Saturday, 21 May 2016

" ऊँ " को धर्म से जोड़ना सम्पूर्ण मानवता के साथ अन्याय

" ऊँ " को  धर्म से जोड़ना सम्पूर्ण मानवता के साथ अन्याय
21 जून को योग दिवस अन्तराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित हो रहा है। 2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रयासों के फलस्वरूप 21/6/2015 को योग की महिमा को सम्पूर्ण विश्व में स्वीकार्यता मिली और इस दिन को सभी  देशों द्वारा योग दिवस के रुप में मनाया जाता है।यह पल निश्चित ही भारत के लिए गर्व का पल था।
भारत में आयुष मंत्रालय ने इस बार 21 जून को आयोजित होने वाले योग दिवस के सम्बन्ध में दिशा निर्देश जारी कर दिए हैं जिसमें कहा गया है कि" ऊँ " शब्द का उच्चारण अनिवार्य है। कुछ धार्मिक  एवं सामाजिक संगठनों से विरोध के स्वर उठने लगे हैं।
भारत देश विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक एवं धर्मनिरपेक्ष देश है। भारतीय संस्कृति एवं उसके आध्यात्म का लोहा सम्पूर्ण विश्व मान चुका है।ऐसी कई बातों का उल्लेख हमारे वेदों एवं पुराणों   में किया गया है जिनके उत्तर आज भी आधुनिक विज्ञान के पास नहीं हैं फिर भी उन विषयों को पाश्चात्य देशों ने  अस्वीकार नहीं किया है वे आज भी उन विषयों पर खोज कर रहे हैं।क्या आपने कभी सोचा है कि भारतीय ॠषियों द्वारा हजारों वर्षों पूर्व कही बातों पर विश्व आज तक खोज में क्यों लगा है? क्योंकि उन बातों का अनुसरण करने से वे लाभान्वित हुए हैं सकारात्मक परिणाम भी मिले हैं किन्तु उस प्रक्रिया से वे आज तक अनजान हैं जिसके कारण इन परिणामों की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि वे उन बातों के मूल तक पहुँचने के लिए आज तक अनुसंधान कर रहे हैं । वे उन्हें मान चुके हैं लेकिन तर्क जानना चाह रहे हैं।वर्ना आज एप्पल के  कुक  और इससे पहले फेसबुक के मार्क जुकरबर्क जैसी हस्तियां क्यों भारत में मन्दिरों के दर्शन करती हैं?
अब कुछ बातें " ऊँ" शब्द के बारे में ----

