Thursday, 7 April 2016

किस जुर्म की सज़ा हैं यह ?

श्रीनगर के एन आई टी में जो हुआ क्या उसके बाद हम अपने बच्चों से आँख मिलाने की स्थिति में हैं!क्या हम में इतनी नैतिकता शेष है कि हम अपने बच्चों और एक दूसरे के आगे व्यर्थ के तर्क प्रस्तुत करने के बजाय अपनी भूल को स्वीकार कर पाएँ ।क्या हममें इतना साहस है कि अपनी भूल को सुधारने की दिशा में कदम उठा पाएँ ! कदम उठाना तो दूर की बात है हममें से अधिकांश तो सेक्यूलरिज्म का मुखौटा ओड़े इस विषय पर एक रहस्यमयी मौन साधे बैठे हैं।
किसी भी देश के लिए इससे अधिक दुर्भाग्य की बात क्या होगी कि उसके बच्चे अपने ही देश में अपने ही देश के जयघोष करने के कारण अपने ही देश की पुलिस द्वारा बेरहमी से पीटे गए हों ? इससे अधिक निर्लज्जता क्या होगी कि देश विरोधी नारे लगाने वाले छात्रों का विरोध करके देश समर्थक नारे लगाने वाले छात्रों पर ही निशान साधा गया हो!ये कौन से मोड़ हैं? ये राहें किस मंजिल की ओर जाती हैं?
विश्व के मानचित्र पर एक विकासशील देश भारत जो विश्व गुरु बनने का सपना देख रहा है, उसका एक राज्य जम्मू कश्मीर, उसकी राजधानी श्रीनगर,उसमें एक कालेज" एन आई टी" अर्थात् नेशनल इन्टीट्यूट औफ टेकनोलोजी --20% विद्यार्थी कश्मीरी शेष पूरे भारत के विभिन्न राज्यों से।ता० 31 मार्च -भारत वेस्ट इन्डीज से टी 20 विश्व कप में हार जाता है सभी विद्यार्थी (कश्मीरी विद्यार्थियों को छोड़ कर) मायूस हो कर बैठे थे कि उन्हें कालेज कैम्पस में पटाखे चलने की आवाजें आती हैं,वे बाहर निकल कर देखते हैं कि कश्मीरी छात्र खुशियाँ मना रहे हैं और पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लगा रहे हैं।नारा यहीं तक सीमित होता तो ठीक था लेकिन नारा आगे बढ़ाया गया -- "पाकिस्तान जिन्दाबाद भारत मुर्दाबाद " और "हम क्या चाहें आजादी" कशमीरी छात्र ऐसे नारे लगाकर हरे रंग का झण्डा फहरा रहे थे।बिना चाँद सितारों का हरा झण्डा फहराकर बड़ी चालाकी से कानूनी तौर पर स्वयं को बचाकर अपनी अभिव्यक्ति की आजादी का जश्न मना रहे थे!
क्या यह सब पढ़कर    आपको कुछ महसूस हुआ? कहना मुश्किल है ना ! क्योंकि इस देश के आम आदमी को इन बातों की आदत हो चुकी है यह तो इस देश में पहले भी हो चुका है हैदराबाद विश्वविद्यालय में और जे एन यू में तो फिर इसमें नया क्या है?और जिस प्रदेश की बात यहाँ हो रही है वहाँ तो यह रोज की बात है तो इतनी हाय तौबा क्यों?तो जनाब इस बात पर कोई हाय तौबा  मचा भी नहीं रहा ,अगर ऐसे    पहले ही मामले में  कोई ठोस कदम उठा लिया गया होता तो आज हमें अपने बच्चों के घावों पर मरहम नहीं लगाना पड़ता !
इस देश का आम आदमी तो बेहद सहिष्णु है और वह न्याय के लिए ईश्वर के ऊपर ही निर्भर रहता है तो इस दिन भी विश्वविद्यालय परिसर में मौजूद प्रशासन मौन था उनके लिए यह एक साधारण बात थी लेकिन हमारे बच्चे जो इस देश का भविष्य हैं जो कि देश के विभिन्न राज्यों से थे और जिन पर हमें गर्व है लेकिन आज उनके आगे हम शर्मिंदा हैं, वो मासूम कोरा कागज़ थे उनमें अपनी मातृभूमि के प्रति नैसर्गिक प्रेम की भावना थी।उनमें वो क्षत्रिय खून था जो अपनी आँखों के सामने अपनी माँ का अपमान होते नहीं देख पाया  उनमें सही और गलत का एहसास था उनमें गलत का विरोध करने का साहस था जो कि उन्होंने किया देश  विरोधी नारे लगाने वाले कश्मीरी छात्रों का विरोध !
