Monday, 27 March 2017

नवसंवत्सर एक नये सफर की शुरूआत

नवसंवत्सर एक नये सफर की शुरूआत

नव संवत्सर नववर्ष नवरात्रि नवभोर , समय है अपनी जड़ों को पोषित करने का समय है आगे बढ़ने का।

नवरात्रि अर्थात् शक्ति स्वरूप माँ के नौ रूपों के पूजन के नौ विशेष दिन। वैसे तो नवरात्रि साल में दो बार आती हैं लेकिन चैत्र मास में पड़ने वाली नवरात्रि का पहला दिन जिसे गुड़ीपड़वा के नाम से भी जाना जाता है भारतीय नववर्ष का पहला दिन भी होता है।
यहाँ यह जानना रोचक होगा कि अंग्रेजी नव वर्ष  365 दिनों में 12 महीनों के एक चक्र के पूर्ण होने की एक बेहद सरल प्रक्रिया है जिसमें 31 दिसंबर की रात 12 बजे तारीख़ ही नहीं साल भी बदलता है और पूरी रात अलसुबह भोर तक जश्न में डूबे लोग जाते साल को अलविदा कहते हैं और नए साल का स्वागत कुछ इस तरह करते हैं कि उसके पहले सूर्योदय तक थक के चूर गहरी नींद की आगोश में अपनी थकान मिटा रहे होते हैं।
यह खेद का विषय है कि आधुनिकता की दौड़ में हम लोग  अपनी पूर्णता वैज्ञानिक संस्कृति को पिछड़ा हुआ मानकर भुलाते जा रहे हैं।
अंग्रेजी नव वर्ष के विपरीत भारतीय काल गणना के अनुसार नव वर्ष अथवा नव सम्वत्सर 'समझने के हिसाब से  एक सरल प्रक्रियान होकर सूर्य चन्द्रमा तथा नक्षत्रों  तीनों के समन्वय पर अनेकों ॠषियों के वैज्ञानिक अनुसंधानों पर आधारित है। यह 6 ॠतुओं ( भारत वह सौभाग्यशाली देश है जहाँ हम सभी 6 ॠतुओं को अनुभव कर सकते हैं ) के एक चक्र के पूर्ण होने का वह दिन होता जिस दिन पृथ्वी सूर्य का एक चक्कर पूर्ण करती है।  इस  दिन की सबसे खास बात यह है कि इस दिन, दिन व रात बराबर के होते हैं अर्थात् 12 -12 घंटे के। इसके बाद से रात्रि की अपेक्षा दिन बड़े होने लगते हैं तथा दिन व रात के माप में अन्तर आने लगता है।
नवसंवत्सर 'न्यू ईयर' जैसे केवल 12 महीने का समय नापने की एक ईकाई न होकर खगोलीय घटनाओं के आधार पर भारतीय समाज के लिए सामाजिक सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक तरीके से जीवन पद्धति का पथ प्रदर्शक है।

