Friday, 18 August 2017

क्या ऐसे बनेगा मोदी का न्यू इंडिया

क्या ऐसे बनेगा मोदी का न्यू इंडिया


धर्म मनुष्य में मानवता जगाता है,
लेकिन जब धर्म ही मानव के पशु बनने का कारण बन जाए तो दोष किसे दिया जाए धर्म को या मानव को ?
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ताजा बयान का मकसद जो भी रहा हो लेकिन नतीजा अप्रत्याशित नहीं था।
कहने को भले ही हमारे देश की पहचान उसकी यही सांस्कृतिक विविधता है लेकिन जब इस विविधता को स्वीकार्यता देने की पहल की जाती है तो विरोध के स्वर कहीं और से नहीं इसी देश के भीतर से उठने लगते हैं।
जैसा कि होता आया है ,मुद्दा भले ही सांस्कृतिक था लेकिन राजनैतिक बना दिया गया।
देश की विभिन्न पार्टियों को देश के प्रति अपने  'कर्तव्यबोध' का ज्ञान हो गया और अपने अपने वोट बैंक को ध्यान में रखकर बयान देने की होड़  लग गई।
विभिन्न टीवी चैनल भी अपनी कर्तव्यनिष्ठा में पीछे क्यों रहते ? तो अपने अपने चैनलों पर बहस का आयोजन किया और हमारी राष्ट्रीय स्तर की पार्टियों के प्रवक्ता भी एक से एक तर्कों के साथ उपस्थित थे।
और यह सब उस समय जब एक तरफ देश अपने 66 मासूमों की मौत के सदमे में डूबा है,तो दूसरी तरफ बिहार और आसाम के लोग बाढ़ के कहर का सामना कर रहे हैं।
कहीं मातम है, कहीं भूख है, कहीं अपनों से बिछड़ने का दुख है तो कहीं अपना सब कुछ खो जाने का दर्द।
लेकिन हमारे नेता नमाज और जन्माष्टमी में उलझे हैं।
सालों से इस देश में मानसून में कुछ इलाकों में हर साल बाढ़ आती है जिससे न सिर्फ जान और माल का नुकसान होता है बल्कि फसल की भी बरबादी होती है।
वहीं दूसरी ओर कुछ इलाके मानसून का पूरा सीज़न पानी की बूंदों के इंतजार में निकाल देते हैं और बाद में उन्हें सूखाग्रस्त घोषित कर दिया जाता है।
इन हालातों की पुनरावृत्ति न हो और नई तकनीक की सहायता से इन स्थितियों पर काबू पाने के लिए न तो कोई नेता बहस करता है न आंदोलन।
फसलों की हालत तो यह है कि अभी कुछ दिनों पहले किसानों द्वारा जो टमाटर और प्याज सड़कों पर फेंके जा रहे थे  आज वही टमाटर 100 रुपए और प्याज तीस रुपए तक पहुँच गए हैं।