अगर इसके वैज्ञानिक पक्ष की बात करें, तो सृष्टि की उत्पत्ति के साथ ही ऊँ शब्द की भी उत्पत्ति हुई थी , तब जब इस धरती पर कोई धर्म नहीं था । यह बात विज्ञान भी सिद्ध कर चुका है कि यह आदि काल से अन्तरिक्ष में उत्पन्न होने वाली ध्वनि है।क्या आप इस अद्भुत सत्य को जानते हैं कि ऊँ शब्द का उच्चारण एक ऐसा व्यक्ति भी कर सकता है जो बोल नहीं सकता अर्थात एक गूँगा व्यक्ति !यह तो सर्वविदित है कि किसी भी  ध्वनि की उत्पत्ति दो वस्तुओं के आपस में टकराने से होती है किन्तु ऊँ शब्द सभी ध्वनियों का मूल है जब हम ऊँ शब्द का उच्चारण करते हैं तो कंठ के मूल से अ ,उ और म शब्दों को बोलते हैं इसमें कहीं पर भी जिव्हा का प्रयोग नहीं  करना पड़ता कंठ के मूल से उत्पन्न होकर मुख से निकलने वाली ध्वनि  जिसके अन्त में एक अनोखा कम्पन उत्पन्न होता है जिसका  प्रभाव हमें शारीरिक मानसिक एवं आध्यात्मिक तीनों रूपों में महसूस होता है।अनेक प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध हो चुका है कि ऊँ का उच्चारण न सिर्फ हमारे श्वसन तंत्र एवं नाड़ी तंत्र को मजबूती प्रदान करता है अपितु हमारे मन एवं मस्तिष्क को भी सुकून देता है। अत्यधिक क्रोध अथवा अवसाद की स्थिति में इसका जाप इन दोनों ही प्रकार के भावों को नष्ट करके हममें एक नई सकारात्मक शक्ति से  भर देता है। ऊँ शब्द अपार ऊर्जा का स्रोत है   इससे उत्पन्न होने वाला कम्पन हमें सृष्टि में होने वाले अनुकम्पन से तालमेल बैठाने में मदद करता है एवं अनेक मानसिक शक्तियों को जाग्रत करता है ।
अब अगर इसके धार्मिक पक्ष की बात करें तो 
इस शब्द को किसी एक धर्म से जोड़ना सम्पूर्ण मानवता के साथ अन्याय होगा क्योंकि इसका लाभ हर उस व्यक्ति को प्राप्त होता है जो इसका उपयोग करता है अतः  इसको  धर्म की  सीमाओं में बाँधना अत्यंत निराशाजनक है।
ओम् शब्द सभी संस्कृतियों का आधार है और ईश्वरीय शक्ति का प्रतीक भी  क्योंकि इस शब्द का प्रयोग सभी धर्मों में होता है केवल रुप अलग है जैसे -- ईसाई और यहूदी धर्म में"आमेन " के रूप में ,मुस्लिम धर्म में   " आमीन" के रूप में बुद्ध धर्म में "ओं मणिपद्मे हूँ" के रूप में और सिख धर्म में "एक ओंकार" के रूप में होता है।अंग्रेजी शब्द ओमनी (omni) का अर्थ भी सर्वत्र विराजमान होना होता है। तो हम कह सकते हैं कि ओम्  शब्द     सभी धर्मों में ईश्वरीय शक्ति का द्योतक है और इसका  सम्बन्ध किसी एक मत अथवा सम्प्रदाय से न होकर सम्पूर्ण  मानवता से है । जैसे हवा पानी सूर्य सभी के लिए है किसी विशेष के लिए नहीं वैसे ही ओम् शब्द की स्वीकार्यता किसी एक धर्म में सीमित नहीं है इसकी महत्ता को सभी धर्मों ने न सिर्फ स्वीकार किया है अपितु अलग अलग रूपों में ईश्वरीय शक्ति के संकेत के रूप में प्रयोग भी किया है। संस्कृत के इन शब्दों का अर्थ इतना व्यापक होता है कि इनके अर्थ को सीमित करना केवल अल्पबुद्धि एवं संकीर्ण मानसिकता दर्शाता है मसलन संस्कृत में  "गो" शब्द का अर्थ होता है गतिमान होना , अब इस एक शब्द से अनेकों अर्थ निकलते हैं जैसे –पृथ्वी ,नक्षत्र, आदि हर वो वस्तु जो गतिशील है लेकिन यह इस दैवीय भाषा का अपमान नहीं तो क्या है कि आज गो शब्द का अर्थ गाय तक सीमित हो कर रह गया है।
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म" शब्द को ही लें, इस  शब्द से ईश्वर के पालन करने का गुण परिलक्षित होता है,धरती पर यह कार्य माता करती है इसीलिए उसे "माँ " कहा जाता है और यही शब्द हर धर्म में हर भाषा में माँ के लिए उपयुक्त शब्द का मूल है देखिए --हिन्दी में "माँ" ,उर्दू में "अम्मी" ,अंग्रेजी में "मदर ,मम्मी, माँम ", फारसी में "मादर" ,चीनी भाषा में  "माकुन " आदि। अर्थात् मातृत्व गुण को परिभाषित करने वाले शब्द का मूल सभी संस्कृतियों में एक ही है ।प्रकृति भी कुछ यूँ है कि सम्पूर्ण विश्व में कहीं भी बालक जब बोलना शुरू करता है तो सबसे पहले "म " शब्द से ही अपनी भावनाओं को व्यक्त करता है।
इसी प्रकार जीवन पद्धति एवं पूजन पद्धति का मूल हर संस्कृति में एक ही है अर्थात् मंजिल सब की एक है राहें अलग। हिन्दू,सिख ,मुस्लिम,ईसाई सभी उस सर्वशक्तिमान के आगे शीश झुकाते हैं लेकिन उसके तरीके पर वाद विवाद करके एक दूसरे को नीचा दिखाना कहाँ तक उचित है? जिस प्रकार की मुद्रा में बैठे कर नमाज पढ़ी जाती है वह योगशास्त्र में वज्रासन के रूप में वर्णित है। तो  यह कहा जा सकता है कि मानवता को धर्म विशेष में सीमित नहीं किया जा सकता। जो मानवता के लिए कलयाणकारी है उसका अनुसरण करना ही सर्वश्रेष्ठ धर्म है और केवल धर्म के नाम पर किसी भी बात का तर्कहीन विरोध सबसे निकृष्ट धर्म है।

