Sunday, 27 November 2016

अगर बदलाव लाना है तो कानून नहीं सोच बदलनी होगी

अगर बदलाव लाना है तो कानून नहीं सोच बदलनी होगी


नोट बंदी के फैसले को एक पखवाड़े से ऊपर का समय बीत गया है  बैंकों की लाइनें छोटी होती जा रही हैं और देश कुछ कुछ संभलने लगा है।
जैसा कि होता है  , कुछ लोग फैसले के समर्थन में हैं तो कुछ इसके विरोध में  स्वाभाविक भी है किन्तु समर्थन अथवा विरोध तर्कसंगत हो तो ही शोभनीय लगता है।
जब किसी भी कार्य अथवा फैसले पर विचार किया जाता है तो सर्वप्रथम उस कार्य अथवा फैसले को लागू करने में निहित लक्ष्य देखा जाना चाहिए यदि नीयत सही हो तो फैसले का विरोध बेमानी हो जाता है।
यहाँ बात हो रही थी नोटबंदी के फैसले की  । इस बात से तो शायद सभी सहमत होंगे कि सरकार के इस कदम का लक्ष्य देश की जड़ों को खोखला करने वाले भ्रष्टाचार एवं काले धन पर लगाम लगाना था।
यह सच है कि फैसला लागू करने में देश का अव्यवस्थाओं से सामना हुआ लेकिन कुछ हद तक वो अव्यवस्था  काला धन रखने वालों द्वारा ही निर्मित की गईं थीं और आज भी की जा रही हैं।
जिस प्रकार बैंकों में लगने वाली लम्बी लम्बी कतारों के भेद खुल गए हैं उसी प्रकार आज बैंकों में अगर नगदी का संकट हैं तो उसका कारण भी यही काला धन रखने वाले लोग है।

