Monday, 24 April 2017

भोग से मुक्ति का मार्ग दिखाता है योग

भोग से मुक्ति का मार्ग दिखाता है योग


मानव सभ्यता आज विकास के चरम पर है । भले ही भौतिक रूप में हमने बहुत तरक्की कर ली हो लेकिन शारीरिक आघ्यात्मिक और सामाजिक स्तर पर लगातार पिछड़ते जा रहे हैं।
मनुष्य अपनी बुद्धि का प्रयोग अपने शारीरिक श्रम को कम करने  एवं प्राकृतिक संसाधनों को भोगने के लिए कर रहा है ।
यह आधुनिक भौतिकवादी संस्कृति की देन है कि आज हमने इस शरीर को विलासिता भोगने का एक साधन मात्र समझ लिया है।
भौतिकता के इस दौर में हम लोग केवल वस्तुओं को ही नहीं अपितु एक दूसरे को भी भोगने में लगे  हैं। इसी उपभोक्तावाद संस्कृति के परिणामस्वरूप आज सम्पूर्ण समाज में भावनाओं से ऊपर स्वार्थ हो गए हैं और समाज न सिर्फ नैतिक पतन के दौर से गुजर रहा है बल्कि अल्पायु में ही अनेकों शारीरिक बीमारियों एवं मानसिक अवसाद ने मानव जाति को अपनी गिरफ्त में ले लिया है।
आधुनिक विकास की चाह में हमने प्रकृति के विनाश की राह पकड़ ली है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि हम इस बात को समझें कि हमारे विकास की राह हमारे भीतर से होकर निकलती है, जब हमारे व्यक्तित्व का विकास होगा, हमारी सोच का विकास होगा तो हम प्रकृति के विकास के महत्व को समझेंगे और तभी सभ्यता का सर्वांगीन विकास होगा ।
अंग्रेजी में एक कहावत है, " हेल्दी माइन्ड रेस्ट्स इन अ हेल्दी बोडी " अर्थात एक स्वस्थ मस्तिष्क एक स्वस्थ शरीर में ही रहता है इस आधार पर आधुनिक विज्ञान एक स्वस्थ शरीर की आवश्यकता पर जोर देता है।

लेकिन हमारे ॠषि मुनियों ने से इस मानव शरीर को उसके भौतिक स्वरूप से आगे समझा  और शारीरिक स्वास्थ्य से अधिक मानसिक एवं आध्यात्मिक स्वास्थ्य पर बल दिया। इसी आधार पर मानव जाति के कल्याण के लिए उन्होंने "योग" नामक उस विद्या की रचना की जिसकी ओर आज सम्पूर्ण विश्व अत्यंत उम्मीद से आकर्षित हो रहा है।
यह हर भारतीय के लिए गर्व का विषय है कि 21 जून को सम्पूर्ण विश्व योग दिवस के रूप में मनाता है और इसे न केवल शारीरिक स्वास्थ्य बल्कि तनाव मुक्त होने के विज्ञान के रूप में भी स्वीकार कर चुका है।
योग हमारे शरीर को  हमारी आत्मा के साथ जोड़ता है।  योग अर्थात मिलनाएक होना, एकीकार होना, न सिर्फ ईश्वर से परन्तु स्वयं से  प्रकृति से और सम्पूर्ण सृष्टि से भी।
आज जब पूरी पृथ्वी का संतुलन बिगड़ जाने से सम्पूर्ण जीव जगत के लिए  एक खतरा उत्पन्न हो रहा है ऐसे समय में योग न केवल मनुष्य बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि को एक नई दिशा प्रदान करके नवजीवन देने वाला सिद्ध हो रहा है।
योग को अगर हम केवल शारीरिक व्यायाम समझते हैं तो यह हमारी बहुत बड़ी भूल है। योग वह है जो हमारा साक्षात्कार अपने भीतर के उस व्यक्ति से कराता है जो आज की भागदौड़ वाली जिंदगी में थककर कहीं खो गया है । यह केवल हमारी शारीरिक क्षमताओं का विकास नहीं करता बल्कि हमारी मानसिक एवं आध्यात्मिक शक्तियों को भी जगाता है। योगासन केवल कुछ शारीरिक क्रियाएँ नहीं अपितु पूर्ण रूप से वैज्ञानिक जीवन पद्धति है।
गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है,
  "योग: कर्मसु कौशलम् " अर्थात योग से कर्म में कुशलता आती है क्योंकि योग के द्वारा हम अपने शरीर और मन का दमन नहीं करते अपितु उनका रूपांतरण करते हैं, अपने शरीर एवं मन की शक्तियों को सही दिशा में केन्द्रित करके आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग की ओर अग्रसर करते हैं। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार एक बालक का भविष्य उसकी परवरिश पर आधारित होती है, उसे जैसा माहौल दिया जाता है वैसा ही मनुष्य वह बनता है घर और आसपास का वातावरण उसके व्यक्तित्व के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। किसी शरारती बालक की नकारात्मकता को हम अनुकूल वातावरण देकर प्रेम व अनुशासन के साथ  उसके विचारों एवं क्रियाओं को सकारात्मकता की ओर मोड़ कर उसके एवं उसके परिवार की दिशा ही बदल सकते हैं । वैसे ही हम योग के द्वारा अपनी सोच अपनी शक्तियों को नियंत्रित करके सही दिशा में मोड़ते हैं, उनका रूपांतरण करते हैं।