क्योंकि हमारे देश में न तो भंडारण की उचित व्यवस्था है और न ही किसानों के लिए ठोस नीतियाँ। लेकिन यह विषय हमारे नेताओं को नहीं भाते।
किसान साल भर मेहनत कर के भी कर्ज में डूबा है और आम आदमी अपनी मेहनत की कमाई महंगाई की भेंट चढ़ाने के लिए मजबूर।
लेकिन यह सब तो मामूली बातें हैं!
इतने बड़े देश में थोड़ी बहुत अव्यवस्था हो सकती है ।
सबसे महत्वपूर्ण विषय तो यह है कि थानों में जन्माष्टमी मनाई जानी चाहिए कि नहीं?
काँवर यात्राओं में डीजे बजना चाहिए कि नहीं?
सड़कों पर या फिर एयरपोर्ट पर नमाज पढ़ी  जाए तो उससे किसी को कोई आपत्ति नहीं है क्योंकि किसी समुदाय विशेष की धार्मिक भावनाएं आहत होती हैं।
मस्जिदों में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद लाउड स्पीकर बजेंगे क्योंकि यह उनकी धार्मिक भावनाओं के सम्मान का प्रतीक है।
मोहर्रम के जलूस को सड़कों से निकलने के लिए जगह देना इस देश के हर नागरिक का कर्तव्य है क्योंकि यह देश गंगा जमुना तहज़ीब को मानता आया है।
लेकिन कांवरियों के द्वारा रास्ते बाधित हो जाते हैं जिसके कारण जाम लग जाता है और कितने जरूरतमंद लोग समय पर अपने गन्तव्यों तक नहीं पहुंच पाते।और इस यात्रा में बजने वाले डीजे ध्वनि प्रदूषण फैलाते हैं।
इस तरह की बातें कौन करता है?
क्या इस देश का किसान जो साल भर अपने खेतों को आस से निहारता रहता है
या फिर वो आम आदमी जो सुबह नौकरी पर जाता है और शाम को पब्लिक ट्रांसपोर्ट के धक्के खाता थका हारा घर आता है
या फिर वो व्यापारी जो अपनी पूंजी लगाकर अपनी छोटी सी दुकान से अपने परिवार का और माता पिता का पेट पालने की सोचने के अलावा कुछ और सोच ही नहीं पाता।
या वो उद्यमी जो जानता है कि एक दिन की हड़ताल या दंगा महीने भर के लिए उसका धंधा चौपट कर देगा
या फिर वो गृहणी जो जिसकी पूरी दुनिया ही उसकी चारदीवारी है जिसे सहेजने में वो अपना पूरा जीवन लगा देती है
या फिर वो मासूम बच्चे जो गली में ढोल की आवाज सुनते ही दौड़े चले आते हैं
उन्हें तो नाचने से मतलब है धुन चाहे कोई भी हो
जब इस देश का आम आदमी केवल शांति और प्रेम से अपनी जिंदगी जीना चाहता है तो कौन हैं वो लोग जो बेमतलब की बातों पर राजनीति कर के अपने स्वार्थ सिद्ध करते हैं?
अब जब न्यू इंडिया बन रहा है तो उसमें  'ओल्ड'
की कोई जगह नहीं बची है। ये बातें और इस तरह की बहस पुरानी हो चुकी हैं इस बात को हमारे नेता जितनी जल्दी समझ जाए उतना अच्छा नहीं तो आज सोशल मीडिया का जमाना है और यह पब्लिक है जो सब जानती है। बाकी समझदार को इशारा काफी है
डॉ नीलम महेंद्र