यह केवल एक नए महीने की एक नई तारीख़ न होकर पृथ्वी के एक चक्र को पूर्ण कर एक नए सफर का आरंभ काल है। यह वह समय है जब सम्पूर्ण प्रकृति पृथ्वी को इस नए सफर के लिए शुभकामनाएँ दे रही होती है। जब नए फूलों और पत्तियों से पेड़ पौधे इठला रहे होते हैं , जब मनुष्य को उसके द्वारा साल भर की गई मेहनत का फल लहलहाती फसलों के रूप में मिल  चुका होता है ( होली पर फसलें कटती हैं ) और पुनः एक नई शुरुआत की प्रेरणा प्रकृति से मिल रही होती है।
यह वह समय होता है जब मनुष्य मात्र ही नहीं प्रकृति भी नए साल का स्वागत कर रही होती है। धरती हरी भरी चादर और बगीचे लाल गुलाबी चुनरी ओड़े सम्पूर्ण वातावरण में एक नयेपन का एहसास करा रही होती है।
लेकिन बेहद अफसोस की बात है कि जो भारत अपनी सभ्यता  संस्कृति और ज्ञान के क्षेत्र में दुनिया के लिए एक आश्चर्य था, जिसे कभी विश्व गुरु और सोने की चिड़िया कहा जाता था आज एक विकासशील देश बनकर रह गया है।
जिस गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत की खोज आधुनिक विज्ञान में न्यूटन के नाम है उससे 550 वर्ष पूर्व भास्कराचार्य ने इसका विस्तार से वर्णन किया था।
पश्चिमी सभ्यता में 15 वीं शताब्दी में गैलीलियो के समय में यह धारणा थी कि पृथ्वी स्थिर है तथा सूर्य उसका चक्कर लगाता है परन्तु उससे 1500 वर्ष पूर्व आर्यभट्ट ने यह बता दिया था कि पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है और सूर्य का चक्कर लगाती है।
जिस सापेक्षता के सिद्धांत के लिए आइन्सटीन को जाना जाता है उसका उल्लेख वर्षों पूर्व हमारे पुराणों में मिलता है।
आज हम लोग जिस पश्चिमी सभ्यता का अन्धानुकरण कर रहे हैं किसी समय उसने भारतीय ज्ञान का अनुसरण करके अपनी सभ्यता स्थापित की थी। 1752 ई तक इंग्लैंड में भी नव वर्ष 25 मार्च से ही आरंभ होता था इसलिए वर्ष 10 महीने का होता था और महीनों के नाम आप स्वयं समझें कि कहाँ से आए, सातवाँ महीना सितंबर  (सप्तम ) ,अक्टूबर (अष्टम  ) , नवम्बर  ( नवमी ) तथा दिसंबर। (दशमी  )
लेकिन न जाने क्यों आज हम  पश्चिमी सभ्यता की नकल करते हुए रात्रि 12 बजे तारीख बदलने की संस्कृति को स्वीकार करते हैं जबकि हमारी संस्कृति में तिथि सूर्योदय के साथ बदलती है।
इस जानकारी से शायद हर भारतीय को शर्मनाक आश्चर्य होगा कि जो पश्चिमी सभ्यता इंग्लैंड के ग्रीनविच नामक स्थान से मध्यरात्रि 12 बजे को दिन परिवर्तन का समय मानती है , उसका आधार यह है कि उनकी मध्यरात्रि के समय हमारे भारत में सूर्योदय हो रहा होता है।
हमारी संस्कृति वर्षों पुरानी होने के बावजूद आज भी प्रासंगिक है और आधुनिक  विज्ञान से कहीं आगे है।
जो खोज हमारे ॠषी मुनी हजारों साल पहले कर गए थे 21 वीं सदी के वैज्ञानिक उन पर अनुसंधान करके उनको सही पा रहे हैं।
चाहे गणित के क्षेत्र में शून्य की खोज हो चाहे चिकित्सा के क्षेत्र में अंग प्रत्यारोपण ( गणेश जी के सिर पर हाथी का सिर ) , चाहे शिक्षा का क्षेत्र में  तक्षशिला विश्व का सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय हो चाहे सभ्यता के क्षेत्र में भारतीय सिन्धू घाटी सभ्यता, हर क्षेत्र में भारत शिखर पर था।
अब समय है अपनी गलतियों से सबक लेकर अपनी संस्कृति की तरफ वापस जाकर विश्व में पुनः आगे जाने का।
अब समय है कि हम अपनी भावी पीढ़ी को अपने अतीत पर गर्व करना सिखाएँ।
इस नवसंवत्सर समय है कि पृथ्वी के साथ साथ हम सभी एक नए सफर की शुरूआत करें, एक बार फिर से विश्व गुरु बनने के सफर की शुरूआत।
इस संवत्सर यह प्रण लें कि हम उस भारत का निर्माण करें जिसका अनुसरण विश्व करना चाहेगा।