सरकार ने जिन स्थानों को पुराने नोट लेने के लिए अधिकृत किया है वे ही कमीशन बेसिस पर कुछ ख़ास लोगों के काले धन को सफेद करने के काम में लगे हैं और जिन लोगों के पास नयी मुद्राएँ आ रही हैं  वे उन्हें बैंकों में जमा कराने के बजाय मार्केट में ही लोगों का काला धन  सफेद करके पैसा कमाने में लगे हैं  इस प्रकार बैंकों से नए नोट  निकल तो रहे हैं लेकिन वापस जमा न होने के कारण रोटेशन नहीं हो पा रहा।
दरअसल भारत में भ्रष्टाचार की जड़े बहुत पुरानी हैं और इसकी जड़ों ने न सिर्फ देश को खोखला किया है बल्कि यहाँ के आदमी और उसकी सोच को भी खोखला कर दिया है। यह आदमी अपने काले धन को बचाने के लिए ऐसे ऐसे उपाय खोज रहा है कि यदि यही दिमाग सही दिशा में लगता तो शायद आज भारत किसी और ही मुकाम पर होता ।
'भ्रष्टाचार' अर्थात "भ्रष्ट आचरण "   , यह एक नैतिकता से जुड़ी हुई चीज़ है  एक व्यवहार  है जिसे एक बालक को बचपन से ही सिखाया जाता है  ,जैसे सच बोलना  , चोरी नहीं करना , अन्याय नहीं करना  , किसी को कष्ट नहीं पहुँचाना आदि  । यह विचार उसे बचपन में ही परिवार से संस्कारों के रुप में और स्कूलों में नैतिक शिक्षा के रूप में दिए जाते हैं।
यह भारत का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि देवताओं की इस धरती पर जहाँ संस्कार बालक को घुट्टी में दिए जाते हैं आज भ्रष्टाचार अपने चरम पर है।
आम आदमी सरकार के इस कदम में सरकार के साथ है क्योंकि उसके पास खोने को कुछ नहीं है और पाने को सपनों का भारत है।
लेकिन जिनके पास खोने को बहुत कुछ है वो कुतर्कों का सहारा लेकर आम आदमी के हौसले पस्त करने में लगा है 
यह तो सभी जानते हैं कि नेताओं एवं सरकारी अधिकारियों के पास काले धन की भरमार है और यह भी सच है कि वे सभी काफी हद तक अपने धन को  "ठिकाने लगाने" में कामयाब हो गए हैं।
केवल 500.और 1000 के नोट बन्द कर देने से सरकार काले धन पर लगाम नहीं लग सकती और भी उपाय करने होंगे। यह तो भविष्य ही बताएगा कि काले धन से इस लड़ाई में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विजयी होते हैं या फिर उनके विरोधी।
यह जो लड़ाई शुरू हुई है  , वह न सिर्फ बहुत बड़ी लड़ाई है बल्कि बहुत मुश्किल भी है क्योंकि यहाँ सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि इस लड़ाई को वो उसी सरकारी तंत्र के ही सहारे लड़ रहे हैं जो भ्रष्टाचार में लिप्त है इसलिए लोगों के मन में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि सिस्टम वही है और उसमें काम करने वाले लोग वही हैं तो क्या यह एक हारी हुई लड़ाई नहीं है ?
कई जगह देखने में आ रहा है कि बैंक प्रबंधन ही कुछ ख़ास लोगों का काला धन सफेद करने में लगा है तो जो सिस्टम पहले से ही विश्वसनीय नहीं था उस पर आज कैसे भरोसा किया जा सकता है  ? जिन नेताओं और अफसरों को रिश्वत लेने की आदत बन गई है और जो अपनी काली कमाई के सहारे अय्याश जीवन शैली जीने के आदी हो चुके हैं क्या अब वे ईमानदारी की राह पर चल पाएंगे  ?
