Wednesday, 16 March 2016

मैं से हम हो जांए
9फरवरी को जे एन यू मे जो हुआ वो अचानक नहीं था और न ही पहली बार हुआ था इसलिए अप्रत्याशित भी नहीं था।लेकिन यह क्यों हुआ इस पर विचार करना आवश्यक इसलिए है ताकि इसकी पुनरावृत्ति न हो ।
भारत जिस देश का नाम है उसकी दुनिया में एक अलग ही पहचान है।सम्पूर्ण विश्व में हमारी भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की एक मिसाल हैं।हम लोग खुले दिल से लोगों को ही नहीं उनके धर्म,विचार,संस्कृति सबको स्वीकार करते हैं।हर व्यक्ति को सम्पूर्ण आजादी है अपने धर्म का पालन करने की और अपने विचारों को व्यक्त करने की।बेहद अफसोस की बात है कि हमारे खुले दिल और विचार जो कि हमारी ताकत होने चाहिए थे,उन्हें हमने अपनी सबसे बड़ी कमजोरी बना लिया।
यहाँ पर कुछ ऐसे शब्दों का उल्लेख करना उचित होगा जिनके बीच एक पतली सी रेखा होती है -जैसे -सहिष्णुता और कायरता,राष्ट्र हित और निजहित, स्वाभिमान और अभिमान।
आज जो देश में घटित हो रहा है,(हाँ यह सच है कि जे एन यू देश नहीं है लेकिन जे एन यू की घटना की गूँज पूरे देश में सुनाई दे रही है )उसे हम लोग देश के एक साधारण नागरिक की आँखों से क्यों नहीं देख पा रहे? अगर ऐसा होता तो पूरे देश से एक ही आवाज आती लेकिन ऐसा नहीं है।हर व्यक्ति अपने स्वार्थ के चश्मे से घटना का आंकलन कर एक दूसरे को गुमराह करने की कोशिश में लगा है।यह भारत का दुर्भाग्य नहीं तो क्या है कि उसके सम्मान से जुड़े मुद्दे पर सम्पूर्ण देश में एक ही राष्ट्र नीति होनी चाहिए वहाँ राजनीति होने लगती है।
जब बात देश की अखण्डता की हो,तो देश से एक ही सुर गूँजना चाहिए था और सवा करोड़ भारतीयों की एक ही गूँज होती, तो दुनिया हिला देती लेकिन जब ये सवा करोड़ अपनी डफली अपना राग आलापेंगे तो सुर नहीं शोर पैदा होगा जो कि हो रहा है।
स्वामी विवेकानन्द ने कहा है कि अगर हमारा एक साथी हमारे साथ नहीं है तो हमारी संख्या एक कम नहीं होती अपितु हमारे दुशमनों की संख्या एक बढ़ जाती है।आज यही हमारा दुर्भाग्य है!
हम बात कर रहे थे जे एन यू --जी हाँ जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय,आइए देश और विदेश से मिलने वाली फन्डिग से चलने वाले इस विश्वविद्यालय के भीतर चलते हैं --
आपको याद होगा 1969 ,जब कांग्रेस पार्टी का विभाजन हुआ था ,तब इंदिरा गांधी को मार्क्सवादी और कम्युनिस्ट माफिया का पूरा समर्थन प्राप्त था और कहने की आवश्यकता नहीं 1971 में जे एन यू उन्हें तोहफे में दी गयी एक कर्म भूमि थी।
तब से लेकर अब तक जे एन यू का पूरा प्रशासनिक तथा शैक्षणिक स्टाफ मार्क्सवादी एवं कम्युनिस्ट विचारधारा वाले लोगों से भरा है।यह जानना भी रोचक होगा कि जे एन यू में विज्ञान एवं तकनीकी विषयों को नहीं पढ़ाया जाता,वहाँ इतिहास,समाज शास्त्र,अन्तराष्ट्रीय सम्बन्ध,अर्थशास्त्र,महिला कल्याण जैसे विषय पढ़ाए जाते हैं और छात्रों को वामपंथी विचार धारा परोसी जाती है।हर विषय को एक अलग ही रूप में छात्रों को पढ़ाया जाता है।दुर्भाग्य यह है कि यहाँ से निकलने के बाद ये छात्र पूरे भारत में अलग अलग पदों पर कार्यरत रह कर उसी वामपंथी विचारधारा को आगे बढ़ाते चलते हैं।जे एन यू की परिधि से निकलकर ये विचार भारतीय समाज और प्रशासन में जड़ें फैला रहे हैं ।
वहीं के एक छात्र के अनुसार,अगर आप वामपंथी विचार धारा का समर्थन नहीं करते हैं तो आपको वहाँ से उपाधि मिलना असंभव है।
कार्य प्रणाली कुछ इस प्रकार है कि छात्र का जे एन यू में प्रवेश करते ही उसकी जाती के आधार पर उसका उपयोग किया जाता है दलित,ओ बी सी,एस सी ,एस टी छात्रों को एकत्रित करके उनको हिन्दुत्व विरोधी तथ्य परोसे जाते हैं,उन्हें मजबूरन उस वाद विवाद का हिस्सा बनना पड़ता है जिसमें हिन्दू त्यौहार एवं देवी देवताओं को अपमानित किया जाता है।
आप इसे क्या कहेंगे कि 1990 के दशक तक कोई भी छात्र विश्व विद्यालय परिसर में तिलक अथवा कलावा बांध कर घूम भी नहीं सकता था।किसी प्रकार का हिन्दू त्यौहार मनाना तो दूर की बात है नाम तक लेने की कल्पना भी नहीं कर सकते थे!
