Thursday, 30 June 2016

क्यों ना भ्रष्टाचार मुक्त भारत का नारा भी लगाते?

क्यों ना भ्रष्टाचार मुक्त भारत का नारा भी लगाते?
टाइम्स नाऊ नमक अंग्रेजी न्यूज़ चैनल को दिए ताज़ा साक्षात्कार में माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी  ने भ्रष्टाचार से जुड़े एक सवाल का जवाब देते हुए कहा  " बहुत सी ऐसी चीजें होती हैं जो दिखाई नहीं देतीं हैं। कोई इस चीज़ को नहीं समझ सकता कि मैं किस तरह की गंदगी का सामना कर रहा हूँ। जो काम कर रहा है उसी को पता है कि कितनी गंदगी है। इसके पीछे कई तरह की ताकतें हैं।"
जब देश के प्रधानमंत्री को ऐसा कहना पढ़े तो आम आदमी की व्यथा को तो आराम से समझा ही जा सकता है। ऐसा पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने भ्रष्टाचार के विषय में नहीं कहा है इससे पहले हमारे पूर्व स्वर्गीय प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने भी स्वीकार किया था कि भ्रष्टाचार के कारण एक रुपये में से सिर्फ बीस पैसे ही उसके असली हकदार को मिल पाते हैं।

करप्शन भारत में आरम्भ से ही चर्चा एवं आन्दोलनों का एक प्रमुख विषय रहा है और हाल ही के समय में यह चुनावों का भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन कर उभरा है।
दरअसल समस्या कोई भी हो उसका हल ढूंढा जा सकता है किन्तु सबसे बड़ी दिक्कत यह होती है जब लोग उसे समस्या मानना बंद कर दें और उसे स्वीकार करने लगें ।हमारे देश की सबसे बड़ी चुनौती आज भ्रष्टाचार न होकर लोगों की यह मानसिकता हो गई है कि वे इस को सिस्टम का हिस्सा माननेलगे हैं।
हालांकि रिश्वतखोरी से निपटने के लिए हमारे यहाँ विशाल नौकरशाही का ढांचा खड़ा है लेकिन सच्चाई यह है कि शायद इसकी जड़ें देश में काफी गहरी पैठ बना चुकी हैं । आचार्य चाणक्य ने कहा था कि जिस प्रकार जल के भीतर रहने वाली मछली जल पीती है या नहीं यह पता लगाना कठिन है उसी प्रकार सरकारी कर्मचारी भ्रष्ट आचरण करते है या नहीं यह पता लगाना एक कठिन कार्य है।

यह अकेले भारत की नहीं अपितु एक विश्व व्यापी समस्या है और चूँ की इसकी उत्पत्ति नैतिक पतन से होती है इसका समाधान भी नैतिक चेतना से ही हो सकता है ।किसी भी प्रकार के अनैतिक आचरण की उत्पत्ति की बात करें तो नैतिकता के अभाव में मनुष्य का आचरण भ्रष्ट होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है ।किसी भी कार्य मे सफलता प्राप्त करने के लिए आचार्य चाणक्य की विश्व प्रसिद्ध नीति   "साम दाम दण्ड भेद  " स्वयं मनुष्य के इस स्वभाव का उपयोग करने की शिक्षा देती है। चाणक्य जानते थे कि हर व्यक्ति कि कोई न कोई कीमत होती है बस उसे पहचान कर उससे अपने हित साधे जा सकते हैं ।किन्तु अफ़सोस की बात यह है कि उन्होंने इन नीतियों का प्रयोग दुश्मन के विरुद्ध किया था और हम आज अपने ही देश में अपने ही देशवासियों के विरुद्ध कर रहें हैं और अपने स्वार्थों कि पूर्ति करने के लिए समाज में लोभ को बढ़ावा दें रहें हैं ।

