Sunday, 23 October 2016

समाजवादी पार्टी की कलह पारिवारिक या राजनैतिक

समाजवादी पार्टी की कलह पारिवारिक या राजनैतिक


उप्र की राजनीति इन दिनों पूरे देश में चर्चा का विषय बनी हुई है  । सत्ता की कुर्सी पर अखिलेश हैं लेकिन चाबी मुलायम सिंह के पास है। यह  सत्ता की लड़ाई तो   है ही पर  विचारों की लड़ाई भी है 
जहाँ एक तरफ अखिलेश को अपने काम और विकास पर पूरा भरोसा है उप्र की जनता  का सामना वे इसी आधार पर करना चाह रहे हैं वहीं दूसरी तरफ मुलायम सिंह अपने चुनावी अंकगणित एवं बाहुबल पर यकीन रखते हैं। वे जानते हैं इस देश में चुनाव कैसे जीते जाते हैं  केवल काम और विकास के आधार पर चुनाव जीतना तो उनके परिकल्पना से परे है। 
अखिलेश के काम से ज्यादा भरोसा उन्हें शिवपाल के जातीय गणित और मुखतार अंसारी के बाहुबल पर है।

जबकि अखिलेश  अपने द्वारा चार साल तक प्रदेश में किए गए कार्यों को जनता के सामने रखकर वोटों की अपेक्षा कर  रहे हैं ।  वे कह भी चुके हैं कि इम्तिहान मेरा है टिकट बाँटने का अधिकार मुझे ही मिलना चाहिए जो कि काफी हद तक सही भी है। लेकिन नेताजी का कहना कि काम करने के लिए सत्ता में होना आवश्यक होता है लेकिन सत्ता में रहने के लिए काम करना आवश्यक नहीं होता उसके लिए तो बिसात बिछानी पड़ती है   शह और मात की। 
लेकिन एक पढ़ लिखा उदारवादी सोच का नौजवान जो उप्र के लोगों को पढ़ा लिखा रहा है उन्हें लैपटॉप दे रहा है एक्सप्रेस हाईवे बना रहा है सड़कें सुधार रहा है अस्पताल और कालेज खुलवा रहा है कानून व्यवस्था से लेकर प्रदेश के मूलभूत ढाँचे को सुधारने में चार साल से लगा है युद्ध स्तर पर काम करके मेट्रो बनवा रहा है उसे  बाहुबल का गणित कैसे समझ आ सकता है।
दूसरी तरफ जिसने अपने जीवन का हर चुनाव  केवल जाती अल्पसंख्यक एवं दलितों के वोटों के प्रतिशत के आधार पर जीते हों उनसे इस सोच से इससे ऊपर उठने की अपेक्षा भी नहीं की जा सकती।
दरअसल इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इन चार सालों में अखिलेश ने उप्र में काम किया है। वहाँ का युवा वर्ग एवं मध्यम वर्ग अखिलेश के साथ है और हाल के घटनाक्रमों से प्रदेश के लोगों के मन में अखिलेश के लिए सहानुभूति भी है। वहाँ की जनता जानती है मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे तो अखिलेश हैं लेकिन फैसले नेताजी से बिना पूछे नहीं ले सकते। वहाँ के ब्यूरोक्रेट्स अखिलेश से ज्यादा मुलायम और शिवपाल की सुनते हैं। इन मुश्किल परिस्थितियों में भी अखिलेश सरकार ने इन चार सालों में जो काम किया है वो वाकई काबिले तारीफ है।
दूसरी तरफ इतने समय में अखिलेश भी काफी कुछ सीख व समझ चुके हैं और  शायद इसीलिए अब वे अपनी छवि से किसी प्रकार का समझौता करने के मूड में नहीं हैं।
जैसा कि होता है ,दोनों की इस अलग अलग सोच का फायदा  कुछ  लोगों द्वारा उठाया जा रहा है और अखिलेश विरोधी गुट सक्रिय हो गया। जिस प्रकार के फैसले आज पार्टी में लिए जा रहे हैं निश्चित ही वे आत्मघाती सिद्ध होंगे।
समाजवादी पार्टी में कौमी एकता दल का विलय  अमर सिंह का प्रवेश और उनके युवा समर्थकों का पार्टी से निषकासन अपने आप में बहुत कुछ कहता है  । अभी ताजा घटनाक्रम में उनके स्कूल के मित्र एवं समाजवादी पार्टी के सदस्य उदयवीर का पार्टी से निष्कासन , शायद उनके सब्र की परीक्षा ली जा रही है या फिर पार्टी में उनके स्थान का उन्हें एहसास कराया जा रहा है। 
दरअसल अभी तक अखिलेश का पलड़ा भारी था  यह बात सही है कि हाल के लोकसभा चुनावों में उप्र में भाजपा ने 80 में से 71  सीटें हासिल करी थीं लेकिन वहाँ का जनमानस इस बात में बिल्कुल भी दुविधा में नहीं था ।भारत का वोटर शुरू से ही समझदार रहा है और वह अपनी व देश की भलाई बहुत ही बेहतर समझता है  । वह इस विषय में स्पष्ट था कि केंद्र में मोदी और प्रदेश में अखिलेश  लेकिन भारत सरकार द्वारा हाल में की गई सर्जिकल स्ट्राइक ने चुनावी सीन और राजनैतिक समीकरण सब कुछ बदल दिया है। यही वजह है कि मुलायम  किसी भी प्रकार की चूक करना नहीं चाह रहे लेकिन अपनी पुरानी सोच को समय के साथ बदल भी नहीं पा रहे। अतिमहत्वकाँक्षा के रथ पर सवार अपने ही बेटे के खिलाफ सत्ता की लालसा में पार्टी और सत्ता बचाना चाह रहे हैं परिवार भले ही टूट जाए ।
दरअसल राजनीति होती ही ऐसी है।अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाकर स्वयं मुलायम सिंह ने एक तरह से अपने परिवार की राजनैतिक विरासत तय कर दी थी लेकिन समय के साथ वे अपने इस फैसले पर शायद पुनः सोचना चाहते हैं यह अलग विषय है कि कारण पारिवारिक हैं या राजनैतिक।
कुल मिलाकर अखिलेश के लिए यह वाकई परीक्षा की घड़ी है जिसमें उप्र का युवा एवं मध्यम वर्ग तो उनके साथ है लेकिन उनका परिवार नहीं। शायद वे  पढ़ लिख कर  राजनीति में आने और अपने संस्कारों की कीमत चुका रहे हैं।
डाँ नीलम महेंद्र 