दूसरी बात सरकार कठोर कानून लागू करने की बात कर रही है तो कानून पहले भी हमारे देश में कम नहीं थे और उन्हीं कानूनों की आड़ में तमाम गैरकानूनी कामों को अंजाम दिया जाता था  ।अगर कोई पकड़ा भी जाता था तो मुकदमे ही तारीखों का इंतजार करते रहते थे बाकी काम गवाहों और सुबूतों को खरीद कर फैसला अपने हक में कराना किसी भी पैसे वाले के लिए कोई मुश्किल काम नहीं था।
इसलिए अगर प्रधानमंत्री इस लड़ाई को उसके मुकाम तक पहुँचाना ही चाहते हैं तो उन्हें इस ओर ध्यान देना होगा कि उनकी योजनाओं के क्रियान्वयन में जो कमियां आ रही हैं वे विगत सत्तर सालों की सुस्त और भ्रष्ट नौकरशाही के कारण आ रही हैं । इस लड़ाई को उसके अंजाम तक पहुँचाने के लिए प्रधानमंत्री को अपने साथ देश के प्रतिभावान युवाओं को जोड़ना होगा।
युवा जिनकी आँखों में उम्मीद के सपने कुछ कर गुजरने की ख्वाहिश , असम्भव को सम्भव कर देने की शक्ति  , और यह भारत का सौभाग्य है कि उसकी जनसंख्या का 65% युवा पीढ़ी है ।इस युवा शक्ति का  आज तक नेताओं ने सत्ता ने राजनीति ने केवल उपयोग किया उन्हें उसमें भागीदार नहीं बनाया। उनकी योग्यता एवं क्षमता 'अनुभव' के आगे हार जाती है ।
देश के युवा जो कि अब तक कोरा कागज़ हैं ,जो खुद भ्रष्टाचार के शिकार हैं  , योग्य एवं प्रतिभा संपन्न होने के बावजूद कभी कालेज में एडमीशन से वंचित हुए तो  कभी मन पसन्द सब्जेक्ट नहीं मिला  कभी योग्य होते हुए भी नम्बर कम हो गए कभी पहचान न होने के वजह से  नौकरी नहीं मिल पाई।
वह युवा जिसके सीने में इस भ्रष्टाचार और सिस्टम के विरुद्ध एक आग जल रही है जो काबिल होते हुए भी खुद को लाचार और बेबस महसूस कर रहा है उसकी इस आग को देशभक्ति की लौ में बदल दिया जाए और इस लौ से भ्रष्टाचार की सालों पुरानी जड़ों में आग लगा दी जाए।
आज केंद्र और राज्य सरकारों की कितनी योजनाओं का लाभ उसके लाभान्वितों को जमीनी स्तर पर क्रियान्वन के अभाव में नहीं मिल पाता और वे सभी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती हैं।
इसलिए आवश्यक है कि प्रधानमंत्री परम्पराओं एवं लीक से हट कर समाज में अपने अपने क्षेत्र की ऐसे प्रतिभाओं के साथ एक नए प्रशासनिक तंत्र की स्थापना करें जो उनके सपनों के भारत के निर्माण में उनका सहयोग करे ।
उसे देश के इस नए कानून की ट्रेनिंग देकर सिस्टम में शामिल किया जाए।
नए कानूनों का पालन देश की युवा शक्ति , नई पीढ़ी  द्वारा कराया जाए एक नए प्रशासनिक तंत्र बनाया जाए जो कि पुराने सिस्टम और पुराने 'सीखे सिखाए ' लोगों की देन ' भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंके ।
क्योंकि पुराने सिस्टम के क्या नेता क्या अफसर और क्या बाबू जो चेन चल रही है ,क्या हम सभी सच से अनजान हैं ?
अगर बदलाव लाना है तो कानून नहीं सोच बदलनी होगी सालों से नौकरी या नेतागिरी करने वाले तो अपनी पूरी सोच अपनी नौकरी अपनी सत्ता और अपना धन बचाने में ही लगाएंगे।