हम भारतीयों से अधिक चाणक्य को शायद अंग्रेजों ने पढ़ा और समझा था । उनकी इस नीति का प्रयोग उन्होंनें  भारत पर अपना आधिपत्य स्थापित करने के लिए  बहुत ही योजनाबद्ध तरीके से किया ।. हमारे राजा महाराजाओं के सत्ता लोभ और छोटे छोटे स्वार्थों को बढ़ावा देकर इसी को अपना सबसे प्रभावशाली हथियार बनाया और  हमें सालों गुलामी की जंजीरों में बान्ध के रखा। जो भ्रष्टाचार आज हमारे देश में अपनी जड़ें फैला चुका है उसकी शुरुआत ब्रिटिश शासन काल में हुई थी और इसे वे हमारे नेताओं को विरासत में देकर गए थे।अंग्रेजों के समय से ही न्यायालय शोषण के अड्डे बन चुके थे शायद इसीलिए गांधी जी ने कहा था कि अदालतें न हों तो हिन्दुस्तान में न्याय गरीबों को मिलने लगे।
आज़ाद भारत में घोटालों की शुरुआत नेहरू युग में सेना के लिए जीप खरीदी के दौरान 1948 से मानी जा सकती है जो की  80 लाख रुपए का था।तब के हाई कमिश्नर श्री वी के मेनन ने २०० जीपोंके पैसे दे कर सिर्फ १५५ जीपें लीं थी । अब इन घोटालों की संख्या बढ़ चुकी है और रकम करोड़ों तक पहुँच गई हैं ।21 दिसंबर 1963 को संसद में डाँ राम मनोहर लोहिया द्वारा दिया गया भाषण आज भी प्रासंगिक है।वे कहते थे कि गरीब तो दो चार पैसे के लिए बेईमान होता है लेकिन बड़े लोग लाखों करोड़ों के लिए बेईमान होते हैं । हमारी योजनाएं नीचे के  99% प्रतिशत लोगों का जीवन स्तर उठाने के लिए नहीं वरन् आधा प्रतिशत लोगों का जीवन स्तर सुधारने के लिए बनती हैं । आज भारत में नौकरशाही से लेकर राजनीति न्यायपालिका मीडिया पुलिस सभी में भ्रष्टाचार व्याप्त है । 2015 में भारत 176 भ्रष्ट देशों की सूची में 76 वें पायदान पर था । 2005 में ट्रान्सपेरेन्सी इन्टरनेशनल नामक संस्था द्वारा किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि 62% से अधिक भारतवासियों को सरकारी कार्यालयों में अपना काम कराने के लिए रिश्वत या ऊँचे दर्जे का प्रभाव प्रयोग करना पड़ता है . आज का कटु सत्य यह है कि किसी भी शहर के नगर निगम में रिश्वत दिए बगैर मकान बनाने की अनुमति तक नहीं मिलती है। एक जन्म प्रमाण पत्र बनवाना हो अथवा ड्राइविंग लाइसेंस बनवाना हो कोई लोन पास कराना हो या किसी भी सरकारी विभाग में काम निकलना हो सभी सरकारी तंत्र भ्रष्टाचार में लिप्त हैं जनता की ऊर्जा भटक रही है नेता और अधिकारी देश के धन को विदेशी बैंकों में भेज रहे हैं।
बिहार का टापर घोटाला और मध्यप्रदेश का व्यापम घोटाला यह बताने के लिए काफी है कि किस प्रकार डिग्रियाँ खरीदी और बेची जा रही हैं। हमारे नेता संघ मुक्त भारत अथवा कांग्रेस मुक्त भारत के नारे तो बहुत लगाते हैं काश सभी एकजुट होकर भ्रष्टाचार मुक्त भारत का नारा भी लगाते। कभी राजनीति से ऊपर उठकर देश के बारे में ईमानदारी से सोचते। क्या कारण है कि आजादी के सत्तर साल बाद आज भी देश की बुनियादी समस्याएं आम आदमी की बुनियादी जरूरतें ही हैं ? रोटी कपड़ा और मकान की लड़ाई तो आम आदमी अपने जीवन काल में हार ही जाता है शिक्षा के अधिकार की क्या बात की जाए !
जिस देश के कूँए कागजों पर खुद जाते हों डिग्रियाँ घर बैठे मिल जाती हों जहाँ चेहरे देखकर कानून का पालन किया जाता हो। जहाँ शक्तिमान की मौत पर गिरफ्तारियां होती हों और पुलिस अफसर की मौत पर केवल जाँच !
जहाँ इशारत जहाँ जैसे आतंकवादियों की मौत पर एन्काउन्टर का केस दर्ज होता हो और हेमन्त करकरे जैसे अफसरों की मौत पर सुबूतों का इंतजार ! जहाँ धरती के भगवान कहे जाने वाले डाक्टर किडनी घोटालों में लिप्त हों और शिक्षक टापर घोटाले में ! ऐसे देश से भ्रष्टाचार ख़त्म करना आसन नहीं होगा । प्रधानमंत्री जी द्वारा अपने वक्तव्य में जाहिर की गयी पीड़ा को महसूस किया जा सकता है ।
जिस देश के युवा के जीवन की नींव भ्रष्टाचार हो उसी के सहारे डिग्री और नौकरी हासिल करता हो उससे अपने पद पर ईमानदार आचरण की अपेक्षा कैसे की जा सकती है ? जो रकम उसने अपने भविष्य को संवारने के लिए इन्वेस्ट करी थी रिश्वत देने में  नौकरी लगते ही सबसे पहले तो उसे बराबर किया जाता है फिर कुछ भविष्य संवारने के लिए सहेजा जाता है रही वर्तमान की बात तो वह तो सरकारी नौकरी में हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा ही चोखा ।
जब तक इस चक्र को तोड़ा नहीं जाएगा आम आदमी इस चक्रव्यूह में अभिमन्यु ही बना रहेगा।

जिस दिन देश का युवा अपनी काबिलीयत की दम पर डिग्री और नौकरी दोनों प्राप्त करने लगेगा तो वह अपनी इसी काबिलीयत को देश से भ्रष्टाचार हटाने में लगाएगा। भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग जीती तब जाएगी जब आम आदमी इसका विरोध करे न कि तब जब इसे स्वीकार करे ।
डॉ नीलम महेंद्र

Thursday, 23 June 2016

एक सवाल सलमान से …….क्या आत्मा भी जख्मी हुई थी ?

एक सवाल सलमान से …….क्या आत्मा भी जख्मी हुई थी ?

सलमान खान द्वारा दिए गए एक बयान पर आजकल देश भर में काफी बवाल मचा हुआ है ऐसा नहीं है कि पहली बार किसी शख्सियत की ओर से महिलाओं के विषय में कुछ आपत्तिजनक कहा गया हो इससे पूर्व चाहे बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालूप्रसाद यादव हों जो बिहार की सड़कों की तुलना हेमा मालिनी के गालों से करते हों चाहे मघ्य प्रदेश के तत्कालीन गृहमंत्री बाबू लाल गौर जो भरी सभा में कहते हों कि वे महिलाओं को धोती  बाँधना तो नहीं किन्तु धोती खोलना सिखा सकते हैं चाहे सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस काटजू हों जो कहते हैं कि रेप महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं है यह तो होता रहता है और होता रहेगा चाहे उत्तर प्रदेश के नेता बाबू आजमी हों ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं कि अगर सभी के बारे में लिखा जाए तो शायद तो शायद कुछ और लिखना शेष नहीं रह जाएगा।


जब जब ऐसे बयान आते हैं कुछ दिन हो हल्ला मचता है बयानबाजी होती है सम्बन्धित पक्ष की ओर से माफीनामा आता है और कुछ दिन के मनोरंजन   (माफ कीजिएगा किन्तु इस शब्द का प्रयोग यहाँ आज एक कटु सत्य है) के बाद खबरों के भूखे लोगों द्वारा ऐसी ही किसी नई खबर की तलाश शुरू हो जाती है।
इस पूरे प्रकरण में सोचने वाली बात यह है कि सलमान द्वारा उक्त वक्तव्य एक वेबसाइट को दिए साक्षात्कार में कहा गया मीडिया द्वारा जो औडियो क्लिप सुनाई जा रही है उसमें सलमान के वक्तव्य के बाद वहाँ मौजूद पत्रकारों की हँसने की आवाजें सुनाई दे रही हैं उस समय मौजूद किसी भी पत्रकार द्वारा इस वक्तव्य की आलोचना नहीं की गई शायद उन्हें इसमें कुछ गलत नहीं लगा तो फिर उन्हीं के द्वारा बाद में इसे उछाला क्यों गया ? अगर वे वाकई में महिलाओं की भावनाओं के प्रति जागरूक थे और उन्हें बुरा लगा तो वे उसी समय सलमान को उनकी गलती का एहसास कराकर बात को खत्म कर देते न कि उसे खबर बनाकर पूरे देश की महिलाओं की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करते ।मीडिया के इस कृत्य ने ऐसी अनेक पीड़ितों के नासूरों को पुनः जीवित कर दिया है । सलमान ने जो कहा वो तो बिना सोचे समझे कहा और इसकी कीमत भी चुका रहे हैं किन्तु मीडिया ने जो किया क्या वो भी बिना सोचे समझे या फिर  सोच समझ कर ? 


लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं कि सलमान ने जो कहा सही कहा!
उनका कहना है कि वे जब प्रैक्टिस करके रिंग  से बाहर निकलते थे तो उन्हें एक रेप पीड़िता की तरह महसूस होता था । यह कथन वाकई दुर्भाग्यपूर्ण है काश उन्होंने बोलने से पहले सोचा होता। सलमान अपनी आने वाली फिल्म सुल्तान के लिए अपने द्वारा की गई मेहनत पर बात कर रहे थे जो पसीना उन्होंने बहाया था उसका बखान करते हुए कुछ ज्यादा ही बोल गए वे यह भूल गए कि वे अपने द्वारा भोगे गए  शारीरिक कष्ट की तुलना जिस कष्ट से कर रहे हैं वो केवल शारीरिक नहीं है बलात्कार एक महिला के शरीर का नहीं उसकी आत्मा उसके मन उसके व्यक्तित्व उसके स्वयं को एक इंसान समझने की खोखली सोच इन सभी का होता है। वे यह भूल गए कि इस मेहनत और उससे मिलने वाले कष्ट को उन्होंने स्वयं चुना था उन पर थोपा नहीं गया था जबकि बलात्कार महिला पर थोपा गया होता है कोई भी महिला किसी भी परिस्थिति में इसे चुनती नहीं है।  वे यह भूल गए कि उनके द्वारा की गई इस मेहनत ने उस किरदार को जीवित कर दिया जिसे वह परदे पर निभा रहे हैं लेकिन बलात्कार उस महिला को जीते जी मार डालता है और वह महिला अपना शेष जीवन एक जिंदा लाश की तरह बिताती है जिस पर यह बीतता है। हमारा देश अभी उस नर्स अरुणा शानबाग को भूला नहीं है जो बलात्कार के कारण 42 साल तक कौमा में चली गईं थीं और 66 साल की उम्र में कौमा में ही इस दुनिया से बिदा हो गईं। वे यह भूल गए कि उनके द्वारा एक "रेप पीड़िता" के बराबर झेले गये कष्ट  से उन्हें नाम शोहरत पैसा तालियाँ तारीफ सब मिलेगी उनकी फैन फौलोइंग बढ़ेगी लेकिन एक रेप पीड़िता को मिलती है बदनामी उसे समाज में मुँह छिपाकर घूमना पड़ता है और न्याय पाने की आस में उसकी सारी जमा पूंजी खत्म हो जाती है फिर भी न्याय नहीं मिल पाता (निर्भया को ही देख लें) । वे यह भूल गए कि उनकी शारीरिक मेहनत से उपजी उनकी पीड़ा एक दिन के आराम से या किसी पेनकिलर (दर्द नाशक दवा) से कम हो जाएगी लेकिन रेप पीड़िता का जख्म और दर्द दोनों  जीवन भर के नासूर बन जाते हैं शरीर के घाव भर भी जाँए मन और आत्मा तो छलनी हो ही जाते हैं ।   कहते हैं कि समय के साथ सारे घाव भर जाते हैं लेकिन शायद यह ही एक घाव होता है जिसका इलाज तो समय के पास भी नहीं होता ।वे यह भूल गए कि कई बलात्कार पीड़िता तो आत्महत्या तक कर लेती हैं क्या उन्हें रिंग से बाहर आने के बाद 
अपनी पीड़ा के कारण कभी आत्महत्या करने का विचार आया था? वे भूल गए कि बलात्कार तो महिला का होता है लेकिन उसके दंश से उपजी पीड़ा को उसका पूरा परिवार भोगता है क्या सलमान के रिंग से बाहर आने के बाद उनके दर्द से उनका परिवार भी कराहता था ? 
यह सवाल इस लिए उठ रहे हैं सलमान साहब क्योंकि आप आज के यूथ आइकान हैं आपकी जबरदस्त फैन फौलोइंग है आप से आज का युवा प्रोत्साहित होता है  आप सफलता के चरम पर हैं।सफलता के साथ उसका नशा भी आता है और उससे जिम्मेदारी भी उपजती है यह तो सफलता प्राप्त करने वाले पर निर्भर करता है कि वह इसके नशे में चूर होता है या फिर उससे मिलने वाली जिम्मेदारी के अहसास से अपने व्यक्तिगत में और निखार लाता है।
देश के प्रति अपने फर्ज को निभाने के लिए आवश्यक नहीं कि सीमा पर जा कर खून ही बहाया जाए।हम सब जहाँ भी हैं जिस क्षेत्र में भी हैं उसी जगह से देश हित में आचरण करना भी देश सेवा होती है।जिस देश ने  सलमान को सर आँखों पर बैठाया उस देश के युवाओं पर उनके आचरण का क्या असर होगा अगर वो इतना ही ध्यान में रखकर देश के युवाओं के सामने एक उचित एवं अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करें तो यह भी एक तरह की देश सेवा ही होगी।
डाँ नीलम महेंद्र 


