Friday, 30 September 2016

भारत आतंकवाद के खिलाफ है किसी देश के नहीं

भारत आतंकवाद के खिलाफ है किसी देश के नहीं
" वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमाँ ,
हम अभी से क्या बताएँ क्या हमारे दिल में है "
29
सितंबर रात 12.30 बजे
भारत के स्पेशल कमान्डो फोर्स के जवान  जो कि विश्व का सबसे बेहतरीन फोर्स है  , Ml-17 हेलिकॉप्टरों से  LOC के पार पाक सीमा के भिंबर , हाँट भीतर उतरते हैं 
3
किमी  के दायरे  में घुस कर स्प्रिंग ,केल और लीपा सेक्टरों में सर्जीकल स्ट्राइक करके 8 आतंकवादी शिविरों को नष्ट करते हैं। 

इस हमले में न सिर्फ वहाँ स्थित सभी आतंकवादी शिविर और उसमें रहने वाले आतंकी नष्ट हुोते हैं बल्कि उन्हें बचाने की कोशिश में पाकिस्तान सेना के दो जवानों की भी मौत हो जाती है और 9 जवान घायल हो जाते हैं। 
सभी भारतीय जवान इस ओपरेशन को सफलतापूर्वक अंजाम देकर कुशलतापूर्वक भारतीय सीमा में लौट आते हैं।
भारतीय सेना की ओर से पाक डीजीएनओ को इस बारे में सूचित किया जाता है
पाकिस्तानी सेना का बयान आता है ,  " भारत की ओर से कोई सर्जीकल स्ट्राइक नहीं हुई है, यह सीमा पार से फाइरिंग थी जो पहले भी होती रही है।"
इससे बड़ी सफलता किसी देश के लिए क्या होगी कि वह छाती ठोक कर हमला करके सामने वाले देश को अधिकारिक तौर पर सम्पूर्ण विश्व के सामने स्वीकार कर रहा है कि हाँ हमने तुम्हारेी सीमा में 3 किमी तक घुस कर हमला किया है और अपने काम को अंजाम देने के बाद चुपचाप वापस आ गए हैं ।लेकिन सामने वाला देश हमले से ही इंकार कर रहा हो ! यह पाक के लिए कितनी बड़ी विडम्बना है कि बेचारा जब स्वयं आतंकवादियों द्वारा हमला करता है तो भी इंकार करता है और जब हम बदला लेने के लिए उस पर हमला करते हैं तो भी उसे इंकार करना पड़ता है।
जब पूरा देश चैन की नींद सो रहा था भारतीय फौज ने वो काम कर दिया जिसकी प्रतीक्षा पूरा भारत 18 सितंबर से कर रहा था। यह एक बहुत प्रतीक्षित कदम था जैसा कि हमारी सेना ने पहले ही कहा था कि हमारे सैनिकों के बलिदान का बदला अवश्य लिया जाएगा लेकिन समय, स्थान और तरीका हम तय करेंगे ! और वह उन्होंने किया।
किसी भी देश के लिए इस प्रकार के हमलों का सबसे कठिन पहलू होता है अन्तराष्ट्रीय दबाव, लेकिन भारत ने यहाँ भी बाजी मार ली है।