Tuesday, 8 August 2017

क्यों हम बेटियों को बचाएँ

क्यों हम बेटियों को बचाएँ



मुझे मत पढ़ाओ , मुझे मत बचाओ,, मेरी इज्जत अगर नहीं कर सकते ,तो मुझे इस दुनिया में ही मत लाओ
मत पूजो मुझे देवी बनाकर तुम ,मत कन्या रूप में मुझे 'माँ' का वरदान कहो
अपने अंदर के राक्षस का पहले तुम खुद ही संहार करो। 
एक बेटी का दर्द
चंडीगढ़ की सड़कों पर जो 5 ता० की रात हुआ वो देश में पहली  बार तो नहीं हुआ।
और ऐसा भी नहीं है कि हम इस घटना से सीख लें और यह इस प्रकार की आखिरी घटना ही हो।
बात यह नहीं है कि यह सवाल कहीं नहीं उठ रहे कि रात बारह बजे दो लड़के एक लड़की का पीछा क्यों करते हैं,बल्कि सवाल तो यह उठ रहे हैं कि रात बारह बजे एक लड़की घर के बाहर क्या कर रही थी।
बात यह भी नहीं है कि वे लड़के नशे में धुत्त होकर एक लड़की को परेशान कर रहे थे,
बात यह है कि ऐसी घटनाएं इस देश की सड़कों पर आए दिन और आए रात होती रहती हैं।
बात यह नहीं है कि इनमें से अधिकतर घटनाओं का अंत पुलिस स्टेशन पर पीड़ित परिवार द्वारा न्याय के लिए अपनी आवाज़  उठाने के साथ नहीं होता।
बात यह है कि ऐसे अधिकतर मामलों का अन्त पीड़ित परिवार द्वारा घर की चार दीवारी में अपनी जख्मी आत्मा की चीखों को दबाने के साथ होता है।
बात यह नहीं है कि दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र में न्याय के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है,
बात यह है कि इस देश में अधिकार भी भीख स्वरूप दिये जाते है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा पहलू यह है कि वर्णिका कुंडु जिन्होंने रिपोर्ट लिखवाई है,एक आईएएस अफ्सर की बेटी हैं, यानी उनके पिता इस सिस्टम का हिस्सा हैं।
जब वे और उनके पिता उन लड़कों के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाने के लिए पुलिस स्टेशन गए थे तब तक उन्हें नहीं पता था कि वे एक राजनैतिक परिवार का सामना करने जा रहे हैं लेकिन जैसे ही यह भेद खुला कि लड़के किस परिवार से ताल्लुक रखते हैं तो पिता को यह आभास हो गया था कि न्याय की यह लड़ाई कुछ लम्बी और मुश्किल होने वाली है।
उनका अंदेशा सही साबित भी हुआ।
न सिर्फ लड़कों को थाने से ही जमानत मिल गई बल्कि एफआईआर में लड़कों के खिलाफ लगी धाराएँ भी बदल कर केस को कमजोर करने की कोशिशें की गईं।
जब उनके साथ यह व्यवहार हो सकता है तो फिर एक आम आदमी इस सिस्टम से क्या अपेक्षा करे?
जब एक आईएएस अफ्सर को अपने पिता का फर्ज निभाने में इतनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है तो एक साधारण पिता क्या उम्मीद करे?
वर्णिका के पिता ने तो आईएएस लाबी से समर्थन जुटा कर इस केस को सिस्टम वर्सिस पालिटिक्स करके इसके रुख़ को बदलने की कोशिश की है लेकिन एक आम पिता क्या करता?
जब एक लोकतांत्रिक प्रणाली में सत्ताधारी पार्टी के अध्यक्ष का बेटा ऐसा काम करता है तो वह पार्टी अपने नेता के बचाव में आगे आ जाती है क्योंकि वह सत्ता तंत्र में विश्वास करती है लोकतंत्र में नहीं,वह तो सत्ता हासिल करने का एक जरिया मात्र है।
उसके नेता यह कहते हैं कि पुत्र की करनी की सजा पिता को नहीं दी जा सकती तो बिना योग्यता के पिता की राजनैतिक विरासत उसे क्यों दे दी जाती है।
आप अपनी ही पार्टी के प्रधानमंत्री के लाल किले से दिए गए भाषण को भी नकार देते हैं जो कहते हैं कि हम अपनी बेटियों से तो तरह तरह के सवाल पूछते हैं,उन पर पाबंदियां भी लगाते हैं लेकिन कभी बेटे से कोई सवाल कर लेते, कुछ संस्कारों के बीज उनमें डाल देते, कुछ लगाम बेटों पर लगा देते  तो बेटियों पर बंदिशें नहीं लगानी पड़तीं।
यह कैसा लोकतंत्र है जिसमें सरकार अपने नागरिकों की सुरक्षा से ऊपर अपने नेताओं और स्वार्थों को रखती है?
यह कैसी व्यवस्था है जहाँ अपने अधिकारों की बात करना एक "हिम्मत का काम" कहा जाता है।
हम एक ऐसा देश क्यों नहीं बना सकते जहाँ हमारी बेटियाँ भी बेटों की तरह आजादी से जी पाँए ?
हम अपने भूतपूर्व सांसदों विधायकों नेताओं को आजीवन सुविधाएं दे सकते हैं लेकिन अपने नागरिकों को सुरक्षा नहीं दे सकते।
हम नेताओं को अपने ही देश में अपने ही क्षेत्र में जेड प्लस सेक्यूरिटी दे सकते हैं लेकिन अपनी बेटियों को सुरक्षा तो छोड़िये न्याय भी नहीं  ?
देश निर्भया कांड को भूला नहीं हैं और न ही इस सच्चाई से अंजान है कि हर रोज़ कहीं न कहीं कोई न कोई बेटी किसी न किसी अन्याय का शिकार हो रही है। उस दस साल की मासूम और उसके माता पिता का दर्द कौन समझ सकता है जो किसी और की हैवानियत का बोझ इस अबोध उम्र में उठाने के लिए मजबूर है। जिसकी खिलौनों से खेलने की उम्र थी वो खुद किसी अपने के ही हाथ का खिलौना बन गई। जिसकी हँसने खिलखिलाने की उम्र थी वो आज दर्द से कराह रही है।जो खुद एक बच्ची है लेकिन माँ बनने के लिए मजबूर है।
क्यों हम बेटियों को बचाएँ ? इन हैवानों के लिए?
हम अपने बेटों को क्यों नहीं सभ्यता और संस्कारों का पाठ पढ़ाएँ ?
बेहतर यह होगा कि बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के बजाय
बेटी बचानी है तो पहले बेटों को सभ्यता और संस्कारों का पाठ पढ़ाओ ।उन्हें बेटियों की इज्जत करना तो सिखाओ।
डॉ नीलम महेंद्र