Tuesday, 21 June 2016

कब तक जलेंगी हमारी बेटीयाँ

कब तक जलेंगी हमारी बेटीयाँ

दुनिया के मानचित्र पर एक देश भारत जिसका एक गौरवशाली इतिहास रहा है और विकास के रथ पर सवार एक स्वर्णिम भविष्य की आस है 18/6/16 को हमारी तीन बेटियों अवनी चतुर्वेदी, भावना कन्थ और मोहना सिंह ने भारतीय वायुसेना में फाइटर प्लेन उड़ाने वाली पहली महिला पायलट बनकर इतिहास रचा। इतिहास तो हमारी बेटियों ने पहले भी बहुत रचे हैं --चाहे वो आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों से लोहा लेकर अमर होने वाली रानी लक्ष्मीबाई हो या फिर अपनी जान पर खेल कर प्लेन में सवार सभी यात्रियों को सुरक्षित बाहर निकालने वाली एयर होस्टेस नीरजा भनोट हो। आधुनिक युग की कल्पना चावला हो या भारत की पहली महिला आई पी एस किरण बेदी हो, दो बच्चों की माँ वर्ल्ड बाक्सिंग चैंपियन मैरी काँम हो या कोर्पोरेट जगत की सफल हस्ती इंद्रा नूयी अथवा चन्दा कोचर हो सभी ने विश्व में भारत का नाम ऊँचा ही किया है।

ये हँसती खेलती, मेहनत से आगे बढ़ती, पूरे परिवार का सुख दुख अपने आँचल में समेटती अपने अपने क्षेत्र में शीर्ष पर पहुंचतीं हमारी बेटीयाँ। तस्वीर का यह पहलू कितना सुखद है और आप सब भी इसे देखकर गर्व महसूस करते होंगे लेकिन हम सभी जानते हैं कि यह हमारे भारत की अधूरी तस्वीर है अगर हम तस्वीर को पूरा करने की कोशिश करेंगे तो यह बदरंग हो जाएगी। उन बेटियों के आँसुओं से इसके रंग बिखर जाँएगे जिन्हें इनकी तरह खिलने का मौका नहीं दिया गया और असमय ही कुचल दिया गया --चाहे जन्म लेने से पहले माँ की कोख में या शादी के बाद दहेज की आग में। तो क्या तस्वीर के बिगड़ जाने के डर से इसे अधूरा ही रहने दें और कबूतर की तरह आँखें मूँद कर बैठे रहें या फिर कूचा उठाकर कुछ इस प्रकार से तस्वीर पूरी करें कि वहाँ केवल हँसती मुस्कुराती आँखें हों न कि सवाल पूछती आँखें।

अब तक तो आप समझ ही गए होंगे कि बात हमारी उन बेटियों की हो रही है जिन्हें दहेज की आग ने जिंदा जला दिया। हर रोज अखबार में ससुराल वालों की प्रताड़ना के आगे हार मानती बेटियों की कहानियाँ होती हैं। क्या आप जानते हैं कि वर्ष 2014 में 20,000 से ज्यादा शादी शुदा महिलाओं ने आत्महत्या की है? एक रिसर्च में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि विदेशों में शादी शुदा लोगों में आत्महत्या का प्रतिशत कम पाया जाता है वहाँ शादी महिलाओं को भावनात्मक सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा प्रदान करती है जबकि भारत में शादी शुदा महिलाएँ आत्महत्या अधिक करती हैं क्योंकि यहाँ शादी दहेज रूपी दानव से संघर्ष की शुरुआत होती है और अधिकतर मामलों में इस दानव की ही विजय होती है।
2014
की ही बात करें तो इस वर्ष 5650 किसानों ने आत्महत्या की थी जो कि दहेज हत्या /आत्महत्या के अनुपात में चार गुना कम होने के बावजूद अखबारों की सुर्खियाँ बनी लेकिन हमारी बेटियों की चीखें किसी अखबार /अधिकारी /नेता को सुनाई नहीं दीं ! क्या हमारा समाज इसे स्वीकार कर चुका है या फिर हम हर घटना को वोट बैंक और राजनीति के तराजू में तौलने के आदी हो चुके हैं। चूँकि हमारी बेटियाँ वोट बैंक नहीं हैं तो यह मुद्दा  भी नहीं है। उन्हें जीवन भर सहना  चुप रहना और एडजस्ट करना सिखाया जाता है इस हद तक कि वे एक दिन चुपचाप मौत से भी एडजस्ट कर लेती हैं और हम देखते रह जाते हैं।

अगर आंकड़ों की बात करें तो हर तीन मिनट में स्त्रियों के विरुद्ध एक अपराध होता है इसमें घरेलू हिंसा 55% है। 2001 से 2005 के बीच कन्या भ्रूण हत्या के 6 लाख 92 हजार मामले प्रकाश में आए। देश में होने वाली आत्महत्याओं का 66% विवाहितों द्वारा की गई।विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विश्व भर में होने वाली आत्महत्याओं का 10% अकेले भारत में होती हैं। स्त्रियों की समाज में दशा का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि विश्व के किए जाने वाले कुल श्रम  (घण्टों में) का 67%  स्त्रियों के हिस्से में  जाता है जबकि आमदनी  में उनका हिस्सा केवल 10% है। स्त्रियों को पुरुषों से औसतन 20-40% कम वेतन दिया जाता है। कितनी विडम्बना है कि एक तरफ हमारी संस्कृति हमें सिखाती है  यत्र ना्यरस्तुपूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता: और दूसरी तरफ यथार्थ के धरातल पर स्त्रियों की यह दयनीय दशा। टेकनोलोजी के रथ पर सवार होकर डिजिटल इंडिया का लक्ष्य हासिल करने का सपना देश की आधी आबादी की इस दशा के साथ क्या हम हासिल कर पाएंगे? दहेज की आग में झुलसती हमारी बेटियों की चीखें विकास के सुरों को बेसुरा नहीं करेंगी?
हम कहते हैं कि स्त्री घर की नींव होती है वह चाहे तो घर को स्वर्ग बना दे । हम सबको धरती पर ही स्वर्ग देने वाली इस स्त्री को स्वर्ग देने की जिम्मेदारी किसकी है?
हम लोग लड़कियों को शिक्षित करते हैं उन्हें शादी के बाद ससुराल में एडजस्ट करना सिखाते हैं लेकिन आज समय की मांग है कि ससुराल वालों को भी शिक्षित किया जाए कि वे बहु को अपने परिवार के सदस्य के रूप में स्वीकार करें न कि अपने स्वार्थ पूर्ति का साधन।
हालांकि सरकार ने दहेज प्रथा रोकने के लिए कड़े कानून बनाए हैं -- क्रिमिनल एमेन्डमेन्ट  एक्ट की धारा 498 के तहत एक विवाहित स्त्री पर उसके पति /रिश्तेदार द्वारा किया गया अत्याचार/ क्रूरता 
दण्डनीय अपराध है और शादी के सात साल के भीतर स्त्री की मृत्यु किसी भी परिस्थिति में ससुराल वालों को कटघड़े में खड़ा करती है। बावजूद इसके आज तक हमारा समाज  ऐसे विरोधाभासों से भरी परिस्थिति का सामना कर रहा है जहाँ एक तरफ कानून की धज्जियां उड़ाते हुए महिलाओं को दहेज रूपी दानव की बली चढ़ाया जा रहा है और दूसरी तरफ कुछ मामले ऐसे भी हैं जहां दहेज ऐक्ट का दुरुपयोग इस हद तक हो रहा है कि इसे  कहा जाने लगा है" लीगल टेरेरिज्म "