देश में बदलाव तब आएगा जब जिन हाथों में ताकत हो वह हाथ अपनी शक्ति अपनी सोच देश के भविष्य निर्माण में लगाएँ न कि स्वयं अपने भविष्य के।
डॉ नीलम महेंद्र

Thursday, 24 November 2016

एक हाथ से दिया गया दान हज़ारों हाथों से लौट कर आता है

एक हाथ से दिया गया दान हज़ारों हाथों से लौट कर आता है

जो हम देते हैं वो ही हम पाते हैं 

दान के विषय में हम सभी जानते हैं। दान , अर्थात देने का भाव  , अर्पण करने की निष्काम भावना ।
हिन्दू धर्म में दान चार प्रकार के बताए गए हैं  , अन्न दान ,औषध दान , ज्ञान दान एवं अभयदान  एवं आधुनिक परिप्रेक्ष्य में अंगदान का भी विशेष महत्व है।
दान एक ऐसा कार्य , जिसके द्वारा हम न केवल धर्म का पालन करते हैं बल्कि समाज एवं प्राणी मात्र के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन भी करते हैं।
किन्तु दान की महिमा तभी होती है जब वह निस्वार्थ भाव से किया जाता है अगर कुछ पाने की लालसा में दान किया जाए तो वह व्यापार बन जाता है 
यहाँ समझने वाली बात यह है कि देना उतना जरूरी नहीं होता जितना कि 'देने का भाव ' ।अगर हम किसी को कोई वस्तु दे रहे हैं लेकिन देने का भाव अर्थात इच्छा नहीं है तो वह दान झूठा हुआ  , उसका कोई अर्थ नहीं।
इसी प्रकार जब हम देते हैं और उसके पीछे यह  भावना होती है, जैसे पुण्य मिलेगा या फिर परमात्मा इसके प्रत्युत्तर में कुछ देगा , तो हमारी नजर लेने पर है देने पर नहीं तो क्या यह एक सौदा नहीं हुआ  ? दान का अर्थ होता है देने में आनंद ,एक उदारता का भाव प्राणी मात्र के प्रति एक प्रेम एवं दया का भाव किन्तु जब इस भाव के पीछे कुछ पाने का स्वार्थ छिपा हो तो क्या वह दान  रह जाता है  ?
गीता में भी लिखा है कि कर्म करो , फल की चिंता मत करो हमारा अधिकार केवल अपने कर्म पर है उसके फल पर नहीं।
हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है यह तो संसार एवं विज्ञान का साधारण नियम है इसलिए उन्मुक्त ह्रदय से श्रद्धा पूर्वक एवं सामर्थ्य अनुसार दान एक बेहतर समाज के निर्माण के साथ साथ स्वयं हमारे भी व्यक्तित्व निर्माण में सहायक सिद्ध होता है और सृष्टि के नियमानुसार उसका फल तो कालांतर में निश्चित ही हमें प्राप्त होगा।
आज के परिप्रेक्ष्य में दान देने का महत्व इसलिये भी बढ़ गया है कि आधुनिकता एवं भौतिकता की अंधी दौड़ में हम लोग देना तो जैसे भूल ही गए हैं।
हर सम्बन्ध को हर रिश्ते को  पहले प्रेम समर्पण त्याग सहनशीलता से दिल से सींचा जाता था लेकिन आज  !
आज हमारे पास समय नहीं है क्योंकि हम सब दौड़ रहे हैं और दिल भी नहीं है क्योंकि सोचने का समय जो नहीं है !
हाँ , लेकिन हमारे पास पैसा और बुद्धि बहुत है  , इसलिए अब हम लोग हर चीज़ में इन्वेस्ट अर्थात निवेश करते हैं  , चाहे वे रिश्ते अथवा सम्बन्ध ही क्यों न हो !
तो हम लोग निस्वार्थ भाव से देना भूल गए हैं। देंगे भी तो पहले सोच लेंगे कि मिल क्या रहा है  और इसीलिए परिवार टूट रहे हैं , समाज टूट रहा है।
जब हम अपनों को उनके अधिकार ही नहीं दे पाते तो समाज को दान कैसे दे पाएंगे  ?
अगर दान देने के वैज्ञानिक पक्ष को हम समझें  ,जब हम किसी को कोई वस्तु देते हैं तो उस वस्तु पर हमारा अधिकार नहीं रह जाता  , वह वस्तु पाने वाले के आधिपत्य में आ जाती है । अत: देने की इस क्रिया से हम कुछ हद तक अपने मोह पर विजय प्राप्त करने की कोशिश करते हैं 
दान देना हमारे विचारों एवं हमारे व्यक्तित्व पर एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालती है इसलिए हमारी संस्कृति हमें बचपन से ही देना सिखाती है न कि लेना  
हमें अपने बच्चों के हाथों से दान करवाना चाहिए ताकि उनमें यह संस्कार बचपन से ही आ जांए ।
दान धन का ही हो  , यह कतई आवश्यक नहीं  , भूखे को रोटी  , बीमार का उपचार  , किसी व्यथित व्यक्ति को अपना समय, उचित परामर्श  , आवश्यकतानुसार वस्त्र  , सहयोग  , विद्या  यह सभी जब हम सामने वाले की आवश्यकता को समझते हुए  देते हैं और बदले में कुछ पाने की अपेक्षा नहीं करते  ,  यह सब दान ही है 
रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि परहित के समान कोई धर्म नहीं है और दूसरों को कष्ट देने के समान कोई पाप नहीं है।
दानों में विद्या का दान सर्वश्रेष्ठ दान होता है क्योंकि उसे न तो कोई चुरा सकता है और न ही वह समाप्त होती है बल्कि कालांतर में विद्या बढ़ती ही है और एक  व्यक्ति को शिक्षित करने से हम उसे भविष्य में दान देने लायक एक ऐसा नागरिक बना देते हैं जो समाज को सहारा प्रदान करे न कि समाज पर निर्भर रहे ।
इसी प्रकार आज के परिप्रेक्ष्य में रक्त एवं अंगदान समाज की जरूरत है।जो दान किसी जीव  के प्राणों की रक्षा करे उससे उत्तम और क्या हो सकता है  ? हमारे शास्त्रों में ॠषि दधीची का वर्णन है जिन्होंने अपनी हड्डियाँ तक दान में  दे दी थी  ,कर्ण का वर्णन है जिसने अपने अन्तिम समय में भी अपना स्वर्ण दंत याचक को दान दे दिया था।
देना तो हमें प्रकृति रोज सिखाती है  , सूर्य अपनी रोशनी , फूल अपनी खुशबू  , पेड़ अपने फल ,नदियाँ अपनी जल , धरती अपना सीना छलनी कर  के  भी दोनों हाथों से हम पर अपनी फसल लुटाती है।
इसके बावजूद न तो सूर्य की रोशनी कम हुई  ,न फूलों की खुशबू  , न पेड़ों के फल कम हुए न नदियों का जल , अत: दान एक हाथ से देने पर अनेकों हाथों से लौटकर हमारे ही पास वापस आता बस शर्त यह है कि निस्वार्थ भाव से श्रद्धा पूर्वक समाज की भलाई के लिए किया जाए ।
डॉ नीलम महेंद्र