Tuesday, 1 August 2017

देश तो देशवासी बनातें हैं

देश तो देशवासी बनातें  हैं

“इतिहास केवल गर्व महसूस करने के लिए नहीं होता सबक लेने के लिए भी होता है क्योंकि जो अपने इतिहास से सीख नहीं लेते वो भविष्य के निर्माता भी नहीं बन पाते।“

भारत के प्रधानमंत्री आदरणीय नरेन्द्र मोदी ने जिस प्रकार "मन की बात" कार्यक्रम से पूरे देश से सीधा संपर्क साधा है वो वाकई काबिले तारीफ है।
इस कार्यक्रम के द्वारा वे न सिर्फ देश के हर वर्ग से मुखातिब होकर उन्हें देश को उनसे जो अपेक्षाएँ हैं,उनसे अवगत कराते हैं बल्कि अपनी सरकार की नीतियों,उनके उद्देश्य एवं देश को उनसे होने वाले लाभ से भी रूबरू कराते हैं।
इस बार उनकी मन की बात का केंद्र 'अगस्त का महीने ' रहा।
वो महीना जिसमें असहयोग आंदोलन की शुरुआत हुई, अंग्रेजों भारत छोड़ो के नारे लगे,और हमें लगभग 200 सालों की गुलामी से आजादी मिली।
यह वो महीना है जिसमें हमें एक  लम्बे संघर्ष के बाद "स्वराज" तो मिल गया लेकिन  "सुराज" का आज भी देश को इंतजार है।
दुनिया 15 अगस्त 1947 को देश की आजादी का जश्न देखती है  लेकिन इस 'एक दिन ' के लिए हमने लगभग सौ सालों तक जो कुर्बानियाँ दीं उनका दर्द तो केवल हम ही महसूस कर सकते हैं।
दरअसल हमारी सफलता को तो दुनिया देखती है लेकिन इस दिन के पीछे के त्याग और बलिदान को  कोई देख नहीं पाता।
1857
में रानी लक्ष्मीबाई की तलवार से जो चिंगारी भड़की थी, वो 9 अगस्त 1942 तक एक लौ बन चुकी थी।
वो लौ जिसकी अगन में देश का बच्चा बूढ़ा जवान, सभी जल रहे थे।
पूरे भारत में धधकने वाली इस ज्वाला के तेज के आगे अंग्रेज टिक नहीं पाए और 1947 में वो ऐतिहासिक लम्हा भी आया जिसकी चाह में इस माटी के वीरों ने अपनी जान की परवाह भी नहीं की थी।
लेकिन क्या यह आजादी का पल केवल एक नारे से आया?
  "
अंग्रेजों भारत छोड़ो"   यह नारा डॉ युसुफ मेहर अली ने  दिया, "करो या मरो" का नारा गाँधीजी ने दिया और अंग्रेज चले गए?
नहीं,हम सभी जानते हैं कि केवल भाषण और नारों से काम नहीं चलता।
ठोस धरातल पर जमीनी स्तर पर काम करने से बात बनती है।
उस समय भी यही हुआ,
नारा हमारे नेताओं ने दिया लेकिन आवाज हर मुख से निकली,
उस यज्ञ में आहुति हर आत्मा ने दी,
जिस से जो बन पाया, उसने वो किया,
उस समय जब अंग्रेजी हुकूमत ने कांग्रेस को एक "गैरकानूनी संस्था" घोषित कर दिया और सभी बड़े नेताओं को या तो जेल में डाल दिया या फिर नजरबंद कर दिया, आंदोलन की बागडोर इस देश के आम आदमी ने अपने हाथों में ले ली।