जहाँ  मुस्लिम और ईसाई समाज में विवाह एक समझौता होता है वहीं हिन्दू धर्म में विवाह एक संस्कार है किन्तु दुर्भाग्य की बात है कि आज इस संस्कार का दुरुपयोग महिलाओं के शोषण के लिए हो रहा है।
अगर हम दहेज शब्द के मूल को समझें तो इसका संस्कृत में समानांतर शब्द है --"दायज "अर्थात् उपहार या दान । दहेज वस्तुतः कन्या पक्ष की ओर से स्वेच्छा एवं संतोष से अपनी पुत्री के विवाह के समय उसे दिए जाने वाले उपहार या भेंट को कहते हैं। लेकिन समय के साथ इसका कुत्सित रूप उभर कर आने लगा है।टी ओ आई की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार एक 28 साल की महिला सरिता(परिवर्तित नाम)  को चेन्नई के के एम सी अस्पताल में 90% जली हुई स्थिति में भर्ती कराया गया उसका दोष एक नहीं था कई थे जिसकी उसे सज़ा दी गई थी --सर्वप्रथम तो वह लड़की थी,वह भी साधारण सी दिखने वाली , कालेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद माँ की इच्छानुसार उनके ढूंढे वर से शादी कर ली।पिताजी का देहांत तो बचपन में ही हो गया था सोचती थी कि बचपन की कमियाँ सपनों के राजकुमार का साथ पाकर भूल जाऊंगी और बुढ़ापे में  माँ का सहारा बनूँगी । लेकिन सपने तो सपने ही होते हैं हकीकत से कोसों दूर ! शादी के बाद से ही लगातार सास ससुर व पति दहेज की मांग करने लगे तानों से शुरू होने वाली बात हाथापाई तक पहुँच गई, बात बात पर पति व सास से मार खाना दिन चर्या का हिस्सा बन चुका था। यह सब माँ को बताती भी कैसे? कहाँ तो वह माँ का सहारा बनने का सोच रही थी और कहाँ उसका सपनों का राजकुमार उसे फिर से माँ पर बोझ बना रहा था। विधवा माँ ने कैसे उसे पढ़ाया और उसकी शादी की वह सब जानती थी उसकी शादी के कारण माँ पर चढ़े कर्ज़ 
के बोझ से वह अनजान नहीं थी भले ही माँ ने उसे नहीं जताया पर वह सब जानती थी। उसने पति को अपनी परेशानी बताने की बहुत कोशिश की लेकिन वो कुछ समझना ही नहीं चाहता था।जैसे तैसे दिन निकल रहे थे लेकिन हद तब हो गई जब उसने एक बेटी को जन्म दिया अपने घर में बेटी का पैदा होना वह बरदाश्त नहीं कर पाया और एक दिन जब वह सो रही थी तो उसके पति ने उसके बिस्तर पर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी पुलिस ने मौके से मिट्टी के तेल में भीगा अधजला गद्दा बरामद कर लिया है।जब तक सरिता की माँ कुछ समझ पाती उसकी बेटी इस दुनिया से जा चुकी थी। हमारे देश में एसी कितनी ही सरिता हैं जिनकी बली थमने का नाम नहीं ले रही और कितनी ही सरिताएँ इन यातनाओं के आगे हार मानकर स्वयं अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेती हैं लेकिन इनकी आत्महत्या पलायन नहीं प्रतिशोध होता है --जी हाँ चौंकिए मत , यह व्यक्तिगत सामाजिक आर्थिक कारणों से आहत होकर उठाया गया कदम होता है जब वह खुलकर प्रतिशोध नहीं ले पाती तो ऐसे ले लेती है। दरअसल दुशमन से लड़ना आसान होता है लेकिन अपनों से मुश्किल संस्कार एवं सामाजिक परिवेश परिवार से टक्कर लेने नहीं देते लेकिन दूसरी तरफ अपने प्रति दुर्व्यवहार सहना भी मुश्किल होता है लाचारी में प्रतिशोध का यही उपाय सूझता है कि मर जाऊंगी तो इन्हें कानून से सजा भी मिलेगी और समाज में बदनामी भी होगी। लेकिन विडम्बना तो देखिए ऐसी अनेकों सरिताओं के पति न सिर्फ कानून से बचने में सफल हो जाते हैं अपितु दूसरा विवाह भी कर लेते हैं।
तो यह काम कानून से तो होगा नहीं समाज में जागरूकता पैदा करनी होगी  "दुल्हन ही दहेज" है इस वाक्य को  सही मायने में समाज में स्वीकृति मिलनी चाहिए। हमारे युवा समाज को बदलने की क्षमता रखते हैं अगर आज का युवा प्रण कर ले कि न वो दहेज देगा न लेगा तो आज नहीं तो कल समाज से यह कुरीति समाप्त हो सकती है। इसके लिए आवश्यक है कि युवा  पढ़ा लिखा हो मेहनती हो,उसे स्वयं पर भरोसा हो अपनी जीवन संगिनी को हमसफ़र बनाए न कि सफर को आसान बनाने के लिए  प्रयोग में लाया जाने वाला साधन।
किसान धरती में बीज बोता है , मौसम साथ दे और परिस्थितियाँ अनुकूल हो तो खेत फसलों से लहलहा जाते हैं और किसानों के चेहरे खिल उठते हैं उसी प्रकार हमारी बेटियाँ सुनीता विलियम बनकर आकाश की ऊंचाईयों को छूने का माद्दा रखती हैं उन्हें अनुकूल परिस्थितियां देकर उड़ने तो दो !