डाँ नीलम महेंद्र


Saturday, 14 May 2016

शिक्षा का भगवा करण नहीं राष्ट्रीयकरण‏ ।

शिक्षा का भगवा करण नहीं राष्ट्रीयकरण  
राजस्थान सरकार द्वारा स्कूली पाठ्यक्रम में बदलाव का पूरे देश में राजनैतिकरण हो रहा है। राज नैतिक पार्टियाँ हैं राजनीति तो करेंगी ही लेकिन क्या राजनीति का स्तर इतना गिर चुका है कि देश से ऊपर स्वार्थ हो गए हैं ? आज सही और गलत कुछ नहीं है सब फायदा और नुकसान है! मुद्दे पर बात करने से पहले मुद्दे को समझ लें तो बेहतर होगा। तो जनाब दास्ताँ कुछ यूँ है कि राजस्थान के आने वाले सत्र में कक्षा 1-8 तक के पाठ्यक्रम में कुछ फेरबदल किया गया है मसलन कुछ विदेशी लेखक जैसे -जान कीट्स , थामस हार्डीविलियम ब्लैक,टी एस इलियाँट और एडवर्ड लेअर की रचनाओं को हटाकर -"द ब्रेव लेडी ऑफ राजस्थान, चित्तौड़ और संगीता" जैसे भारतीय लेखकों की रचनाओं जैसे स्वामी विवेकानन्द की कविता  " साँग औफ  फ्री "तथा गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर की विश्व प्रसिद्ध कविता "वेअर  माइन्ड इज़ विडाउट फीअर " को शामिल किया गया है। पाठ्यक्रम बदलने का उद्देश्य उस आदेश का पालन करना था जिसमें कहा गया था कि देश और राज्य से जुड़ी गर्व वाली रचनाओं को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए। 

 
अब कुछ सवाल उन बुद्धिजीवियों से जिन्हें इस पर आपत्ति है --आपको कीट्स और इलियाँट जैसे विदेशी लेखकों के हटाए जाने से कष्ट है आपका तर्क है कि ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में अंग्रेजी लेखकों को पढ़ाना हमारे बच्चों को  बेहतर भविष्य के लिए तैयार करना है, तो फिर इतने सालों इन्हें पढ़ने के बावजूद हमारा देश अन्त राष्ट्रीय मंच पर अपनी ठोस मौजूदगी दर्ज कराने में नाकाम क्यों रहा ? क्यों आजादी के 69 सालों बाद भी हमारी गिनती विकसित देशों में न होकर विकासशील देशों में ही है? क्यों आज तक भारत को यू एन सेक्योरिटी काउंसिल में स्थान नहीं मिल पाया जबकि जापान और चीन जैसे देश वहाँ उपस्थित हैआपको विलियम ब्लैक और थोमस हार्डी जैसे विदेशी लेखकों को हटाए जाने का अफसोस है लेकिन सम्पूर्ण विश्व में भारत का मान बढ़ाने वाले स्वामी विवेकानन्द एवं गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर को शामिल किए जाने का गर्व नहीं है? हमारे बच्चे अगर विदेशी रचनाकारों की रचनाओं को पढ़ने के बजाए  अपने ही देश के महापुरुषों के बारे में पढ़ें ,उन्हें जानें और याद करें यह तो हर भारतीय के लिए हर्ष का विषय होना चाहिए। 
 
आज आप कह रहे हैं कि शिक्षा का भगवा करण हो रहा है,तो कुछ अनुत्तरित प्रश्न आज भी उत्तरों की अपेक्षा कर रहे हैं जैसे --आज तक इतिहास की पुस्तकों में अकबरऔरंगज़ेब, शहाजहाँ, टीपू सुल्तान आदि का महिमा मंडन किया जा रहा था तो क्यों इन पुस्तकों में हरा रंग आवश्यकता से अधिक  नहीं कहा गया? वो अकबर महान कैसे हो सकता था और वो मुग़ल बहादुर कैसे हो सकते थे जिन्होंने हमारे देश पर आक्रमण कर के न सिर्फ लूट पाट की,मन्दिरों को तोड़ा ,महिलाओं का बलात्कार किया,हिन्दू राजाओं की हत्या की ?बल्कि हमारे वो हिन्दू राजा महान क्यों नहीं हुए जिन्होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा करने में अपने प्राणों की आहुति दे दी! शिवाजी वीर क्यों नहीं हुए महाराणा प्रताप महान क्यों नहीं हुए? क्यों हमारे बच्चों की इतिहास की पुस्तकों में इन जैसे अनको वीर योद्धाओं पर मात्र दो वाक्य हैं और मुग़लों के लिए दो दो पाठ ? दरअसल इतिहास उसी के द्वारा लिखा जाता है जो जीतता है क्योंकि हारने वाला इतिहास लिखने के लिए जीवित नहीं रहता यही इतिहास का इतिहास है और एक कटु सत्य भी! 
 