Thursday, 17 November 2016

एक नए भारत का सृजन

एक नए भारत का सृजन 


केन्द्र सरकार द्वारा पुराने 500 और 1000 के नोटों का चलन बन्द करने एवं नए 2000 के नोटों के चलन से पूरे देश में थोड़ी बहुत अव्यवस्था का माहौल है। आखिर इतना बड़ा देश जो कि विश्व में सबसे अधिक जनसंख्या वाले देशों में दूसरे स्थान पर हो थोड़ी बहुत अव्यवस्था तो होगी ही।
राष्ट्र के नाम अपने उद्बोधन में प्रधानमंत्री ने यह विश्वास जताया  था कि इस पूरी प्रक्रिया में देशवासियों को तकलीफ तो होगी लेकिन इस देश के आम आदमी को भ्रष्टाचार और कुछ दिनों की असुविधा में से चुनाव करना हो तो वे निश्चित ही असुविधा को चुनेंगे और वे सही थे।
आज इस देश का आम नागरिक परेशानी के बावजूद प्रधानमंत्री जी के साथ है जो कि इस देश के उज्ज्वल भविष्य की ओर संकेत करता है।
यह बात सही है कि केवल कुछ नोटों को बन्द कर देने से भ्रष्टाचार समाप्त नहीं हो सकता इसलिए प्रधानमंत्री जी ने यह स्पष्ट किया है कि काला धन उन्मूलन के लिए अभी उनके तरकश से और तीर आना बाकी हैं।