Wednesday, 19 October 2016

व्यापार के सहारे आर्थिक शक्ति बनता चीन

व्यापार के सहारे आर्थिक शक्ति बनता चीन

आज पूरे देश में चीनी माल को प्रतिबंधित करने की मांग जोर शोर से उठ रही है। भारतीय जनमानस का एक वर्ग चीनी माल न खरीदने को लेकर समाज में जागरूकता फैलाने में लगा है वहीं दूसरी ओर समाज के दूसरे वर्ग का कहना है कि यह कार्य भारत सरकार का है । जब सरकार चीन से नए अर्थिक और व्यापारिक अनुबंध कर रही है    और स्वयं चीनी माल का आयात कर रही है तो भारत की जनता से यह अपेक्षा करना कि वह उस सस्ती विदेशी वस्तु को खरीदने के मोह को त्याग दे जिस पर 'इम्पोर्टिट ' का लेबल लगा हो व्यर्थ है।आखिर बाज़ार अर्थव्यवस्था पर चलता है भावनाओं पर नहीं 

उनके द्वारा दिए जा रहे तर्कों में कहा जा रहा है कि सरदार पटेल की मूर्ति ही चाइना में बन रही है अधिकतर इलेक्ट्रोनिक आइटम चाइनीस हैं और तो और जो मोबाइल इंइियन कम्पनियों द्वारा निर्मित हैं उनके पार्ट्स तो चाइनीस ही हैं 
सरदार पटेल की मूर्ति की सच्चाई यह है कि उसका निर्माण भारत में  ही हो रहा है जिसका ठेका एक भारतीय कम्पनी 'एल एंड टी ' को दिया गया है और केवल उसमें लगने वाली पीतल की प्लेटों को ही चीन से आयात किया जा रहा है जिसकी कीमत मूर्ति की सम्पूर्ण लागत का कुल 9% है। चूँकि इस काम को सरकार ने एक प्राइवेट कंपनी को ठेके पर दिया गया है तो यह उस कंपनी पर निर्भर करता है कि वह कच्चा माल कहाँ से ले ।
अब बात करते हैं भारतीय बाजार में सस्ते चीनी माल की  , तो यह एक बहुत ही उलझा हुआ मुद्दा है जिसे समझने के लिए हमें कुछ और बातों को समझना होगा।
सर्वप्रथम तो हमें यह समझना होगा कि ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में चीनी माल से भारतीय बाजार ही नहीं विश्व के हर देश के बाजार भरे हैं चाहे वो अमेरिका अफ्रीका या फिर रूस ही क्यों नहीं हो । विश्व के हर देश के बाज़ारों में सस्ते चीनी माल ने न सिर्फ उस देश की अर्थव्यवस्था को हिला दिया है बल्कि वहाँ के स्थानीय उद्योगों को भी क्षति पहुंचाई है। वह दूसरे देशों से कच्चे माल का आयात करता है और अपने सस्ते इलेक्ट्रोनिक उपकरण  , खिलौनों और कपड़ों का निर्यात करता है  । इस प्रकार चीन तेजी से एक आर्थिक शक्ति बनकर उभर रहा है और अमेरिका को आज अगर कोई देश चुनौती दे सकता है तो वह चीन है।