आज तक शिवाजी महाराज,पृथ्वी राज चौहानमहाराणा प्रताप, विजय नगर साम्राज्य को पाठ्यक्रम में शामिल नहीं किया गया तो देश से कोई आवाज क्यों नहीं उठीशायद पूरे विश्व में भारत ही वो एकमात्र राष्ट्र है जिसमें अंग्रेजों द्वारा लिखा गया उनकी सुविधानुसार तोड़ा मरोड़ा गया इतिहास पढ़ाना स्वीकार्य है किन्तु अपने देश के सही इतिहास जैसे   ,महाराष्ट्र में शिवाजी और राजस्थान में महाराणा प्रताप को पढ़ाना  शिक्षा का भगवाकरण कहलाता है ।यह विकृत मानसिकता के अलावा और क्या हो सकता है कि जिस बदलाव को शिक्षा का राष्ट्रीयकरण कहना चाहिए उसे भगवाकरण कहा जा रहा है। क्या सेक्युलर शब्द की व्याख्या इतनी सीमित है कि अपने ही देश के वीर योद्धाओं की बात करना हिन्दूइज्म या भगवाकरण कहलाता है? कतिपय यह स्वर उसी ओर से आ रहे हैं जहाँ से कुछ समय पहले असहिष्णुता नामक शब्द का उदय हुआ था और अवार्ड वापसी अभियान चलाया गया था। क्या यह बेहतर नहीं होता कि हमारे बच्चे इतिहास में अपने देश के वीर योद्धाओं की वीरता और उनके बलिदानों के बारे में पढ़कर स्वयं भी क्षत्रिय गुणों से  युक्त वीर देशभक्त नौजवान बनकर निकलते ! क्या हमारी बच्चियों को रानी लक्ष्मी बाई ,चित्तौड़ की महारानी पद्मिनी ,रावत चुण्डावत की रूपवती वीर हाडी रानी और ऐसी अनेकों वीर भारतीय नारियों के बारे में बताकर उनके व्यक्तित्व को और अधिक बलशाली नहीं बनाया जा सकता था? क्या हमारी आज की पीढ़ी को अपने पूर्वजों का सही इतिहास जानने का अधिकार नहीं है? हर देश में अपने इतिहास को एक विषय के रूप में पढ़ाए जाने के पीछे एक ही उद्देश्य होता है कि उसके नागरिकों में अपने  देश के प्रति  गर्व एवं  सम्मान की भावनाओं का बीजारोपण हो सकें ।इतिहास किसी भी राष्ट्र के लिए गर्व का विषय होना चाहिए विवाद का नहीं। हम स्वयं अपना सम्मान नहीं करेंगे तो दुनिया हमारा सम्मान कैसे करेगी? 
 
आज कुछ बुद्धिजीवियों को कष्ट है कि इतिहास की पुस्तकों में नेहरू नहीं और गोलवरकर क्यों तो जनाब आज से पहले जब गांधी और नेहरू के अलावा और कोई नहीं था तो तब यह आपके लिए मुद्दा क्यों नहीं हुआ? क्यों आज तक हम अपने बच्चों को अंग्रेजों द्वारा लिखे इतिहास को पढ़ाने के लिए बाध्य थे इस बात का क्या जवाब है कि भगत सिंह को "इंडियास स्ट्रगल फौर फ्रीडम "नामक पुस्तक में एक क्रांतिकारी आतंकवादी बताया गया है? क्यों हमारे ग्रंथों  "रामायण" और "महाभारत" को मायथोलोजी (पौराणिक कथाएँ) कहा जाता है और बाइबल एवं कुरान को सत्य घटनाएँ? 
 
क्या यह बेहतर नहीं होता कि हम स्वयं एक एैसा इतिहास लिखते जिससे उस भारत का निर्माण होता जिसे पढ़ने के लिए दुनिया बाध्य होती। 
 
डाँ नीलम महेंद्र