भ्रष्टाचार इस देश में बहुत ही गहरी पैठ बना चुका था। आम आदमी भ्रष्टाचार के आगे बेबस था यहाँ तक कि भ्रष्टाचार हमारे देश के सिस्टम का हिस्सा बन चुका था जिस प्रकार हमारे देश में काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था चल रही थी उसी प्रकार सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचारियों द्वारा एक समानांतर  सरकार चलायी जा रही थी।
नेताओं सरकारी अधिकारियों बड़े बड़े कारपोरेट घरानों का तामझाम इसी काले धन पर चलता था। अमीरों और गरीबों के बीच की खाई लगातार बढ़ती जा रही थी।
यह इस देश का दुर्भाग्य है कि विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र होते हुए भी 70 सालों तक जनता द्वारा चुनी हुई सरकार के बावजूद देश आगे जाने की बजाय पीछे ही गया है।
आप इसे क्या कहेंगे कि आजादी के 70 सालों बाद भी इस देश में बेसिक इन्फ्रास्ट्रकचर की कमी है  ?
गाँवों को छोड़िये शहरों तक में पीने का साफ पानी मिलना मुश्किल है !
आज भी कई प्रदेशों   के शहरों तक में 24 घंटे बिजली सप्लाई   एक स्वप्न है  ?
1947
से लेकर आज तक 2016 में हमारे गांवों में लोग आज भी खुले में शौच जाते हैं  !
हमारी सबसे पवित्र नदी जिसे हम मोक्षदायिनी माँ गंगा कहते हैं वो एक नाले में तब्दील हो चुकी है  ?
आजादी के बाद से अब तक हमारे देश में इतने घोटाले हुए हमारी सरकारों ने जाँच भी की लेकिन फिर क्या? क्या किसी एक को भी सज़ा हुई  ? एक भी नेता जेल गया ? क्या घोटाले होने बन्द हो गए  ?
यहाँ पर कुछ तथ्यों का उल्लेख उन बुद्धिजीवियों के लिए आवश्यक है जो विदेशों में जमा काले धन को मुद्दा बने रहे हैं कि 2004 तक स्विस बैंकों में जमा धन के मामले में भारत 37 वें न० पर था । 2007 तक भारत 50 देशों में था लेकिन 2016 में यह 75वें स्थान पर पहुँच गया है। स्विस बैंकों में भारत का धन लगभग 4% कम हो गया है ।ताजा रिपोर्ट के अनुसार स्विस बैंकों में भारत का धन वहाँ कुल जमा धन का मात्र 0.1% रह गया है।
केंद्र सरकार ने काला धन रखने वाले 60 लोगों की सूची तैयार की है जिनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है, यह सभी बड़े बड़े कारपोरेट घरानों से जुड़े हैं।
विदेशों से काला धन वापस लाना या फिर उन लोगों को भारत वापस लाना भारत सरकार के लिए मुश्किल है जो कि घोटाले कर के विदेश भाग गए हैं क्योंकि इसमें दूसरे देश का कानून काम करता है और हमारी सरकार दूसरे देश के कानूनी मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती  । इसलिए भारत सरकार  स्विजरलैंड समेत अन्य कई देशों से ऐसे मामलों के लिए सन्धी कर रही है जिससे कि ऐसे मामलों में आरोपी दूसरे देशों के कानून की आड़ में बच नहीं पाए और वहाँ की सरकारों का सहयोग भारत सरकार को प्राप्त हो।
कुछ लोग ऊर्जित पटेल के हस्ताक्षर पर सवाल उठा रहे हैं कि जब 6 महीनों से नए नोट छप रहे थे और इन्होंने कार्यभार सितंबर में संभाला तो नए नोटों पर इनके हस्ताक्षर कैसे हैं 
तो हम सभी के लिए यह जानना आवश्यक है कि नोटों की छपाई अनेक प्रक्रियाओं से गुजरती है डिजाइनिंग से लेकर पेपर तैयार करने तक , तो नए नोट बनाने की प्रक्रिया भले ही 6 महीने पहले शुरू हुई थी लेकिन छपाई का काम ऊर्जित पटेल के कार्यभार ग्रहण करने के बाद ही शुरू हुआ  (आई बी टी टाइम्स )
अब अगर एक आदमी जो कि इस देश का प्रधानमंत्री है , इस देश को आशवासन दे रहा है कि उसे 50 दिन का समय दीजिए उसके बाद जिस चौराहे पर जो सज़ा देनी हो दे देना  तो ऐसा क्यों है कि हम किसी एक पार्टी को 70 साल तो दे सकते हैं लेकिन एक प्रधानमंत्री को 50 दिन भी नहीं ?
पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है  ।सभी जानते हैं कि कलम की ताकत तलवार से ज्यादा होती है तो क्या यह बेहतर नहीं होता कि देश निर्माण के मौजूदा समय में अपनी इस ताकत का प्रयोग यह स्तंभ  देश की भलाई और लोगों को सहयोग करने के लिए प्रेरित करने में लगाता ? सरकार के इस कदम से उनको और देश को होने वाले फायदे बताता बनिस्बत उन्हें उकसाने के जैसा कि कुछ लोग कर रहे हैं  !
आज अखबारों और न्यूज़ चैनलों में आम आदमी की तकलीफ को हेडलाइन बनाया जा रहा है। आप सभी से एक सवाल क्या इससे पहले हमारे देश में खुशहाली थी  ?
क्या कोई भूखा नहीं सोता था  ?
क्या किसानों द्वारा आत्महत्याएं नहीं होती थीं ?
क्या हमारा कोई भी युवा बेरोजगार नहीं था  ?
क्या राशन की दुकानों में कभी लाइनें नहीं लगीं  ?
क्या बरसातों में हमारी राजधानी समेत अनेक बड़े बड़े शहर पानी की व्यवस्थित निकासी न होने के कारण बाढ़ का शिकार नहीं हो जाते  ?