चाइना वह देश है जो अपने भविष्य के लक्ष्य को सामने रखकर आज अपनी चालें चलता है , जो न सिर्फ अपने लक्ष्य निर्धारित करता है बल्कि उनको हासिल करने की दिशा में कदम भी उठाता है    उसके लक्षय की राह में भारत एवं पाकिस्तान एक साधन भर हैं।
पाकिस्तान का उपयोग  चीन द्वारा वहाँ  इकोनोमिक कोरिडोर (सीपीईसी )बनाकर किया जा रहा है । उस पर वह बेवजह 46 बिलियन डॉलर खर्च नहीं कर रहा। वह इसके प्रयोग से न सिर्फ यूरोप और मध्य एशिया में अपनी ठोस आमद दर्ज कराएगा बल्कि भारत से युद्ध की स्थिति में सैन्य सामग्री और आयुध भी बहुत ही आसानी के साथ कम समय में अपने सैनिकों तक पहुंचाने में कामयाब होगा जबकि भारत के लिए ऐसी ही परिस्थिति में यह प्राकृतिक एवं सामरिक कारणों से मुश्किल होगा । इसी कोरिडोर के निर्माण  के कारण चीन हर मुद्दे पर पाकिस्तान का साथ देता है फिर वह चाहे आतंकवाद या फिर आतंकी अजहर मसूद ही क्यों न हो।
दूसरी ओर भारत की सरकार अपने लक्ष्य पाँच साल से आगे देख नहीं पाती क्योंकि जो पार्टी सत्ता में होती है वह देश के भविष्य से अधिक अपनी पार्टी के भविष्य को ध्यान में रखकर फैसले लेती है। और भारत की जनता की पसंद भी हर पांच साल में बदल जाती है। यह भी भारत का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि भारत का आम आदमी , पार्टी या प्रत्याशी का चुनाव देश हित को ध्यान में रखकर करने के बजाय अपने छोटे छोटे स्वार्थों या फिर अपनी जाति अथवा सम्प्रदाय को ध्यान में रखकर चुनता है।यह एक अलग विषय है कि हम लोगों के कोई वैश्विक लक्ष्य कभी नहीं रहे आजादी के 70 सालों बाद आज भी हमारे यहाँ  बिजली  , पीने का पानी  , कुपोषण और रोजगार  ही चुनावी मुद्दे होते हैं।
खैर हम बात कर रहे थे चीनी माल की  तो 
यह आश्चर्यजनक है कि विदेशी बाजारों में जो चीनी माल बेहद सस्ता मिलता है वह स्वयं चीन में महंगा है। यह आम लोगों के समझने का विषय है कि भारतीय बाजार में उपलब्ध चीनी माल सस्ता तो है लेकिन साथ ही घटिया भी है।बिना गैरन्टी का यह सामान न सिर्फ हमारे स्वास्थ्य को बल्कि हमारे उद्योगों को भी हानि पहुँचा रहा है।
हम भारतीय इस बात को नहीं देख पा रहे कि 1962 में चीन ने भारतीय सीमा में अपनी सेनाओं के सहारे घुसपैठ की थी । वही घुसपैठ वह आज भी कर रहा है बस उसके सैनिक और उनके हथियार बदल गए हैं  ।आज उसके व्यापारियों ने सैनिकों की जगह ले ली है और चीनी माल हथियार बनकर हमारी अर्थव्यवस्था हमारे मजदूर हमारे उद्योग हमारा स्वास्थ्य सभी पर धीरे धीरे आक्रमण कर रहा है।