डॉ नीलम महेंद्र

Wednesday, 22 March 2017

असाधारण चुनाव के असाधारण नतीजे

असाधारण चुनाव के असाधारण नतीजे


"हमारा अतीत हमारे वर्तमान पर हावी होकर हमारे भविष्य पर प्रश्न चिह्न लगा देता है " , एक कटु सत्य ।
' सबका साथ,सबका विकास '
क्या संभव हो पाएगा जब यूपी में होगा योगी का राज ?
यूपी  चुनावों के चौंकाने वाले नतीजों से देश के कथित सेकुलर नेता और मीडिया उबर भी नहीं पायी थी कि मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा से सभी राजनैतिक पंडितों को जोर का झटका उतने ही जोर से लगा। मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ के चयन को लेकर बीजेपी पर लगातार  चौतरफे हमले हो रहे हैं। अगर देश की मीडिया की प्रतिक्रिया की बात करें तो अखबारों की सुर्खियाँ कुछ यूँ हैं,  ' जो लोग यह सोचते थे कि मोदी गुजरात छोड़ने के बाद बदल गए हैं, वो गलत थे। योगी आदित्यनाथ की उप्र के मुख्यमंत्री के रूप में ताजपोशी बता रही है कि पुराने मोदी अब भी जिंदा हैं।'
' भारतीय जनता पार्टी ने विशाल बहुमत हासिल करने के बाद भी उप्र का मुख्यमंत्री आदित्यनाथ को बनाया है तो इससे यही जाहिर होता है कि पार्टी की राजनीति में अगर लाग इन " विकास " है तो पासवर्ड " हिन्दुत्व " है।'
योगी को यूपी जैसे राज्य का मुख्यमंत्री बनाने की गूँज देश ही नहीं विदेशों में भी पंहुची।
प्रधानमंत्री मोदी के विकास के एजेन्डे के मद्देनजर  'न्यूयौर्क टाइम्स ' ने उनके इस कदम को एक झटका कहा, तो ' द गार्जियन' का कहना है कि योगी की ताकतवर शख्सियत इस ओर इशारा करती है कि अब भारतीय अल्पसंख्यकों की स्थिति बहुसंख्यकों की गुडविल पर निर्भर हैं।
जबकि " द इकोनोमिस्ट " ने मुख्यमंत्री के रूप में योगी के चयन को एक अनयूस्यल चौइस अर्थात  एक असामान्य चुनाव कहा है।
दरअसल उप्र के विधानसभा चुनावों में बीजेपी की ऐतिहासिक जीत के बाद योगी आदित्यनाथ का नाम मुख्यमंत्री पद के लिए उठाया तो जा रहा था लेकिन यह पार्टी नेताओं के स्तर पर कम और कार्यकर्ताओं के स्तर पर अधिक था ।
उप्र की जगह देश की राजनीति में खास केवल आबादी के लिहाज से ही नहीं है, बल्कि इसलिए भी है कि वह लोकसभा में 80 सांसद भेजता है। मोदी जिस गुजरात से आते हैं, वहाँ के तीन गुने से भी ज्यादा ।