जब देश विरोधी नारे लग रहे थे तो कालेज प्रशासन शान्त था लेकिन जैसे ही गैर कश्मीरी छात्रों ने कश्मीरी छात्रों का विरोध किया और भारत का तिरंगा फहरा कर भारत माता की जय के नारे लगाने शुरू किए प्रशासन हरकत में आगया और पुलिस को बुला लिया गया।पुलिस को देख कर गैर कश्मीरी छात्रों को राहत महसूस हुई और वे सोच रहे थे कि पुलिस आ गई है तो बात संभल जाएगी लेकिन यह क्या? पुलिस ने तो उन्हें ही मारना शुरू कर दिया!लड़कों ही नहीं लड़कियों को भी! कोई महिला कान्सटेबल नहीं होने के बावजूद लड़कियों पर हाथ उठाया गया यहाँ तक कि सेकन्ड ईयर के इलेकट्रिकल ब्रांच के एक दिव्यांग छात्र को भी नहीं छोड़ा! पुलिस की बरबर्ता यही नहीं रुकी वो इन्डस होस्टल के भीतर तक जा कर बच्चों को बाहर निकाल निकाल कर मारने लगी।यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि इन्डस होस्टल प्रथम वर्ष के बच्चों का होस्टल है और इनमें कई छात्र तो 18 वर्ष से कम उम्र के हैं।इस पूरे घटनाक्रम में पुलिस की भूमिका एक सरकारी संस्था की न होकर  स्थानीय नागरिकों के समूह सी थी। वे बच्चों को मारते समय कह रहे थे कि तुमने 25 साल बाद तिरंगा फहराने की हिम्मत की है सजा तो मिलेगी (जैसा वहीं के एक विद्यार्थी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया) ।
बात यहाँ खत्म नहीं हुई कालेज प्रशासन ने वाय फाय को प्रतिबंधित कर दिया ताकि बच्चे फेसबुक ,ट्विटर और इन्टरनेट के अन्य माध्यमों द्वारा बाहर की दुनिया के सम्पर्क में न रहें।
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मार्च को क्रिकेट के एक मैच के बाद की झड़प 5 अपरैल को यह मोड़ ले लेगी किसने सोचा था वो भी तब जब 2 ता० को एन आई टी के डायरेक्टर  रजत गुप्ता ने बच्चों एवं उनके माता पिता को सबकुछ सामान्य करने का आश्वासन दिया था।4 ता० को मानव संसाधन विकास मंत्री श्रीमती स्मृति ईरानी ने घोषणा की थी कि बच्चों को पूरा न्याय मिलेगा और डायरेक्टर का कहना था कि बच्चों की सुरक्षा हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है! इन घोषणाओं के बाद 5ता० को हमारे बच्चों के साथ स्थानीय पुलिस द्वारा इस प्रकार का व्यवहार कहाँ तक उचित है?क्या यहाँ पर यह प्रश्न नहीं उठता कि पुलिस किसके इशारे पर कार्य कर रही है उसकी देशद्रोह की परिभाषा बाकी के देश की परिभाषा से भिन्न क्यों है ? उसकी नज़र में अपराधी तिरंगा फहराने वाले छात्र क्यों हुए बजाय हरा झण्डा फहराने वालों के ? उसने भारत माता की जय बोलने वाले छात्रों को निशाना क्यों बनाया बजाय पाकिस्तान जिन्दाबाद कहने वाले छात्रों के? वह किसकी तरफ से डण्डे बरसा रही थी? क्यों पाँच दिन तक स्थानीय सरकार द्वारा स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश नहीं की गई?क्यों केंद्र सरकार को दखल देकर कालेज में सी आर पी एफ के जवान तैनात करने पड़े?
एक प्रश्न यह भी कि दशकों से भारत सरकार कश्मीर सरकार की मदद कर रही है वहाँ की कानून व्यवस्था सुचारु रखने के लिए फिर ऐसे क्या कारण हैं कि वहाँ के स्थानीय लोग भारत से आजादी चाहते हैं?आतंकवादियों का समर्थन करते हैं और हमारी सेनाओं पर पत्थर बरसाते हैं?उन्हें हिन्दूओं से नफरत है लेकिन हिन्दुओं द्वारा दिए टैक्स से मिलने वाले पैसे से नहीं?
जे एन यू में कन्हैया जैसे छात्रों के हितों के लिए आगे आने वाले ,उनके अधिकारों की परवाह करने वाले नेताओं को इन गैर कश्मीरी छात्रों के अधिकारों की परवाह क्यों नहीं है? क्यों इन बच्चों 
के घावों से बहने वाले खून से इनकी आँखें नम नहीं हुई?
ये हमारे देश का कैसा राज्य है जिसमें जब भी भूकंप और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाएँ आती हैं 
तो भारत सरकार के झण्डे तले मिलने वाली सहायता इन्हें स्वीकार है लेकिन भारत का तिरंगा नहीं!
एक देश में  देशप्रेम की अलग अलग परिभाषाएँ स्वीकार्य नहीं हो सकतीं समय आ गया है कि कुछ ठोस कदम उठाकर समस्या की जड़ पर प्रहार किया जाए ।
डाँ नीलम महेंद्र 

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