टाँय एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष श्री राजकुमार के अनुसार  "यह भारतीय उद्योगों को बर्बाद करने का चीन का बहुत बड़ा षड्यंत्र है। जान-बूझकर वह सस्ता माल भारतीय बाजार में उतार रहा है और हमारा उपभोक्ता इस चाल को समझ तभी पाता है जब वह इसका प्रयोग कर लेता है। इस घटिया माल को न बदला जा सकता है और न ही वापस किया जा सकता है।" 
भारत सरकार चीन के साथ जो व्यापारिक  समझौते कर रही है वह आज के इस ग्लोबलाइजेशन के दौर में उसकी राजनैतिक एवं कूटनीतिक विवशता हो सकती है लेकिन वह इतना तो सुनिश्चित कर ही सकती है कि चीन से आने वाले माल पर क्वालिटि कंट्रोल हो  । भारत सरकार इस प्रकार की नीति बनाए  कि भारतीय बाजार में चीन के बिना गारन्टी वाले घटिया माल को प्रवेश न मिले। क्योंकि चीन भी घटिया माल बिना गारन्टी के सस्ता बेच रहा है लेकिन जब उसी माल पर उसे गारन्टी देनी पड़ेगी तो क्वालिटी बनानी पड़ेगी और जब क्वालिटी बनाएगा तो लागत निश्चित ही बढ़ेगी और वह उस माल को सस्ता नहीं बेच पाएगा।
इसके साथ साथ सरकार को भारतीय उद्योगों के पुनरुत्थान के प्रयास करना चाहिये  'मेक इन इंडिया ' को सही मायने में चरितार्थ करने के उपाय खोज कर इस प्रकार के भारतीय उद्योग खड़े किए जाएं जो चीन और चीनी माल दोनों को चुनौती देने में सक्षम हों ।
अन्त में भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में जहां जनता ही राजा होती है वहाँ की जनशक्ति अपने एवं देश के हितों को ध्यान में रखते हुए कोई भी कदम उठाने को स्वतंत्रत है ही 

डाँ नीलम महेंद्र 

Wednesday, 5 October 2016

एक पाती आदरणीय रविश जी के नाम डॉ नीलम महेंद्र की कलम से

                            एक पाती आदरणीय रविश जी के  नाम डॉ नीलम महेंद्र की कलम से
प्रिय रवीश जी ,
आपका चीनी माल खरीदने का आग्रह करता आलेख पढ़ा तो कुछ विचार मेरे मन में भी उत्पन्न हुए सोचा पूछ लूँ ।
जिन लोगों को आप सम्बोधित कर रहे हैं उनके पास तो स्वयं आप ही के शब्दों में  "खबरों का कूड़ेदान " यानी अखबार और चैनल देखने का वक्त ही नहीं होता और न ही फेसबुक और ट्विटर पर उल्टियाँ करने का तो आप की बात उन तक इस माघ्यम से तो पहुँच नहीं पायेगी हाँ उन तक जरूर पहुँच गई जिनका आप उल्लेख कर रहे थे  "फर्जी राष्ट्रवादी " के तौर पर और जहाँ तक आप जैसी शख्सियत का सवाल है आप ऐसी गलती तो कर नहीं सकते कि सुनाना किसी को हो और सुन कोई और ले ।

