद्यार्थी जब जीवन में समाज की मुख्य धारा से जुड़ता है तो अनेकों परिस्थितियों में स्वयं को बेबस और असहाय पाकर उनसे समझौते करने को विवश पाता है। उसका पढ़ा लिखा और सभ्य होना ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है।
जिस नौजवान को आगे चल कर देश की बागडोर अपने हाथ में लेनी है उसको हम ऐसी अधूरी, अव्यवहारिक और सत्य से परे केवल कहने और सुनने में ही शोभनीय शिक्षा दे कर किस ओर ले जाना चाह रहे हैं। अपने स्वार्थों की पूर्ति में हम इस तथ्य को नहीं समझ पा रहे हैं कि कालेज जीवन  की पढ़ाई और भारतीय समाज की मुख्यधारा की पढ़ाई के अन्तर को समझने में एक युवा कितने अन्तरद्वन्दों का सामना करता है। जो व्यवहारिक होते हैं उनके लिये तो आसान होता है लेकिन जो युवा अभी तक पढ़े किताबी ज्ञान को ही परम सत्य समझने की भूल करते हैं ---------!
हम कहते हैं विद्यार्थी का मुख्य काम पढ़ना है लेकिन क्या देश की परिस्थितियों से उसका अनजान रहना सही है देश के लिए या स्वयं उसके लिए भी?
असल में हमारी शिक्षा नीति का कहना है कि पढ़ो और सोचो लेकिन व्यवहारिक मत बनो नहीं तो तुम अधिक योग्य हो जाओगे ,देश के लिए तो फायदेमंद सिद्ध होगे लेकिन हमारे राजनेताओं के लिए नुकसानदायक!
यह बात ऐसे समझनी ज्यादा आसान होगी कि वर्तमान परिवेश में राजनीति में परिवारवाद हावी है।छात्र राजनीति से निकलने वाली प्रतिभाएं आज बड़े बड़े राजनैतिक घरानों के बाहुबल और धन बल के आगे पिछड़ जाती हैं उनमें योग्यता होने के बावजूद परिवारवाद के कारण आगे बढ़ने नहीं दिया जाता। ये  प्रतिभाएं जीवन भर एक कार्यकर्ता के रूप में देश,समाज तथा प्रदेश के कुछ परिवारों की गुलाम बन कर रह जाती हैं।
क्या विश्वविद्यालय में छात्र संघ चुनाव खत्म हो जाने से भ्रष्टाचार, अराजकता,गुंडागर्दी आदि समाप्त हो गई? छात्र राजनीति राजनीति की पाठशाला होती है और लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम रखने के लिए छात्र संगठनों की आवश्यकता होती है किन्तु मर्यादाओं के साथ। 1970 तक छात्र राजनीति स्वस्थ एवं स्वच्छ थी किन्तु इसके बाद राजनैतिक पार्टियों ने छात्र संगठनों का उपयोग अपने राजनैतिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए करना शुरू कर दिया। आज हर छात्र संगठन किसी न किसी राजनीतिक दल द्वारा संरक्षित है।
एक और पहलू है जिसने छात्र राजनीति को कलंकित किया है, वो है "हिंसा"। छात्र राजनीति में हिंसा का कोई स्थान नहीं होना चाहिए किन्तु भारत में हमारे राजनेता ही युवाओं को जोश में होश खो देने के लिए उकसाते हैं । चूँकि छात्रों को पता होता है कि उन्हें अमुक राजनैतिक दल का पूर्ण समर्थन है और किसी भी परिस्थिति में वे बचा लिए जांएगे (जैसे कि कनहैया) वे हिंसक होने से भी नहीं डरते। लेकिन इस सब के बीच वे यह छोटी सी बात नहीं समझ पाते कि वे सिर्फ किसी के हाथ की कठपुतली बनकर केवल एक मोहरा बनाकर रह गए हैं जिनका उपयोग किया जा रहा है।
यह कहा जाता है कि यदि राजनीति आपका भविष्य तय करती है तो आपको तय करना होगा कि आपका राजनीति में क्या स्थान है।
स्वतंत्रता संग्राम में जिन छात्र संगठनों का अभूतपूर्व योगदान रहा उन्हें आजादी के बाद इस प्रकार कमजोर कर देना न राष्ट्र हित में है और न ही छात्र हित में।
छात्र जीवन पढ़ने के लिए होता है,सीखने के लिए होता है,प्रतिभाओं को पहचान कर उन्हें निखारने के लिए होता है किताबों तक सीमित ज्ञान से बेहतर है सर्वांगीण विकास। देश के सामाजिक,तात्कालिक एवं राजनीतिक मुद्दों की जानकारी और उसमें छात्रों की हिस्सेदारी न सिर्फ उन्हें व्यवहारिक ज्ञान देता है अपितु उन्हें भविष्य के जिम्मेदार नागरिक बनने की क्षमता पेदा करता हे।
छात्र राजनीति पर प्रतिबंध लगाने से बेहतर है छात्र राजनीति में राजनैतिक दलों के हस्तक्षेप पर प्रतिबंध। छात्रों को स्वयं प्राकृतिक एवं नैसर्गिक रूप से देश और राजनीतिक को समझने का मौका देकर स्वस्थ छात्र राजनीति को प्रोत्साहित करके हम अपने देश के राजनैतिक भविष्य को उज्ज्वल करने की दिशा में एक ठोस कदम उठा सकते हैं। इससे हमारे देश को कई होनहार प्रतिभाओं का उपहार मिल सकता है जो हमारे देश की नींव को मजबूत ही करेगा 
परिवारवाद के बोझ तले दबी भारतीय राजनीति
देश के युवाओं को उम्मीद से निहारती


@डॅा नीलम महेंद्र