ब्रिटिश शासन का विरोध रुका नहीं, बल्कि और उग्र हो गया।
सरकारी सेवकों ने त्यागपत्र नहीं दिए लेकिन कांग्रेस के साथ अपनी राजभक्ति खुलकर घोषित कर दी,
सैनिकों ने सेना में रहते हुए ब्रिटिश सरकार के आदेशों के खिलाफ खुली बगावत की और  भारतीयों पर गोलियां चलानी बंद कर दी,
छात्रों ने शिक्षण संस्थानों में हड़ताल कर दी,जुलूस निकाले,जगह जगह पर्चे बाँटे और भूमिगत कार्यकर्ताओं के लिए संदेशवाहक का कार्य किया,
कृषकों ने  सरकार समर्थक जमींदारों को लगान देना बन्द कर दिया,
राजे महाराजाओं ने जनता का सहयोग किया और अपनी प्रजा की सम्प्रभुता स्वीकार कर ली
महिलाएं और छात्राएं भी पीछे नहीं थीं, उनकी आंदोलन में सक्रिय भागीदारी रही।
कहने का तात्पर्य यह है कि इस देश के हर नागरिक ने जिस भी रूप में वो अपन योगदान दे सकता था,दिया।
हर दिल में वो ज्वाला थी जो ज्वालामुखी बनी तब जाकर हम गुलामी के अंधेरे से निकल कर स्वतंत्रता के सूर्योदय को देख पाए।
यही ज्वाला आज फिर से देश के हर ह्रदय में जगनी चाहिए।
आज हमारा देश एक बार फिर अंधकार के साये में कैद होता जा रहा हैं।
हमारे समाज में कुछ बुराइयाँ हैं जो देश को आगे बढ़ने से रोक रही हैं
ये बुराइयाँ हैं ,भ्रष्टाचार ,आतंकवाद ,जातिवाद ,सम्प्रदायवाद ,
गरीबी,जगह जगह फैली गन्दगी के,बेरोजगारी ,अबोध बालिकाओं के साथ होने वाले अत्याचार आदि ।
यह सभी इस देश की नींव को खोखला करने में लगी हैं।
देश के प्रधानमंत्री ने अपने मन की बात में पूरे देश का आह्वान किया है कि इस बार अगस्त मास में हम सभी इन बुराइयों के खिलाफ एक महाभियान चलाँए और
एक नए भारत के निर्माण का संकल्प लें।
लेकिन नए भारत का निर्माण तभी संभव हो पाएगा जब  देश के प्रधानमंत्री के मन की बात इस देश के हर नागरिक के मन की बात बनेगी।
जब  एक अग्नि देश के हर दिल में जलेगी
जब देश का हर व्यक्ति बच्चा बूढ़ा जवान अपने मन में खुद से वादा करेगा कि मुझे इन बुराइयों को इस देश से भगाना है।
मुझे आज फिर से देश के लिए इससे लड़ना है।
एक ऐसा देश बनना है जहाँ
धर्म हो इंसानियत,
जाति हो मानवता ,
योग्यता हो ईमानदारी,
सबला हो हर नारी।
हर नागरिक को बराबरी का दर्जा संविधान में नहीं व्यवहार में हासिल हो,
और कानून चेहरों के मोहताज न हों
जहाँ देश का कोई भी व्यक्ति परेशान न हो।
जहाँ स्वराज के साथ सुराज भी हो।
डॉ नीलम महेंद्र