अपने प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही मोदी जी ने पाकिस्तान की तरफ  दोस्ती का हाथ बढ़ाने के लिए जो कदम उठाए  थे और जिस प्रकार की सहशीलता का परिचय उन्होंने दिया था आज उनकी यही कूटनीति अन्तराष्ट्रीय समुदाय को भारत का साथ देने के लिए विवश कर रही है। यह प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति  , राजनीति और कूटनीति की सफलता ही है कि आज विश्व भारत के साथ है और पाकिस्तान अलग थलग पड़ चुका है।
अमेरिकी अखबार वाॅल स्ट्रीट जर्नल ने लिखा है , "मोदी संयम बरत रहे हैं  , पाक इसे हल्के में न ले। पाक सहयोग नहीं करता है तो अलग थलग पड़ जाएगा। अगर पाकिस्तानी सेना सीमा पार हथियार और आतंकी भेजना जारी रखता है तो भारत के पास कारवाही करने के लिए मजबूत आधार होगा  "
यह मोदी की ही विशेषता है कि उन्होंने पाक को घेरने के लिए केवल सैन्य कार्यवाही का सहारा नहीं लिया बल्कि उसे चारों ओर से घेर लिया है। अन्तरराष्ट्रीय  स्तर पर एक तरफ इसी महीने पाक में होने वाला सार्क सम्मेलन निरस्त होने की कगार पर है चूँकि प्रधानमंत्री मोदी द्वारा इस सम्मेलन में भाग लेने से इनकार करने के बाद बांग्लादेश अफगानिस्तान  और भूटान ने भी इंकार कर दिया है वहीं दूसरी ओर हमारी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने यूएन में पाक को दो टूक सुनाते हुए उसे सबसे बड़े अन्तराष्ट्रीय मंच पर बेनकाब किया और सम्पूर्ण विश्व को आतंकवाद पर एक साथ होने का आहवान करते हुए पाक को अलग थलग करने का महत्वपूर्ण कार्य किया ।
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अमेरिका और ब्रिटेन को भारत के इस कदम की पूर्व जानकारी थी।भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की 28 ता० को अमेरिकी सुरक्षा सलाहकार सुसेन राइस से फोन पर लम्बी बातचीत हुई थी और उन्होंने उरी हमले का विरोध किया था। इससे पहले यू एस सेकरेटरी आफ स्टेट  जान कैरी की भी भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से दो दिन में दो बार बात हुई थी। यह सभी बातें इशारा कर रही हैं कि जो अमेरिका कभी पाकिस्तान का साथ खड़ा था आज वह आतंकवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई में कम से कम पाक के साथ तो नहीं है और यूएन के ताजा घटनाक्रम ने पाकिस्तान और आतंकवाद के बीच की धुंधली लकीर भी मिटा दी है।सम्पूर्ण विश्व आज जब आतंकवाद के दंश की जड़ों को तलाशता है, तो चाहे 9/11 हो , चाहे ब्रसेलस हो या फिर अफगानिस्तान सीरिया या इराक ही क्यों न हों , हमलावर लश्कर  , जैश हिजबुल या तालीबान या कोई  भी हों उसके तार कहीं न कहीं पाकिस्तान से जुड़ ही जाते हैं। आखिर विश्व इस बात को भूला नहीं है कि ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान की धरती पर ही मारा गया था । भारत का मोस्ट वान्टेड अपराधी दाउद को भी पाक में ही पनाह मिली हुई है। आज यह  भारत की उपलब्धि है कि वह विश्व को यह भरोसा दिलाने में कामयाब हुआ है कि इस प्रकार की सैन्य कार्यवाही  किसी देश के खिलाफ न होकर केवल आतंकवाद के खिलाफ है। जो बात आज़ादी के 57 सालों में हम दुनिया को नहीं समझा पाए वह इन 2.5 साल में हमने न सिर्फ समझा दी बल्कि कर के भी  दिखा दी। 
इतना ही नहीं द्विपक्षीय स्तर पर भी भारत ने सिंधु जल संधि पर आक्रमक रख दिखाया है और साथ ही उससे  एम एफ स्टेट अर्थात् व्यापार करने के लिए मोस्ट फेवरेबल स्टेट का दर्जे  पर भी पुनर्विचार करने का मन बना लिया है।
इस प्रकार चारों ओर से घिरे और अन्तराष्ट्रीय स्तर पर भी अकेले पड़ चुके पाक को इससे बेहतरीन जवाब दिया भी नहीं जा सकता था। हम सभी भारत वासियों की ओर से भारतीय सेना को बहुत बहुत बधाई आज एक बार फिर हमारी सेना ने सम्पूर्ण विश्व के सामने भारत का मान बढ़ा दिया है , जैसे हमारा हर सैनिक कह रहा हो,

है  लिए हथियार दुश्मन ताक में बैठा उधर 
और हम तैयार हैं सीना लिए अपना इधर "
डॉ नीलम महेंद्र

Monday, 19 September 2016

शहादतों का सिलसिला थमता क्यों नहीं

शहादतों का सिलसिला थमता क्यों नहीं
18 सितम्बर 2016 घाटी फिर लाल हुई !
ये लाल रंग लहू का था और लहू हमारे सैनिकों का  !
 सोते हुए निहत्थे सैनिकों पर इस प्रकार का कायरतापूर्ण हमला ! 