खैर जान कर खुशी हुई कि आपको इस देश के उस गरीबी नागरिक की चिंता है जो साल भर कुछ खाने या पहनने के लिए दिवाली का ही इंतजार करते हैं। यह तो अच्छी बात लेकिन काश कि आप कुछ चिंता अपने देश की भी करते और कुछ ऐसा हल देते जिससे इन लोगों को साल भर काम मिलता और उन्हें खाने और ओढ़ने के लिए साल भर दिवाली का इंतजार नहीं करना पड़ता  ,जैसे कि आप उनके लिए कोई एन जी ओ खोल लेते या फिर किसी भी प्रकार की स्वरोजगार की ट्रेनिंग दे देते और एनडीटीवी के अपने साथियों को भी उनके इस कष्ट से अवगत करा कर उनकी मदद करने के  लिए प्रेरित करते जिन पर शायद आपकी बात का कोई असर भी होता लेकिन  दिन भर फेसबुक और ट्विटर पर उल्टियाँ करने वालों पर आपकी बात शायद असर कम ही डाले क्योंकि ये बेचारे तो" फर्जी" ही  सही लेकिन राष्ट्रवाद से घिरे तो हैं।

आप कह रहे हैं कि चीन का माल नहीं खरीदना है तो भारत सरकार पर दबाव डालना चाहिए कि वो चीन से आयात पर प्रतिबंध लगा दे । रवीश जी आप जैसे अनुभवी शख्सियत से इस नादानी की अपेक्षा न थी क्योंकि आपका कसबा जो तबक़ा पढ़ता है वो दिन भर फेसबुक और ट्विटर पर उल्टियाँ ही करता है और ऐसी एक उल्टी से यह बात सबको पता है कि चूँकि पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंहा राव जी के शासन काल में या फिर कहें कि काँग्रेस के शासन काल में 1995 में भारत वर्ल्ड ट्रेड औरगनाइजेशन का सदस्य बन चुका है जिस कारण भारत सरकार चीन पर व्यापारिक प्रतिबंध नहीं लगा सकती लेकिन भारत की जनता तो लगा सकती है  !
आपने जो जापान का उदाहरण प्रस्तुत किया है तो जापान वहाँ अपनी ट्योटा कार बेचकर अमेरिका से पैसा कमा रहा है और अपनी अर्थव्यवस्था मजबूत करने के साथ साथ अपने नागरिकों को रोज़गार भी दे रहा है वो अमेरिकी माल खरीद कर अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान नहीं कर रहा।
भारत सरकार के हाथ बंधे हैं पर भारत वासियों के तो नहीं  ! अगर भारत के आम आदमी की मेहनत की कमाई चीनी अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के काम आए तो इससे तो अच्छा है कि भारत अपने शहीदों के सम्मान में दीवाली ही न मनाए ।
यह समझना मुश्किल है कि चीन के माल के नाम पर आपको गरीब का जलता घर दिख रहा है उनके रोते बच्चे दिख रहे हैं लेकिन हमारे शहीदों की जलती चिताएँ , उनकी पत्नियों की उजड़ी मांग उनके रोते बच्चे उनके बूढ़े माँ बाप की अपने बेटे के इंतजार में पथरा गई आँखें कुछ भी दिखाई नहीं देता  ? 
ऐसा ही हर बार क्यों होता है कि जब हमारे जवान शहीद होते हैं या फिर वे किसी के हाथों फेंके पत्थर से घायल होकर भी सहनशीलता का परिचय देते हुए कोई कार्यवाही करते हैं तो कुछ ख़ास वर्ग को हमारे सैनिकों के घावों से ज्यादा चिंता पैलेट गन से घायल होने वालों के घावों की होती है और मानव अधिकार याद आ जाते हैं  ? क्या हमारे सैनिक मानव नहीं हैं ? 
ख़ैर हम बात कर रहे थे चीनी माल की और उसे बेच कर दो पैसा कमाने वाले गरीब की  , तो रवीश जी मुझे इस बात का अफसोस है कि आप इस देश की मिट्टी से पैदा होने वाले आम आदमी को पहचान नहीं पाए  । यह आदमी न तो अमीर होता है न गरीब होता है जब अपनी पर आ जाए तो केवल भारतीय होता है  । इनका डीएनए गुरु गोविंद सिंह जी  जैसे वीरों का डीएनए है जो इस देश पर एक नहीं अपने चारों पुत्र हंसते हंसते कुर्बान कर देते हैं।इस देश की महिलाओं के डीएनए में रानी लक्ष्मी बाई रानी पद्मिनी का डिएनए है कि देश के लिए स्वयं अपनी जान न्यौछावर कर देती हैं  । इतिहास गवाह है जब जब भारत का डिएनए जागा है तो बाकी सबको सोना ही पढ़ा है चाहे वो मौत की नींद ही क्यों न हो।मुझे विश्वास है कि देश हित में इतनी कुर्बानी तो देश का हर नागरिक दे ही सकता है चाहे अमीर या गरीब 
आपने 
गोपालप्रसाद व्यास जी की कविता की वो मशहूर पंक्तियां तो सुनी ही होंगी,
"    वह ख़ून  कहो किस मतलब का जिसमें उबाल का नाम नहीं,
     वह ख़ून कहो किस मतलब का आ सके जो देश के काम नहीं ।"