और इन विधानसभा चुनावों में बीजेपी एवं सहयोगी दलों का 325 सीटों पर विजय प्राप्त करना उप्र जैसे राज्य के लिए अपने आप में एक अद्भुत घटना है जहाँ कोई हिन्दू नहीं  है। यहाँ केवल ब्राह्मण राजपूत दलित यादव पिछड़े और दूसरी जातियाँ हैं अथवा अल्पसंख्यक हैं। लेकिन यह पहली बार है कि यूपी की जनता ने एक ऐसा जनादेश दिया जिसमें जातियों का भेद खत्म हो गया।
दरअसल यहाँ के आम आदमी ने मोदी को वोट दिया और उस उम्मीद के पक्ष में वोट दिया जो सालों बाद इस देश का कोई प्रधानमंत्री उनके दिलों में जगा सका कि 'अच्छे दिन आने वाले हैं '
उस हताशा के खिलाफ वोट दिया जो मुलायम अखिलेश मायावती सरीखे नेताओं की वोट बैंक की गंदी राजनीति और छद्म सेक्यूलरवाद  से उपजी ।
यह वोट केवल हिन्दू वोट भी नहीं था, पूर्वांचल, तराई, बुन्देलखण्ड और अवध क्षेत्र के मुसलमानों ने भी खासी तादाद में भाजपा को वोट दिया है।
सबसे बड़ी बात तो यह है कि उप्र की जनता जानती थी कि भाजपा जीत भी जाए तब भी मोदी मुख्यमंत्री नहीं होंगे और  वे यह भी नहीं जानते थे कि भाजपा किसे मुख्यमंत्री बनाएगी उसके बावजूद प्रदेश की जनता का यह जनादेश अपने प्रधानमंत्री पर उसके भरोसे का प्रतिनिधित्व करता है।
इस भरोसे से उपजी जिम्मेदारी का एहसास माननीय मोदी जी को नहीं हो ऐसा सोचना सबसे बड़ी मूर्खता होगी।
इसलिए जो लोग योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री के तौर पर एक कट्टर हिंदूवादी फैसला मान रहे हैं वो योगी को नहीं मोदी को नहीं समझ पाए। वे पहले उनकी सर्जिकल स्ट्राइक नहीं समझ पाए, फिर नोटबंदी भी नहीं समझ पाए और न ही यूपी की जनता को समझ पाए।
यही वजह थी कि अखिलेश को नतीजों के बाद कहना पड़ा कि मेरी जनसभाओं में लोग तो बहुत आए लेकिन चुनावों में वोट नहीं आए।
जो लोग यह कह रहे हैं कि जिस व्यक्ति के पास कोई प्रशासनिक अनुभव नहीं है उसे इतने बड़े प्रदेश की बागडोर सौंप देना कहाँ तक उचित है वे भूल रहे हैं कि उप्र के पिछले मुख्यमंत्री के पास  किसी प्रकार के प्रशासनिक अनुभव तो क्या कोई राजनैतिक अनुभव भी नहीं था लेकिन  योगी द्वारा किए गए संसदीय कार्यों की समीक्षा करने मात्र से ही उनको अपने प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा।
1998 से लगातार गोरखपुर से सांसद रहे योगी आदित्यनाथ के व्यापक जनाधार और एक प्रखर वक्ता की छवि को भी शायद यह लोग अनदेखा करने की भूल कर रहे हैं।
जब परिवादवाद की देन एक अनुभव हीन मुख्यमंत्री को प्रदेश की बागडोर संभाल सकता है तो योगी को तो 26 वर्ष की उम्र में सबसे कम उम्र के सांसद बनने का गौरव प्राप्त है।
मोदी स्वयं इस बात को स्वीकार कर चुके हैं कि चुनाव की राजनीति और सरकार चलाने की नीति दोनों अलग अलग बातें हैं। एक नेता के रूप में उनके  चुनावी भाषण और एक प्रधानमंत्री के रुप में उनके वक्तव्य एवं कार्यशैली दोनों ही विभिन्न विषय हैं इस बात को पूरे देश ने महसूस किया है।
इसलिए योगी के व्यक्तित्व को उनके द्वारा दिए गए अभी तक के भाषणों और उनके भगवा वस्त्रों की सीमा में बाँधकर परखना केवल संकीर्ण मानसिकता और असुरक्षा की भावना का द्योतक है।
21 वर्ष की अल्पायु में घर परिवार त्याग कर एक योगी बनने का निर्णय उनकी दृढ़ इच्छा शक्ति दर्शाता है। ऐसे समय में जब देश की राजनीति  वंशवाद और परिवारवाद के साये में अपना आस्तित्व तलाश रही है, एक सन्यासी को सत्ता के शीर्ष पर बैठाना एक नई सुबह के साथ अनेकों उम्मीद की किरणों का उजाला फैला रहा है।
आदित्यनाथ को एक योगी के रूप में देखने वाले उनके भीतर के सन्यासी की अनदेखी कैसे कर सकते हैं। उनके व्यक्तित्व को उनके वस्त्रों के रंग में सीमित करने वाले यह कैसे भूल सकते हैं कि जिस दिन एक आदमी सांसारिक विषयों का त्याग करके इन वस्त्रों को धारण करता है वो जात पात से ऊपर उठ जाता है और एक ही धर्म का पालन करता है, ' मानवता '
एक मुख्यमंत्री के रूप में उनके कार्यों को देखे बिना पूर्वाग्रहों के आधार पर उनका आंकलन करना न सिर्फ उनके साथ बल्कि लोकतंत्र के साथ बहुत बड़ा अन्याय होगा।
और अन्त में प्रधानमंत्री का यह कथन तो देश भूला नहीं है कि " हममें अनुभव की कमी हो सकती है, हम गलती कर सकते हैं लेकिन हमारे इरादे गलत नहीं हैं  "
और जब इरादे नेक हों तो नतीजे गलत हो ही नहीं सकते।