डाँ नीलम महेंद्र 


Thursday, 16 June 2016

पलायन के साये मे कैसे बढ़ेगा इंडिया ?

पलायन के साये मे कैसे बढ़ेगा इंडिया ?
विस्थापन अथवा पलायन --एक ऐसी परिस्थिति जिसमें मनुष्य किसी भी कारणवश अपना घर व्यवसाय जमीन आदि छोड़ कर किसी अन्य स्थान पर जाने को मजबूर हो जाता है या फिर कर दिया जाता है।जीवन की सुरक्षा सर्वोपरि बन जाती हैं और अपनी सभी सुख सुविधाओं से युक्त वर्तमान परिस्थितियों को त्याग कर वह किसी ऐसे स्थान की तलाश में भटकने के लिए मजबूर हो जाता है जहाँ वह शांति से जीवन यापन कर सके।




भारत में अब तक होने वाले विस्थापनों की बात करें तो सबसे बड़ा विस्थापन 1947 में भारत और पाकिस्तान के बँटवारे के दौरान हुआ था जिसकी पीड़ा आज भी कुछ दिलों को चीर जाती होगी। इसी प्रकार 1990 में कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था -इन 26 सालों में सिर्फ एक ही परिवार वापस जा पाया है। 1992 में असम से पलायन हुआ था जिसकी आँच बैंगलुरु पूना चेन्नई और कोलकाता तक पहुँच गई थी और उत्तर पूर्व के लोगों को अपनी नौकरी व्यापार सब कुछ छोड़ कर पलायन करना पड़ा था। केरल और बंगाल भी इससे अछूते नहीं रहे हैं।

योजना आयोग द्वारा प्रस्तुत 11वीं पंचवर्षीय योजना के दस्तावेजों के अनुसार किसी प्रांत से उसी प्रांत में और एक प्रांत से दूसरे प्रांत में पलायन करने वालों की संख्या पिछले एक दशक में नौ करोड़ सत्तर लाख तक जा चुकी है इसमें से 6करोड़ 60 लाख लोगों ने ग्रामीण से ग्रामीण इलाकों में और 3 करोड़ 60 लाख लोगों ने गाँवों से शहरों की ओर पलायन किया है। दरअसल समाज में जब जब मानवीय मूल्यों का ह्रास होता है और अधिकारों का हनन होता है मानव पलायन के लिए विवश होता है। यह अलग बात है कि बेहतर भविष्य की तलाश में हमारे देश में तो छात्रों और प्रतिभाओं का भी पलायन सालों से होता आया है।

आज विस्थापन की आग उत्तर प्रदेश के शामली जिले के कैराना कस्बे तक पहुँच गई है।जो गांव आज तक देश का एक साधारण सा आम कस्बा हुआ करता था और जहाँ के लोग  शांतिपूर्ण तरीके से अपनी जिंदगी जी रहे थे वह कस्बा आज अचानक लाइम लाइट में आ गया है और राजनैतिक दलों एवं मीडिया की नई कर्मभूमी बन चुका है। नेता इसका राजनैतिक उपयोग करने  और मीडिया इसके द्वारा अपनी टी आर पी बढ़ाने के लिए होड़ में लगे हैं।
कैराना सर्वप्रथम 2013 में साम्प्रदायिक हिंसा के कारण चर्चा में आया था और आज पुनः सुर्खियों में है। स्थानीय सांसद हुकुम सिंह ने प्रेस कान्फेन्स कर मीडिया के सामने वर्ष 2014 से पलायन करने वाले 346 परिवारों की सूची जारी की है और कहा है कि  कैराना को कश्मीर बनाने की साजिश की जा रही है। सांसद ने 10 ऐसे लोगों की सूची भी सौंपी जिनकी हत्या रंगदारी न देने पर कर दी गई थी और कहा कि हालात बेहद संवेदनशील हैं। उन्होंने जहानपुरा का उदाहरण प्रस्तुत किया जहाँ पहले 69 हिन्दू परिवार थे किन्तु आज एक भी नहीं है। इस पूरे मामले को प्रशासनिक जाँच में सही पाया गया है।इसके प्रत्युत्तर में कांग्रेस नेता नीम अफजल का कहना है कि ये लोग रोजगार अथवा कारोबार के कारण पलायन कर रहे हैं।वहीं स्थानीय लोगों का कहना है कि कारागार में बन्द गैंगस्टर मुकिमकला के गुण्डों द्वारा लूट और रंगदारी के कारण परिवारों को पलायन को मजबूर होना पड़ा।  इस मामले का संज्ञान लेते हुए मानव अधिकार आयोग ने भी यू पी सरकार को नोटिस जारी कर के एक सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है।
उधर भाजपा की नौ सदस्यीय जाँच कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पलायन के पीछे संगठित अपराधी गिरोह है जो कि एक समानांतर सरकार की तरह कार्य कर रहा है और लाचार लोगों द्वारा पुलिस में शिकायत करने पर पुलिस भी  "एडजस्ट" करने का सुझाव देकर अपनी कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है।