फिर भी रवीश जी आपकी चिंता काबिले तारीफ है तो क्यों न आप केवल लिखने या बोलने के बजाय एक जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करें और पूरे देश के न सही केवल दिल्ली के और नहीं तो केवल अपने घर और आफिस के आस पास के ऐसे गरीबों से उनके चीनी माल को स्वयं भी खरीदें और एनडीटीवी के ग्रुप के अपने कुलीग्स से खरिदवाएँ ताकि उनका भी कुछ भला हो जाए ।
आखिर आपको उनकी चिन्ता है आप उनका भला कीजिए हमें देश की परवाह है हम उसके लिए कदम उठाएंगे।
डाँ नीलम महेंद्र


आपनी असफलता सवालों से छुपाते हमारे नेता

आपनी असफलता सवालों से छुपाते हमारे नेता 
हमें तो अपनों ने लूटा, गैरों में कहाँ दम था.. हमारी कश्ती तो वहाँ डूबी, जहाँ पानी कम था.”
भारत का एक गौरवशाली इतिहास रहा है जहाँ हम अपने देश को माँ का दर्जा देते हैं। इस देश की मिट्टी को माथे पर लगाते हैं ।
एक ऐसा देश जो ज्ञान की खान है और जिसमें बड़ी से बड़ी बात छोटी छोटी कहानियों के माध्यम से ऐसे समझा दी जाती हैं कि एक बच्चा भी समझ जाए। इसी बात पर महाभारत का एक प्रसंग याद आ रहा है जब एक बार दुर्योधन को कुछ आदिवासी बंधी बना लेते हैं तो उस समय उसी वन में पाण्डव बनवास काट रहे थे। पाण्डवों को जब  इस बात का पता चलता है तो युद्धिष्ठिर अपने भाइयों के साथ जाकर दुर्योधन को छुड़ा लाते हैं।भीम द्वारा विरोध करने पर वह कहते हैं कि भले ही वे सौ और हम पाँच हैं लेकिन दुनिया के सामने  हमें एक सौ पाँच ही  हैं।
वर्षों पुरानी यह कहानी आज  हमारे देश के नेताओं को याद दिलानी आवश्यक हो गई है। उन्हें यह याद दिलाना आवश्यक है कि देश पहले आता है स्वार्थ बा में , राष्ट्रहित पहले आता है निज हित बाद में , राष्ट्र के प्रति निष्ठा पहले होती है पार्टी के प्रति निष्ठा बाद में 