डॉ नीलम महेंद्र

Tuesday, 7 March 2017

महिलाओं का संघर्ष तो माँ की कोख से ही शुरु हो जाता है

महिलाओं का संघर्ष तो माँ की कोख से ही शुरु हो जाता है

हमारी संस्कृति में स्त्री को पुरुष की अर्धांगिनी कहा जाता है।
अगर आँकड़ों की बात करें यह तो हमारे देश की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करती हैं।
महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए अनेक कानून और योजनाएं हमारे देश में  बनाई गई हैं लेकिन विचारणीय प्रश्न यह है कि  हमारे देश की महिलाओं की स्थिति में कितना मूलभूत सुधार हुआ है।
चाहे शहरों की बात करें चाहे गांव की सच्चाई यह है कि महिलाओं की स्थिति आज भी आशा के अनुरूप नहीं है। चाहे सामाजिक जीवन की बात हो, चाहे पारिवारिक परिस्थितियों की,
चाहे उनके शारीरिक स्वास्थ्य की बात हो या फिर व्यक्तित्व के विकास की,
महिलाओं का संघर्ष तो माँ की कोख से ही शुरु हो जाता है।
 जैसे ही पता चलता है कि आने वाला बच्चा लड़का नहीं लड़की है, या तो भ्रूण हत्या कर दी जाती है,
और यदि चिकित्सीय अथवा कानूनी कारणों से यह संभव न हो तो, न तो शिशु के आगमन का इंतजार रहता है और न ही गर्भवती महिला के स्वास्थ्य की देखभाल की जाती है।
जब एक स्त्री की कोख में एक अन्य स्त्री के जीवन का अंकुर फूटता है तो दो स्त्रियों के संघर्ष की शुरुआत होती है।
एक संघर्ष उस नवजीवन का जिसे इस धरती पर आने से पहले ही रौंदने की कोशिशें शुरू हो जाती हैं, और दूसरा संघर्ष उस माँ का जो उस जीवन के धरती पर आने का जरिया है।

