Wednesday, 30 March 2016

9 ता० को जे एन यू  कैम्पस में जो कुछ हुआ वह पूरे देश ने देखा,हर देश भक्त के दिल से एक ही आवाज निकली अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर देश द्रोह स्वीकार्य नहीं है।सरकार के पैसे से चलने वाला शिक्षण संस्थान जिसमें छात्रों को पढ़ने के लिए स्कालरशिप,ठहरने और खाने पर सब्सिडी जैसी सुविधाओं का उपयोग देश के विरुद्ध करने वालों के इस आचरण को राजद्रोह के अन्तर्गत ही लिया जाना चाहिए।यह आवाज इस देश के हर उस नागरिक की थी जिसकी रगों में देश भक्ति का लहू जोश मारता है।इस नागरिक की एक ही पहचान है --"भारतीय" किसी राजनैतिक दल से कोई लेना देना है।
आज इस देश का सौभाग्य है कि केंद्र में सरकार के पास देश द्रोह की सीमा में आने वाले क्रत्यों को समझने का विवेक है। urhtu राष्ट्र हित को ध्यान में रखते हुए कार्यवाही की गई,और दोषी छात्रों को गिरफ्तार कर लिया गया।तुरंत ही राहुल गाँधी, सीता राम येचुरी समेत वामपंथी नेताओं के स्वर विरोध में उठने लगे।
क्या ये लोग भारत की जनता को इतना बेवकूफ समझते हैं कि यह होने वाली घटनाओं का विशलेषण करने में असक्षम है? क्या देश को यह नहीं दिख रहा कि जब जे एन यू में राष्ट्र विरोधी गतिविधियाँ हो रही थीं, तो उसके विरोध में उठने वाली आवाज़ों में इनकी आवाज़ नहीं थी! तब ये ध्रतराष्ट्र जैसे मूक  दर्शक बने बैठे थे! ध्रतराष्ट्र तो फिर द्रष्टीहीन थे किन्तु ये --? जब राष्ट्र हित में इनको आवाज उठाकर देश भक्ति का सुबूत देने का अवसर मिला था, तो शान्त खड़े होकर तमाशा देख रहे थे और जैसे ही इन गतिविधियों के खिलाफ जनमानस द्वारा अपेक्षित कार्यवाही की गई,ये राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में लिप्त देश द्रोहियों के रक्षा कवच बनकर बेशर्मी के साथ आवाज उठाने लगे?
आज राहुल गाँधी कहते हैं कि छात्रों की आवाज दबाने की कोशिश करने वाले देश द्रोही हैं तो देश के खिलाफ बोलने वाले कौन हैं? देश के खिलाफ बोलने वालों का साथ देने वाले कौन हैं?
देश की न्यायपालिका के अनुसार फाँसी की सजा पाये आतंकवादियों का महिमामंडन करते हुए वामपंथी समर्थन प्राप्त छात्र संगठनों द्वारा सम्पूर्ण हदें पार कर दी गईं हैं --सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सवाल उठाना, कश्मीर की आज़ादी माँगना ,भारत में रहते हुए पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लगाना -क्या ये सब स्वीकार्य है? और इस सबके पक्ष में कांग्रेस एवं वामपंथियों का आना अपने आप में बहुत कुछ कहता है।
आइये अब कुछ बातें वामपंथियों के बारे में -ये ही वे लोग हैं जो भारत की आजादी की लड़ाई में जब जगह जगह लोग विदेशी कपड़ों की होली जला रहे थे तो ये भरी गर्मी के दिनों में लंका शायर के सूट पहन कर घूमा करते थे।ये वही लोग हैं जिन्होंने महात्मा गाँधी को साम्राज्यवादियों का दलाल और सुभाष चन्द्र बोस को तोजो का कुत्ता तक कहा था।यही वो लोग हैं जिन्होंने पाकिस्तान निर्माण का समर्थन करते हुए भारत को खण्डों में बाँटने की बहुराष्ट्रीय योजना को सहयोग दिया था।1962 के युद्ध में चीन का साथ दिया था।आज इन्हीं वामपंथी नीतियों का नतीजा है कि आज जे एन  यू एक शिक्षण संस्थान न होकर राजनैतिक अखाड़ा बनकर रह गया है जहाँ वामपंथी विचार धारा छात्रों के आगे परोसी जा रही है।

कश्मीर का अलगाववाद दिल्ली के जे एन यू तक पहुँच गया है।अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर अलगाववादी विचार धारा और देश द्रोही गतिविधियों की इजाज़त नहीं दी जा सकती।जे एन यू से कश्मीर के केसर की खेती होती तो बेहतर था लेकिन यहाँ तो बारूद की खेती हो रही है।यह पहला अवसर नहीं है जब वामपंथियों द्वारा जे एन यू में इस तरह की गतिविधियों को प्रोत्साहित किया गया हो,2010मे कालेज प्रशासन के सामने दंतेवाड़ा में मारे गए सैनिकों की शहादत का जश्न मनाया गया!यही वो जगह है जहाँ कश्मीर से सेना वापसी का जश्न मनाया जाता है,नक्सलियों का खुले आम समर्थन होता है,कुल मिलाकर हर प्रकार की राष्ट्र विरोधी गतिविधियों का अड्डा बनाता जा रहा है ।
कितने शर्म की बात है कि इस विश्वविद्यालय की जमीन से कुछ ही दूरी पर शहीद हनुमनथप्पा अपनी अंतिम सांसें ले रहे थे और इस धरती पर देश विरोधी नारे लग रहे थे।शायद ये नारे उन्होंने सुन लिए थे।और इसीलिए प्राण त्याग दिए।जो देश भक्त शायद दुशमन की गोली से छलनी शरीर से भी बच जाता लेकिन अपने ही देश के नागरिक की बोली उसकी आत्मा छलनी कर गई!
हमारे दुशमन वो नहीं हैं जो देश के बाहर से रिमोट कंट्रोल द्वारा गतिविधियाँ संचालित कर रहे हैं बल्कि वे असली दुश्मन हैं जो उनके रिमोट द्वारा संचालित होते हैं क्योंकि रिमोट तभी काम करता है जब सिग्नल पकड़ता है।हमारे यहाँ बैठे लोग अगर उनका सिग्नल पकड़ना छोड़ दें तो उनके रिमोट स्वतः बेकार हो जाएंगे और जो उनका सिग्नल पकड़ रहे हैं वे भारत माता के अपराधी हैं।न्याय पर पहला अधिकार पीड़ित का होता है आज भारत माता की आत्मा पीड़ित है, उसे न्याय चाहिए।
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डॅा नीलम महेंद्र

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