क्यों आज हमारे देश में राजनीति और राजनेता दोनों का ही स्तर इस  हद तक गिर चुका है कि कर्तव्यों के ऊपर अधिकार और फर्ज के ऊपर स्वार्थ हावी है  ? कर्म करें न करें श्रेय लेने की होड़ लगी हुई है। हर बात का राजनीतिकरण हो जाता है फिर चाहे वह देश की सुरक्षा से जुड़ी हुई ही क्यों न हो और अपने राजनैतिक फायदे के लिए सेना के मनोबल को गिराने से भी नहीं चूकते।
क्या वे भारत की जनता को इतना मूर्ख समझते हैं कि वह उनके द्वारा कही गई किसी भी बात में राजनैतिक कुटिलता को देख नहीं पाएंगे , उसमें से उठने वाली साजिश की गंध को सूंघ नहीं पाएंगे और  चुनावी अंकगणित के बदलते समीकरणों के साथ ही बदलते उनके बयानों के निहितार्थों को पहचान नहीं पाएंगे  ?
हमारे लोकप्रिय पूर्व प्रधानमंत्री स्व लाल बहादुर शास्त्री जी ने नारा दिया था  "जय जवान जय किसान  " , कितने शर्म की बात है कि आज उसी जवान की शहादत पर प्रश्न चिह्न लगाया जा रहा है ! जिस जवान के रात भर जाग कर हमारी सीमाओं की निगरानी करने के कारण आप चैन की नींद सो रहे हैं उसी को कटघरे में खड़ा कर रहे  हैं  ?
सर्जिकल स्ट्राइक का अधिकारिक बयान डीजीएमओ की ओर से आया था सरकार की ओर से नहीं और इस बयान में उन्होंने यह भी कहा था कि उन्होंने पाक डिजिएमओ को भी इस स्ट्राइक की सूचना दे दी है। तो हमारी सेना के सम्पूर्ण विश्व के सामने दिए गए इस बयान पर हमारे ही नेताओं द्वारा प्रश्नचिन्श्र लगाने का मतलब ?
विडम्बना तो देखिए,