इस सामाजिक संघर्ष के अलावा वो संघर्ष जो उसका शरीर करता है, पोषण के आभाव में नौ महीने तक पल पल अपने खून अपनी आत्मा से अपने भीतर पलते जीवन को सींचते हुए।
और इस संघर्ष के बीच उसकी मनोदशा को कौन समझ पाता है कि माँ बनने की खुशी, सृजन का आनंद, अपनी प्रतिछाया के निर्माण, उसके आने की खुशी, सब बौने हो जाते हैं ।
सामने अगर कुछ दिखाई देता है तो केवल विशालकाय एवं बहुत दूर तक चलने वाला संधर्ष , अपने स्वयं के ही आस्तित्व का।
और जब यह जीव कन्या के रूप में आस्तित्व में आता है तो भले ही हमारी संस्कृति में कन्याओं को पूजा जाता हो लेकिन अपने घर में कन्या का जन्म  माथे पर चिंता की लकीरें खींचता है, होठों पर मुस्कुराहट की नहीं।
तो जिस स्त्री को देवी लक्ष्मी अन्नपूर्णा जैसे नामों से नवाज़ा जाता है क्या उसे इन रूपों में समाज और परिवार में स्वीकारा भी जाता है?
यदि हाँ तो क्यों उसे कोख में ही मार दिया जाता है?
क्यों उसे दहेज के लिए जलाया जाता है?
क्यों 2.5 से 3 साल तक की बच्चियों का बलात्कार किया जाता है?
क्यों कभी संस्कारों के नाम पर तो कभी रिवाजों के नाम पर उसकी इच्छाओं और उसकी स्वतंत्रता का गला घोंट दिया जाता है?
कमी कहाँ है?
हमारी संस्कृति तो हमें महिलाओं की इज्जत करना सिखाती है।
हमारी पढ़ाई भी स्त्रियों का सम्मान करना सिखाती है।
हमारे देश के कानून भी नारी के हक में हैं ।
तो दोष कहाँ है?
आखिर क्यों जिस सभ्यता के संस्कारों में,
सरकार और समाज सभी में,
एक आदर्शवादी विचारधारा का संचार है,
वह सभ्यता,इस विचारधारा को, इन संस्कारों को अपने आचरण और व्यवहार में बदल नहीं पा रही?
सम्पूर्ण विश्व में 8 मार्च को मनाया जाने वाला महिला दिवस एवं महिला सप्ताह केवल 'कुछ' महिलाओं के सम्मान और कुछ कार्यक्रमों के आयोजन के साथ हर साल मनाया जाता है।
लेकिन इस प्रकार के आयोजनों का खोखलापन तब तक दूर नहीं होगा जब तक इस देश की उस आखिरी महिला के 'सम्मान ' की तो छोड़िये, कम से कम उसके 'स्वाभिमान' की रक्षा के लिए उसे किसी कानून, सरकार, समाज या पुरुष की आवश्यकता नहीं रहेगी।
वह 'स्वयं' अपने स्वाभिमान, अपने सम्मान, अपने आस्तित्व, अपने सपने, अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करने के योग्य हो जाएगी।
अर्थात वह सही मायनों में 'पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर' हो जाएगी।
आज हमारे समाज में यह अत्यंत दुर्भाग्य का विषय है कि कुछ महिलाओं ने स्वयं अपनी 'आत्मनिर्भरता ' के अर्थ को केवल  कुछ भी पहनने से लेकर देर रात तक कहीं भी कभी भी कैसे भी घूमने फिरने की आजादी तक सीमित कर दिया है।
काश कि हम सब यह समझ पांए कि खाने पीने पहनने या फिर न पहनने की आजादी तो एक जानवर के पास भी होती है।
लेकिन आत्मनिर्भरता इस आजादी के आगे होती है,
वो है खुल कर सोच पाने की आजादी,
वो सोच जो उसे , उसके परिवार और समाज को आगे ले जाए,
अपने दम पर खुश होने की आजादी,
वो खुशी जो उसके भीतर से निकलकर उसके परिवार से होते हुए समाज तक जाए,
इस विचार की आजादी कि वह केवल एक देह नहीं उससे कहीं बढ़कर है,
यह साबित करने की आजादी कि अपनी बुद्धि, अपने विचार , अपनी काबलियत अपनी क्षमताओं और अपनी भावनाओं के दम वह अपने परिवार की और इस समाज की एक मजबूत नींव है।
जरूरत है एक ऐसे समाज के निर्माण की जिसमें
यह न कहा जाए कि
"न आना इस देस मेरी लाडो "

डॉ नीलम महेंद्र