यह बात तो कांग्रेस भी मान रही थी और भाजपा भी मान रही है कि पलायन हुआ है स्थानीय प्रशासन भी इस तथ्य को स्वीकार कर रहा है तो इन आरोप प्रत्यारोपों और जाँचों के बीच पलायन केवल एक राजनैतिक उद्देश्य प्राप्ती का मुद्दा बनकर न रह जाए।
आम आदमी अपने आस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है और हमारे नेता रोम के सम्राट नीरो की तरह अपनी अपनी बाँसुरी बजाने में व्यस्त हैं। बेहतर होता कि पलायन के मूलभूत कारणों को जानकर उन्हें जड़ से खत्म करने की दिशा में कुछ ठोस कदम उठाए जाते न कि खोखली बयानबाजी! जिस आम आदमी के कीमती वोट की बदौलत आप सत्ता की ताकत एवं सुख को प्राप्त कर जीवन  की  ऊँचाइयाँ हासिल करते हैं वह स्वयं तो आजादी के 70 सालों बाद भी वहीं के वहीं खड़ा है। हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी कहते हैं कि हमारे देश के एक अरब लोग ही हमारी असली ताकत हैं और यदि वे सब एक कदम भी आगे बढ़ाएँगे तो देश आगे बढ़ जाएगा लेकिन साहब ये लोग बढ़ें तो कैसे? कभी स्थानीय नेताओं द्वारा संरक्षित गुण्डे तो कभी प्रशासन,कभी स्थानीय सरकार तो कभी मौसम की मार ये सब उसे बढ़ने नहीं देते। सरकारें टैक्स तो वसूल लेती हैं लेकिन सुरक्षा और सुविधाएं दे नहीं पातीं। चाहे नेता हों या अफसर कोई भी अपनी कुर्सी से उठकर एक कदम आगे बढ़ाकर अपने अपने क्षेत्र का निरीक्षण तक नहीं करता  सारी सरकारी मशीनरी काग़ज़ों पर ही चल रही है एक  फाइल तो दक्षिणा के बिना आगे बढ़ती नहीं। आज का सरकारी कर्मचारी चुनी हुई सरकार से तनख्वाह लेता है काम करने की और समानांतर सरकार चलाने वालों से काम न करने की (हालांकि सभी सरकारी अधिकारी ऐसे नहीं है कुछ ईमानदार भी हैं भले ही वे मुठ्ठी भर हैं लेकिन शायद इन्हीं की बदौलत देश चल रहा है )। अगर  हमारे नेता और हमारे अफसर एक एक कदम भी ईमानदारी से बढ़ाकर देश की सेवा के लिए उठा लें तो हमारा आम आदमी अनेकों कदम आगे चला जाएगा,उसका जीवन स्तर सुधर जाएगा। किन्तु जिस देश का आदमी पलायन कर के कदम पीछे की ओर ले जाने को मजबूर होता हो उस देश का भविष्य तो आप स्वयं ही समझ सकते हैं कहाँ जाएगा।
डाँ नीलम महेंद्र 

Saturday, 11 June 2016

क्यों आज का युवा बरोजगार है उद्यमी नहीं

क्यों आज का युवा बरोजगार है उद्यमी नहीं 

बिहार बोर्ड मेरिट घोटाले के बाद बिहार विश्वविद्यालय परीक्षा बोर्ड के अध्यक्ष लाल केश्वर प्रसाद सिंह ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है।आरंभिक जाँच में सुबूत मिले हैं कि अयोग्य छात्रों की कापियां बदल कर उन्हें टापर बना दिया गया।
भारत में शायद ही कोई सरकारी विभाग है जो भ्रष्टाचार से अछूता हो बल्कि यह कहना गलत नहीं होगा कि यह सम्पूर्ण कार्य प्रणाली में  शामिल हो कर सिस्टम का हिस्सा बन चुका है।किन्तु हमारे बच्चे जो कि इस देश का भविष्य हैं और इस देश की नींव हैं, क्या शिक्षा विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार से हमारे बच्चों और देश दोनों के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं हो रहा? हाल ही में विविध एजेंसियों द्वारा जारी रिपोर्ट में इस तथ्य का खुलासा हुआ है कि विश्व के पहले दो सौ चुनिन्दा शिक्षण संस्थानों की सूची में किसी भी भारतीय शिक्षण संस्थान का नाम शामिल नहीं है। एसोचैम के राष्ट्रीय महासचिव डी एस रावत   शिक्षण संस्थानों की निम्न गुणवत्ता और मूलभूत ढाँचे की कमी को इसका जिम्मेदार मानते हैं।इससे  पहले नेशनल एम्प्लायबिलिटि रिपोर्ट में बताया गया था कि देश के 80% इंजीनियरिंग स्नातक रोजगार देने के काबिल नहीं हैं। जो राष्ट्र स्वयं को विश्व गुरु कहलाने की ओर अग्रसर हो क्या यह उसके लिए बेहद संवेदनशील एवं शर्म का विषय नहीं है? जो बौद्धिक विरासत हमारे मनीषी हमें दे कर गए हैं हम उसे आगे ले जाने के बजाय आज इस दयनीय स्थिति में ले आए कि दसवीं में टाप करने वाले विद्यार्थी उस विषय का नाम तक नहीं बता पाते जिसमें उन्होंने टाप किया है!