हमारी सेना की कार्यवाही के बाद पाकिस्तान की स्थिति उसके  नेताओं के बयान बयाँ कर रहे हैं।
नवाज शरीफ , "हम भी कर सकते हैं सर्जिकल  स्ट्राइक।"
बौखलाया हाफिज सैइद   ," सर्जिकल स्ट्राइक क्या होती है यह भारत को हम बताएंगे  "
घबराए राहेल शरीफ   " पाक के सामने भारत के साथ युद्ध की चुनौती है और हमने परमाणु हथियार केवल दिखाने के लिए नहीं बनाए हैं।"
मुशरफ   ,"पाक अन्तराष्ट्रीय स्तर पर अलग थलग पड़ रहा है "। 
अब जरा भारत के नेताओं को देखें।
अरविंद केजरीवाल ने बहुत ही नफ़ासत के साथ अपने खूंखार पंजे को मखमल की चादर में लपेटते हुए पाकिस्तान और अन्तराष्ट्रीय मीडिया की आड़ में भारत सरकार से सर्जिकल स्ट्राइक के सुबूत मांगें हैं।
कांग्रेस नेता संजय निरुपम ,"सरकार जिन सर्जिकल स्ट्राइक्स का दावा कर रही है वह तब तक सवालों में घिरी  रहेगी जब तक कि सरकार सुबूत नहीं पेश कर देती।"
अब जरा इतिहास में झांक कर देखें  ,अक्तूबर 2001 में कश्मीर विधानसभा पर आतंकवादी हमला हुआ था जिसमें 35 से अधिक जानें गईं थीं लेकिन हम चुप थे।फिर दिसम्बर 2001 में हमारे लोकतंत्र के मन्दिर, हमारी संसद पर हमला हुआ 6 जवान शहीद हुए  , हम चुप रहे।   26/11 को हम भूले नहीं हैं , हम तब भी चुप थे। शायद हमारे इन नेताओं को इस खामोशी की इतनी आदत हो गई है कि न तो उनको पाकिस्तान की ओर से आने वाले शोर में छिपी उनकी टीस बर्दाश्त हो रही है और न ही भारत की जनता की खुशी के शोर के पीछे छिपे गर्व का एहसास ।  इस खामोशी के टूटते ही उन्हें अपने सपने टूटते हुए जरूर दिख रहे होंगे और उनके द्वारा मचाया जाने वाला शोर शायद उसी से उपजे दर्द का नतीजा हो।
क्या इस देश की जनता नहीं देख पा रही कि मोदी के इस कदम ने राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो उनका कद बढ़ा दिया है वह विपक्ष को बेचैन कर रहा है  ? काँग्रेस और आप दोनों को  सम्पूर्ण विश्व में जो आज भारत का मान बढ़ा है ,उससे देश में अपना  घटता हुआ कद दिखने लगा है।  आने वाले विधानसभा चुनाव परिणाम पर भारत सरकार के इस ठोस कदम का असर और उनकी राजनैतिक महत्वाकांक्षाएं उनकी राष्ट्र भक्ति पर हावी हो रही  हैं। 
अति दूरदर्शिता का परिचय देते हुए इस बात को स्वीकार कर रहे हैं कि विधानसभा चुनाव तो ठीक हैं लेकिन 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले ही सर्जिकल स्ट्राइक का विडियो इस प्रकार के दबाव बनाकर निकलवा लिए जाएं जिससे , इसकी राजनैतिक हानि  उठानी ही है तो आज ही पूरी उठा लें ताकि  आने वाले लोकसभा चुनावों में बीजेपी इसका फायदा न उठाने पाए । फिर कौन जाने कि विडियो रिकॉर्डिंग को डाक्टरट कहा जाए और एक नया मुद्दा बनाया जाए।
यह इस धरती का दुर्भाग्य है कि जैसे सालों पहले ब्रिटिश और मुग़लों को भारत में सोने की चिड़िया दिखाई देती थी और उसे लूटने आते थे वैसे ही आज हमारे कुछ नेताओं को भारत केवल भूमि का एक टुकड़ा दिखाई देता है जिसका दोहन वे अपने स्वार्थ के लिए कर रहे हैं 
काश कि उन्हें धरती के इस टुकड़े में , इसकी लहलहाते खेतों में  ,इसकी नदियों और पहाड़ों में  , इसकी बरसातों और बहारों में  , सम्पूर्ण प्रकृति में दोनों हाथों से अपने बच्चों पर प्यार लुटाने वाली माँ नज़र आती , हमारी सीमाओं पर आठों पहर निगरानी करने वाले सैनिकों में अपने भाई नज़र आते । एक सैनिक का लहू भी हमारे नेताओं के लहू में उबाल लेकर आता। लेकिन एसी आफिस और एसी कारों के काफिले में घूमने वाले इन नेताओं को न तो 50 डिग्री  और न ही -50डिग्री के तापमान में एक मिनट भी खड़े होने का अनुभव है, वे क्या जानें इन मुश्किल हालातों में अपने परिवार से दूर दिन रात का फर्क करे बिना अपना पूरा जीवन राष्ट्र के नाम कर देने का क्या मतलब होता है 
चूँकि इन्हें न तो अपने देश की जनता द्वारा चुनी हुई सरकार पर भरोसा  है ,ना  प्रधानमंत्री पर भरोसा है और न ही सेना पर तो बेहतर यही होगा कि अगली बार जब इस प्रकार की कार्यवाही की जाए तो पहली गोली इन्हीं के हाथों से चलवायी जाए।


डॉ नीलम महेंद्र