क्या किसी भी सरकारी दफतर में आम आदमी का काम एक बार में बिना पहचान या रिश्वत के हो जाता था ?
हमारे इस आम आदमी का कष्ट आपको 70 साल से नहीं दिख रहा था ? इन कष्टों से उस आम आदमी का जीवन परेशानियों से भर रहा था उसका सामाजिक स्तर भी गिर रहा था  उसकी मेहनत की कमाई रिश्वत में जा रही थी  ।कोई उसे सुनने वाला नहीं था और वो थकहार कर इन सब कष्टों को अपने जीवन का हिस्सा मानकर स्वीकार कर चुका था  ।लेकिन किसी ने इस आम आदमी के दर्द को अपनी आवाज़ नहीं दी  !
आज वह आम आदमी लाइन में खुशी से खड़ा है , एक बेहतर कल की आस में वो अपना आज कुर्बान करने को तैयार है। 
उसे स्वतंत्रता संग्राम याद है जब इस देश का बच्चा बच्चा उस लड़ाई का हिस्सा बनने के लिए तत्पर था 
आज उसे मौका मिला है फिर से एक स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा बनने का  , स्वतंत्रता भ्रष्टाचार से, काले धन से  ,लम्बी कतारों से  , लम्बे इंतजार से  , अरबों करोड़ों के घोटालों से  , तो वह खुशी खुशी इस आंदोलन का हिस्सा बनने को तैयार है ।
वो जानता है कि एक नए भारत का निर्माण हो रहा है और सृजन आसान नहीं होता  , सहनशीलता ,त्याग,समर्पण सभी कुछ लगता है । 70 साल पुरानी जड़ें उखाड़ने में समय और मेहनत दोनों लगेंगे ।यह काम एक अकेला आदमी नहीं कर सकता। देश हमारा है और हमें इसमें अपना सहयोग देना ही होगा 
एक गमले में पौधा भी लगाते हैं तो रोज खाद पानी हवा और धूप देनी पड़ती है और सब्र से प्रतीक्षा करनी पड़ती है तब जाकर वह खिलता है।
एक मादा जानवर भी अपने बच्चे को जन्म देने के लिए सहनशीलता से प्रसव पीड़ा से गुजरती है लेकिन बच्चे का मुख देखते ही अपनी पीड़ा भूल जाती है  ।जब एक जानवर इस बात को समझता है तो हम मानव इस बात को क्यों नहीं समझ पा रहे कि हमारा देश अभी प्रसव पीड़ा से गुजर रहा है थोड़ी तकलीफ़ सह लीजिए  नए भारत का सृजन हो रहा है।
नए भारत के सूर्योदय की पहली किरण निश्चित ही इस पीड़ा को भुला देगी ।

डाँ नीलम महेंद्र