1990 के दशक के अंत में विश्वविद्यालय में ए बी वी पी का उदय हुआ तो कुछ आवाज हिन्दू छात्रों की भी सुनाई देने लगी।2001 में पहली बार विश्वविद्यालय परिसर में दुर्गा पूजा का आयोजन किया गया हालांकि इसको कालेज प्रशासन के पूरे विरोध का सामना करना पड़ा।वहाँ के डीन एम एच कुरैशी लेफ्ट और मुस्लिम छात्रों के साथ आयोजन रुकवाने के लिए खुद आगे आए और हवन कुंड को तोड़ने तक का आदेश दे डाला लेकिन शायद उन्हें हिन्दू छात्रों की बढ़ती हुई एकता का अंदाजा नहीं था जिसके परिणामस्वरूप उन्हें बैकफुट पर आना पड़ा उस दिन दुर्गा पूजा तो हो गई लेकिन उनको इस बात का संकेत मिल गया कि अब विद्रोह के स्वर उठने लगे हैं।
अब तक जे एन यू अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर राष्ट्र विरोधी गतिविधियों का केंद्र बन चुका था ।चाहे वह 2010 में दंतेवाड़ा नकसली हमले में शहीद हुए सैनिकों की मौत का जश्न विजय दिवस के रूप में मनाया जाना हो ,चाहे 2012 में बीफ उत्सव का आयोजन हो, जिसमें ए बी वी पी और हिन्दू छात्रों के विरोध को देखते हुए हाई कोर्ट को रोक लगानी पड़ी ।
2001 में जे एन यू में संस्कृत केंद्र शुरू करने का प्रस्ताव पारित किया गया लेकिन उसकी निर्माणाधीन बिलडिंग की दीवारों को रातों रात गिरा दिया जाता था और विरोध पूर्वक पूछा जाता था कि क्या अब जे एन यू से पण्डे पुजारे पैदा होंगे?
2005 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह स्पीच देने आए थे लेकिन छात्रों की नारेबाजी के कारण अपना वक्तव्य पूरा नहीं कर पाए,नारेबाजी करने वाले छात्रों को बाहर निकालने के पश्चात ही वे अपनी स्पीच पूरी कर पाए।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को तब गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में जे एन यू परिसर में प्रवेश नहीं करने दिया गया था।प्रश्न यह उठ सकता है कि छात्रों को पढ़ाई से ज्यादा राजनीति में दिलचस्पी क्यों हैं?
सम्पूर्ण भारत में विजय दशमी का त्यौहार मनाया जाता है किन्तु जे एन यू में महिशासुर शहीदी दिवस मनाया जाता है। 2014 के चुनाव में जे एन यू एस यू के बैनर तले इस विश्वविद्यालय से प्रोफेसरों का एक दल वाराणसी से केजरीवाल के चुनाव प्रचार के लिए गया था जबकि लगभग दस छात्रों ने लिखित अर्ज़ी दी थी कि उनके नाम का उपयोग नहीं किया जाए ।
सबसे दुखद पहलू यह है कि आज तक यह प्रश्न क्यों नहीं उठा कि इस कम्युनिस्ट माफिया की विदेशी फन्डिग कहाँ से और क्यों हो रही है!
जे एन यू से संबंधित कुछ आंकड़े अपने आप में बहुत कुछ कहते हैं --
एक छात्र पर सरकारी खर्च तीन लाख रुपए
सरकारी मदद 244करोड़ रुपए
बावजूद इसके विश्व के टाप 200 विश्वविद्यालय में जे एन यू नहीं है
देश के 101 यौन उत्पीड़न मामलों में पचास प्रतिशत जे एन यू से हैं ।
और अब 9 फरवरी की यह ताजा घटना जिसमें अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर अपने ही राष्ट्र को खण्ड खण्ड करने के नारे लगाए गए! राहुल गाँधी ,केजरीवाल और तमाम वामपंथी जो इन छात्रों के बचाव में आगे आए हैं उनकी नज़र में क्या यह सही है?अपने ही तिरंगे का अपमान करना देश भक्ति है? तो देश द्रोह क्या है?क्या अभिव्यक्ति की आजादी पर केवल तथाकथित सेकुलरों का अधिकार है? यदि नहीं,तो क्यों कमलेश तिवारी के लिए फाँसी मांगी जा रही है?क्यों तसलीमा नसरीन को बंगाल छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा?
क्यों हम समझ नहीं पा रहे कि देश पहले है और मजहब बाद में? निजहित से बड़ा राष्ट्र हित होता है और देश भक्ति सबसे बड़ा धर्म!आज हर वो शख्स जो देश की एकता के लिए उठने वाली आवाज के साथ अपनी आवाज नहीं मिला रहा, वह देश द्रोही है।
क्यों न मैं से हम हो जाएं
भारत में एकता के दीप जलाएँ
article printed on page 6 in swadesh

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