शायद हमारा शिक्षा का उद्देश्य बदल गया है --शिक्षा आज धनार्जन का साधन बन चुका है और किसी व्यापारी से नैतिकता की अपेक्षा शायद सबसे बड़ी भूल होती है।
स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि शिक्षा का उद्देश्य "मैन मेकिंग एन्ड कैरेक्टर बिल्डिंग "अर्थात् व्यक्तित्व विकास एवं चरित्र निर्माण होता है। हमारे शास्त्रों में भी विद्या का एक निश्चित उद्देश्य बताया गया है --"सा विद्या या विमुक्तये’’ अर्थात् विद्या वो है जो मुक्ति के द्वार खोले ,स्वयं से साक्षात्कार कराए ,ऐसा शिक्षित युवा जब समाज का हिस्सा बनता था तो सामाजिक समृद्धि का विकास होता था किंतु आज जो शिक्षा हमारे द्वारा परोसी जा रही है वह केवल नम्बर लाकर नौकरी पाने तक सीमित है तथा उसका अन्तिम लक्ष्य भौतिक समृद्धि प्राप्त करना है। ऐसी शिक्षा के बारे में गांवों में एक कहावत प्रचलित है --"थोर पढ़े तो हर छूटै ,ढेर पढ़े  तो घर छूटै "!
आज हमारे विश्वविद्यालयों से हर साल लगभग तीन मिलियन ग्रैजुएट तथा पोस्ट ग्रैजुएट छात्र निकलते हैं, सात मिलियन दसवीं या बारवीं के बाद पढ़ाई छोड़ कर रोजगार की तलाश में भटकते हैं। इस प्रकार हर साल दस मिलियन शिक्षित युवा  हमारे समाज का हिस्सा बनते हैं लेकिन इनमें से कितने नौकरी पाने में सफल हो पाते हैं?।एक सत्य यह भी है कि देश में आज कुशल एवं प्रतिभाशाली युवाओं का आभाव है। बड़ी से बड़ी कम्पनियाँ आज योग्य एवं प्रशिक्षित युवाओं की तलाश में भटक रही हैं। आज की शिक्षा की देन, देश में मौजूद इस भ्रामक स्थिति के बारे में क्या कहिए कि एक तरफ समाज में बेरोजगार शिक्षित युवाओं का सैलाब है और दूसरी तरफ प्रतिभा का आभाव है! इसका उत्तर एक शब्द में सीमित है --योग्य /काबिल /निपुण /प्रतिभा सम्पन्न शिक्षित ऐसा युवा जो कि स्वयं उद्यमी हो न की नौकरी के लिए भटकते युवा ।जिस देश ने चाणक्य आर्यभट्ट रामानुजम टैगोर जगदीश चन्द्र बोस जैसी प्रतिभाएं दीं आज उस देश के युवा को हम किस ओर ले जा रहे हैं कि 15-18 साल की शिक्षा के बाद भी वह कोई सामान्य कार्य करने के लायक भी नहीं होता। एक औसत इंसान को सफल कैसे बनाया जाए हम इस पर ध्यान  नहीं देते ,उसे शिक्षित तो करते नहीं परीक्षा अवश्य लेते रहते हैं। हम साक्षर होने और शिक्षित होने के फर्क को भूल चुके हैं।

गाँधी जी कहते थे --"अक्षर ज्ञान न तो शिक्षा का अंतिम लक्ष्य है और न ही उसका आरंभ" किन्तु आज की शिक्षा केवल रटकर नम्बर लाने तक सीमित है। इससे बड़ी विडम्बना क्या होगी कि हमारे बच्चे 90% से भी अधिक नम्बर लाने के बावजूद मनपसंद कालेज अथवा सब्जेक्ट में एडमीशन नहीं प्राप्त कर पाते!
हमारी शिक्षा नीति याद करने पर ज़ोर देती है जो जितने अच्छे से रटकर परीक्षा में लिख दें वही टाप करता है पढ़ाई केवल नम्बरों के लिए होती है परीक्षाओं के बाद ज्ञान भुला दिया जाता है क्योंकि वह रटा रटाया होता है समझा हुआ नहीं। मौलिक एवं रचनात्मक प्रतिभा पर पारम्परिक रूप से रटने वाली प्रतिभा हावी रहती है क्या यह हमारी शिक्षा नीति की बुनियादी खामी नहीं है? हमारा देश विश्व के सर्वाधिक इंजीनियर उत्पन्न करता है जो  कि देश विदेश की बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के कॉल सेन्टरों पर कार्यरत हैं और यही वो जगह है जहाँ हमारी इंजीनियरिंग समाप्त हो जाती है।
इन सभी बातों का एक ही समाधान है --शिक्षा प्रणाली ऐसी हो जो स्वावलंबी युवा उत्पन्न करे न कि रोजगार की तलाश में भटकते युवा। शिक्षित युवा उद्यमी,आविष्कारक, विचारकलेखक, कलाकार, चित्रकार बनकर निकलें न कि मेकेनाइज़ड रोबोट जिन्हें रटने अथवा याद करने के अलावा और कुछ नहीं आता।किन्तु दुर्भाग्यवश आज हर बच्चा और उसके माता पिता उसी रैट रेस /चूहा दौड़ में हिस्सा लेते हैं जिसमें समझने से ज्यादा रटने पर जोर दिया जाता है बच्चों पर टीचर और  माता पिता ही नहीं पूरे समाज का दबाव होता है अधिक से अधिक नम्बर लाने के लिए।
हम यह भूलते जा रहे हैं कि शिक्षा का उद्देश्य नम्बर न होकर ज्ञान होना चाहिए किताबी ज्ञान की अपेक्षा व्यवहारिक ज्ञान और प्रयोगों पर बल दिया जाना चाहिए। शिक्षा को बालक के बौद्धिक विकास तक सीमित करने की अपेक्षा उसके शारीरिक एवं आध्यात्मिक विकास पर भी ध्यान देना चाहिए।
याद है हमारी पुरानी गुरुकुल परम्परा जिसमें बालक का सर्वांगीण विकास किया जाता था और गुरु शिष्य की शिक्षा पूर्ण होने के बाद गुरु दक्षिणा लिया करते थे।शिक्षा देना एक आर्य कार्य है अफसोस की बात है कि आज यह कार्य उन लोगों के हाथ में है जो कि इसे बिना जोखिम कम दबाव एवं अच्छी तनखवाह वाला सुरक्षित पेशा समझते हैं। इस बात को एक शिक्षक द्वारा अपने शिष्यों से कहे गए इस कथन से समजा जा सकता हैं कि --"देखो बच्चों तुम लोग अगर नहीं पढ़ोगे तो नुकसान तुम्हारा ही होगा क्योंकि मुझे तो महीने के आखिर में अपनी तनख्वाह मिल ही जाएगी।" ऐसा नहीं है कि सभी  शिक्षक ऐसे हैं लेकिन फिर भी  देश में ऐसे हजारों शिक्षक रोज हमारे बच्चों की कलात्मकता एवं मौलिकता का गला घोंट देते हुए।ऐसे लोगों को शिक्षा के कार्य से मुक्त करके उन लोगों को इस कार्य को सौंपना चाहिए जो कि देश के भविष्य के निर्माण में अपना योगदान देकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाने को तत्पर हों।अगर भारत को विश्व गुरु बनना है तो शिक्षा के क्षेत्र में उद्यमी हों रचनात्मकता से भरे अपने अपने क्षेत्र के लीडर हों न कि तनख्वाह पर रखे हुए कर्मचारी।

डॉ नीलम महेंद्र