इसे क्या कहा जाए ? 

देश के लिए सीने पर गोली तो भारत का सैनिक ही क्या इस देश का आम आदमी भी खाने को तैयार है साहब  !
लेकिन इस प्रकार कायरतापूर्ण हमले में पीठ पीछे वार !
और ऐसे छद्म हमलों में अपने वीर सैनिकों की शहादत हमें कब तक सहनी पढ़ेगी ?
यह कोई पहला आतंकवादी हमला नहीं है लेकिन काश हम सभी एक दूसरे से प्रण करते कि यह पहला तो नहीं है किन्तु आखिरी अवश्य होगा।
काश इस देश के सैनिकों और आम आदमी की जानों की कीमत पहली शहादत से ही समझ ली गई होती तो हम भी अमेरिका फ्रांस ब्रिटेन रूस और कनाडा की श्रेणी में खड़े होते। 
काश हमने पहले ही हमले में दुश्मन को यह संदेश दे दिया होता कि इस देश के किसी भी जवान की शहादत इतनी सस्ती नहीं है!
काश हम समझ पाते कि हमारी सहनशीलता को कहीं कायरता तो नहीं समझा जा रहा  ?
आज़ादी से लेकर आज तक पाकिस्तान द्वारा घाटी में लगातार वार किया जा रहा है तीन आमने सामने के युद्ध हारने के बाद भोले भाले कश्मीरियों को गुमराह करके लगातार अस्थिरता फैलाने की कोशिशों में लगा है। अब जबकि वह अन्तराष्ट्रीय समुदाय के सामने बेनकाब हो गया है और जानता है कि पानी सर से ऊपर हो चुका है तो भारत को परमाणु हमले की धमकी देने से भी बाज नहीं आ रहा।
आज पूरे देश में गुस्सा है और हर तरफ से बदला लेने की आवाजें आ रही हैं । यह एक अच्छी बात है कि देश के जवानों पर हमले को इस देश के हर नागरिक ने अपने स्वाभिमान के साथ जोड़ा और कड़ी कार्यवाही की मांग कर रहे हैं।
हर ओर से एक ही आवाज , अब और नहीं  ! 

आज हर कोई जानना चाहता है कि क्या हुआ  ,कैसे हुआ , कब हुआ ?
लेकिन काश कि हमारे सवाल यह होते कि  'क्यों हुआ  ? 
और इसे कैसे रोका जाए  ? 
युद्ध किसी भी परिस्थिति में आखिरी विकल्प होना चाहिए और खास तौर पर तब जब दोनों ही देश परमाणु हथियारों से लैस हों ।
युद्ध  सिर्फ दोनों देशों की सेनाएँ नहीं लड़तीं और न ही उससे घायल होने वाले युद्ध भूमि तक सीमित होते हैं।
युद्ध तो खत्म हो जाता है लेकिन उसके घाव नासूर बनकर सालों रिसते हैं।
सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था हिल जाती है और समय थम सा जाता है। 
हमारी लड़ाई आतंकवाद से है वो हम लड़ेंगे और अवश्य जीतेंगे लेकिन हमारी जीत इसमें है कि इस लड़ाई में बहने वाला ख़ुन सिर्फ आतंक का हो न तो हमारे सैनिकों का और न ही नागरिकों का।
युद्ध तो कृष्ण भगवान ने भी लड़ा था महाभारत का लेकिन उससे पहले शांति के सभी विकल्प आजमा लिए थे।
हमें भी सबसे पहले अन्य विकल्पों पर विचार कर लेना चाहिये।
सर्वप्रथम जब हम इसकी जड़ों को खोजेंगे तो पाएंगे कि कमी हमारे भीतर है।
9/11 के हमले के बाद अमेरिका ने एक महीने के भीतर 10/7 (7 अक्तूबर) को न सिर्फ अन्तराष्ट्रीय नियमों की अनदेखी करते हुए अफगानिस्तान में स्थित तालीबान का सफाया किया बल्कि डेढ महीने के भीतर ही अमरीकी पेट्रियेट एक्ट बना , सुरक्षा बलों और एफ बी आई को ताकतवर बनाया जिसके परिणामस्वरूप 9/11 के बाद अमेरिका आतंकवादियों के निशाने पर रहने के बावजूद वे वहाँ कोई बड़ा हमला दोबारा करने में नाकाम रहे हैं। 

इसी संदर्भ में भारत को देखा जाए तो सख्त कानून तो हमारे देश में भी बने मसलन टाडा और पोटा लेकिन इनका लाभ से अधिक विरोध और राजनीति हुई जिसके फलस्वरूप इनका मकसद ही पूर्ण नहीं हो पाया। 
जब सुरक्षा बलों द्वारा जाँच की जाती है तो आत्मसम्मान और निजता के हनन जैसे विवादों को खड़ा कर दिया जाता है।
यहाँ कानूनों का पालन चेहरा देख कर होता है क्योंकि कुछ ख़ास वर्ग कानून से ऊपर होता है। और जब कभी कानून लागू करने का समय आता है तो कानून व्यवस्था के बीच में केंद्र और राज्य का मुद्दा आ जाता है।
यह एक कटु सत्य है कि हमारी ही कमियों एवं कमजोरियों का फायदा उठाकर हमें ही बार बार निशाना बनाया जाता है।

जिस प्रकार अमरीका ने न सिर्फ आतंकवाद से लड़ाई लड़ी बल्कि अपने कानून में सुधार एवं संशोधन करके उसका कड़ाई से पालन किया देश की सुरक्षा से किसी प्रकार का कोई समझौता नहीं किया उसी प्रकार हमें भी देश की सुरक्षा को सर्वोपरि रखना होगा 
समझौतों को ' ना ' कहना सीखना होगा
कानून का पालन कठोरता से करना होगा
और यह समझना होगा कि देश का गौरव व सम्मान पहले है न कि कुछ खास लोगों का 'आत्मसम्मान '
हमारी सीमाओं से बार बार घुसपैठ क्यों हो रही है कि बजाय कैसे हो रही है इसका उत्तर तलाशना होगा।
सामने वाला अगर हमारे घर में बार बार घुस कर हमें मार रहा है तो यह कमी हमारी है।
सबसे पहले तो हम यह सुनिश्चित करें कि वह हमारे घर में घुस ही न पाए।  व्यवहारिक रूप में यह सुनिश्चित करने में जो रुकावटें हैं सर्वप्रथम तो उन्हें दूर किया जाए और फिर भी यदि वो घुसपैठ करने में कामयाब हो रहे हैं तो उन्हें बख्शा नहीं जाए ।
कितने शर्म एवं दुख की बात है कि भारत में जिस वर्ग को कश्मीर में सेना के जवानों पर पत्थर बरसाने वाले लोगों पर पैलेट गन का उपयोग मानव  अधिकारों का हनन दिखाई देता था आज सेना के जवानों की शहादत पर मौन हैं  !

डॉ नीलम महेंद्र 

Saturday, 17 September 2016

भगवान तो छोड़िये क्या इंसान भी कहलाने लायक है यह !

भगवान तो छोड़िये क्या इंसान भी कहलाने लायक है यह !

एक अच्छा चिकित्सक बीमारी का इलाज करता है , एक महान चिकित्सक बीमार का --विलियम ओसलर ।
मध्यप्रदेश का एक शहर ग्वालियर , स्थान जे ए अस्पताल  , एक गर्भवती महिला ज्योति 90%  जली हुई हालत में रात 12 बजे अस्पताल में लाईं गईं  , उनके साथ उनकी माँ और भाई भी जली हुई हालत में थे ।ज्योति और उसकी माँ को बर्न यूनिट में भर्ती कर लिया गया लेकिन उसके भाई सुनील को लगभग दो घंटे तक बाहर ही बैठा कर रखा ।उसके बाद जब सुनील का इलाज शुरू किया गया  तब तक काफी देर हो चुकी थी और उन्होंने दम तोड़ दिया। जब घरवालों ने इस घटना के लिए समय पर इलाज न करने का आरोप डाक्टरों पर लगाया तो यह ' धरती के भगवान ' नाराज हो गए और 90% जली हुई गर्भवती ज्योति को बर्न यूनिट से बाहर निकाल दिया और वह इस स्थिति में करीब 5 घंटे खुले मैदान में पड़ रही। जब एक स्थानीय नेता बीच में आए तो इनका इलाज शुरू हुआ। इससे पहले डाक्टरों का कहना था  कि  ' तू ज्यादा जल गई है .....जिंदा नहीं बचेगी .....तेरा बच्चा भी पेट में मर गया है..... ' ( सौजन्य दैनिक भास्कर)

क्या यही वह सपनों का भारत है जिसके लिए भगत सिंह राजगुरु और सुखदेव हँसते हुए फाँसी पर झूल गए थे  ? क्या इसी प्रकार के भारत का स्वप्न राष्ट्र पिता महात्मा गाँधी ने देखा था  ? क्या यह भारत विश्व गुरु बन पायेगा  ? 
जिस डाँक्टर को हम ईश्वर का दर्जा देते हैं  , जो डाँक्टर अपनी डिग्री लेने से पूर्व मानवता की सेवा करने की शपथ लेते हैं  , जिनके पास न सिर्फ मरीज अपितु उनके परिजन भी एक विश्वास एक आस लेकर आते हैं उनका इस प्रकार का अमानवीय व्यवहार किस श्रेणी में आता है  ? क्यों आज चिकित्सा क्षेत्र सेवा न होकर व्यवसाय बन गया है  ?
आबादी के हिसाब से दुनिया के दूसरे  बड़े देश भारत में न सिर्फ स्वास्थ्य सेवाएं दयनीय स्थिति में हैं बल्कि जिन हाथों में देश के बीमार आम आदमी का स्वास्थ्य है उनकी स्थिति उससे भी अधिक चिंताजनक है  । यह बात सही है कि कुछ डाँक्टरों के शर्मनाक व्यवहार के कारण सम्पूर्ण डाँक्टरी पेशे को कटघड़े में खड़ा नहीं किया जाना चाहिए किन्तु यह भी सत्य है कि मुट्ठीभर समर्पित डाँक्टरों के पीछे इन अनैतिक आचरण करने वाले डाँक्टरों को छिपाया भी नहीं जा सकता। 

बात अनैतिक एवं अमानवीय आचरण तक सीमित नहीं है । बात यह है कि आज मानवीय संवेदनाओं का किस हद तक ह्रास हो चुका है ! जिस डाँक्टर को मरीज की आखिरी सांस तक उसकी जीवन की जंग जीतने में मरीज का साथ देना चाहिए वही उसे मरने के लिए छोड़ देता है ! उसकी अन्तरात्मा उसे धिक्कारती नहीं है  , किसी कार्यवाही का उसे डर नहीं है  । एक इंसान की जान की कोई कीमत नहीं है ? क्यों आज़ादी के 70 वर्षों बाद भी आज भारत में स्वास्थ्य सेवाओं का एक मजबूत ढांचा तैयार नहीं हो पाया  ? क्यों आज तक हम एक विकासशील देश हैं  ? क्यों हमारे देश का आम आदमी आज तक मलेरिया और चिकनगुनिया जैसे रोगों से मर रहा है और वो भी देश की राजधानी में  ! जब श्रीलंका और मालदीव जैसे देशों ने इन पर विजय प्राप्त कर ली है तो भारत क्यों आज तक एक मच्छर के आगे घुटने टेकने पर विवश है  ? 
अगर प्रति हजार लोगों पर अस्पतालों में बेड की उपलब्धता की बात करें तो ब्राजील जैसे विकासशील देश में यह आंकड़ा 2.3 है  , श्रीलंका में 3.6 है  ,चीन में 3.8 है जबकि भारत में यह 0.7 है।सबसे अधिक त्रासदी यह है कि ग्रामीण आबादी को बुनियादी चिकित्सा सुविधाओं के लिए न्यूनतम 8 कि . मी . की यात्रा करनी पड़ती है।
भारत सकल राष्ट्रीय आय की दृष्टि से विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश है लेकिन जब बात स्वास्थ्य सेवाओं की आती है इसका बुनियादी ढांचा कई विकासशील देशों से भी पीछे है।अमेरिका जहाँ अपने सकल घरेलू उत्पाद (जी डी पी ) का 17% स्वास्थ्य पर खर्च करता है वहीं भारत में यह आंकड़ा महज 1% है  ।अगर अन्य विकासशील देशों से तुलना की जाये तो बांग्लादेश  1.6% श्रीलंका  1.8% और नेपाल 1.5% खर्च करता है तो हम स्वयं अपनी चिकित्सा सेवा की गुणवत्ता का अंदाजा लगा सकते हैं। भारत एक ऐसा देश है जिसने अपने सार्वजनिक स्वास्थ्य का तेजी से निजिकरण किया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार प्रति 1000 आबादी पर एक डाक्टर होना चाहिए लेकिन  भारत  इस अनुपात को हासिल करने की दिशा में भी बहुत पीछे है।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की ताजा रिपोर्ट के अनुसार सर्जरी  , स्त्री रोग  , और शिशु रोग जैसे चिकित्सा के बुनियादी क्षेत्रों में 50% डाक्टरों की कमी है। शायद इसीलिए केंद्र सरकार ने अगस्त 2015 में यह फैसला लिया था कि वह विदेशों में पढ़ाई करने वाले डाक्टरों को  ' नो ओब्लिगेशन टू रिटर्न टू इंडिया ' अर्थात् एनओआरआई सर्टिफ़िकेट जारी नहीं करेगी जिससे वे हमेशा विदेशों में रह सकते थे।

चिकित्सा और शिक्षा किसी भी देश की बुनियादी जरूरतें हैं और वह हमारे देश में सरकारी अस्पतालों एवं स्कूलों में मुफ्त भी हैं लेकिन दोनों की ही स्थिति दयनीय है। सरकारी अस्पतालों में डाक्टर मिलते नहीं हैं और मिल जांए तो भी ठीक से देखते नहीं हैं अगर आपको स्वयं को ठीक से दिखवाना है तो या तो किसी बड़े आदमी से पहचान निकलवाइए या फिर पैसा खर्च करके प्राइवेट में दिखवाइए । आज आए दिन अस्पतालों में कभी किडनी रैकेट तो कभी खून बेचने का रैकेट या फिर बच्चे चोरी करने का रैकेट अथवा भ्रूण लिंग परीक्षण और फिर कन्या भ्रूण हत्या इस प्रकार के कार्य किए जाते हैं। ऐसा नहीं है कि सरकार ने कानून नहीं बनाए फिर ऐसी क्या बात है कि न तो उनका पालन होता है और न ही कोई डर है। क्यों सरकारी अस्पतालों की हालत आज ऐसी है कि बीमारी की स्थिति में एक मध्यम वर्गीय परिवार सरकारी अस्पताल में इलाज कराने के बजाय प्राइवेट अस्पताल का महंगा इलाज कराने के लिए मजबूर है । एक आम भारतीय की कमाई का एक मोटा हिस्सा स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च होता है। आजादी के इतने सालों बाद भी हमारी सरकार अपने देश के हर नागरिक के स्वास्थ्य के प्रति असंवेदनशील है। जिस आम आदमी की आधी से भी अधिक कमाई और उसकी पूरी जिंदगी अपनी बुनियादी आवश्यकताओं के लिए संघर्ष करते निकल जाती हो उससे आप क्या अपेक्षा कर सकते हैं। जिन सुविधाओं और सुरक्षा के नाम पर उससे टैक्स वसूला जाता है उसका उपयोग न तो उसके जीवन स्तर को सुधारने के लिए हो रहा हो और न ही देश की उन्नति में , जिस  आम आदमी की इस देश से बुनियादी  अपेक्षाएँ  पूरी न हो रही हों वह आम आदमी इस देश की अपेक्षाएँ कैसे पूरी कर पाएगा?
अगर इस देश और इसके आम आदमी की दशा को सुधारना है तो राष्ट्रीय इन्श्योरेन्स मिशन को लागू करने की दिशा में कड़े और ठोस कदम उठाने होंगे।
डाँ नीलम महेंद्र