आज जब सम्पूर्ण विश्व योग के महत्व को समझ रहा है तो हम लोग भी इसे अपने आचरण में  उतार कर न सिर्फ अपने स्वयं के स्वास्थ्य बल्कि अपने आस पास के सम्पूर्ण वातावरण में एक नई ऊर्जा का संचार कर सकते हैं।
जिस प्रकार हमारे शरीर का कोई भी अंग तभी तक जीवित रहता है जब तक कि वह हमारे शरीर से जुड़ा है,कोई भी फूल, पत्ता या फिर फल जब तक अपने पेड़ से जुड़ा है सुरक्षित एवं संरक्षित है उसी प्रकार हमें भी अपनी सुरक्षा के लिए प्रकृति से जुड़ना होगा यह बात योग हमें  सिखाता है। 
योग के दो महत्वपूर्ण अंग हैं  "यम" एवं  "नियम" ।
यम हमें प्रकृति से सामंजस्य करना सिखाता है जबकि नियम हमें स्वयं पर नियंत्रण करना सिखाता है। 
हम प्रकृति को देखते हैं कि  सूर्य चन्द्रमा ॠतुएँ सभी न सिर्फ अपने  नियमों में बन्धे हैं बल्कि एक दूसरे के पूरक भी हैं और अपने अपने चक्र को पूर्ण करने के लिए एक दूसरे पर निर्भर भी हैं उसी प्रकार मानव और प्रकृति न सिर्फ एक दूसरे पर निर्भर हैं बल्कि एक दूसरे के पूरक भी हैं।
और जब एक व्यक्ति योग को अपने जीवन में उतारता है वह केवल  अपनी शारीरिक क्रियाओं एवं इन्द्रियों पर नियंत्रण प्राप्त नहीं करता बल्कि सम्पूर्ण प्रकृति से एकात्मकता के भाव का अनुभव करता है तथा उसके व्यक्तित्व की यह सकारात्मक तरंगें सम्पूर्ण समाज में फैलती हैं , समाज से राष्ट्र में और राष्ट्र से विश्व में।
योग केवल हमारे शरीर को रोगमुक्त नहीं करता बल्कि हमारे मन को भी तनाव मुक्त करता है यह 'भोग ' से मुक्ति का मार्ग दिखाता है।
डॉ नीलम महेंद्र 

Saturday, 1 April 2017

सुख की खोज में हमारी खुशी कंहीं खो गई

सुख की खोज में हमारी खुशी  कंहीं खो गई


ताजा ग्लोबल हैप्पीनैस इंडैक्स में 155 देशों की सूची में भारत 122 स्थान पर है । भारत जैसा देश जहाँ की आध्यात्मिक शक्ति के वशीभूत विश्व भर के लोग शांति की तलाश में खिंचे चले आते हैं , उस देश के लिए यह रिपोर्ट न सिर्फ चौकाने वाली है बल्कि अनेकों प्रश्नों की जनक भी है।
यह समय हम सभी के लिए आत्ममंथन का है कि सम्पूर्ण विश्व में जिस देश कि पहचान अपनी रंगीन संस्कृति और जिंदादिली के लिए है ,जिसके ज्ञान का नूर सारे जहाँ को रोशन करता था आज खुद इस कदर  बेनूर कैसे हो गया कि खुश रहना ही भूल गया?

आज हमारा देश विकास के पथ पर अग्रसर है, समाज के हर वर्ग का जीवन समृद्ध हो रहा है, स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर हुई हैं, भौतिक सुविधाएं अपनी श्रेष्ठता पर हैं, मानव ने विज्ञान के दम पर अपने शारीरिक श्रम और कम्प्यूटर के दम पर अपने मानसिक श्रम को बहुत कम कर दिया है तो फिर ,ऐसा क्यों है  कि सुख की खोज में हमारी खुशी  खो गई? चैन की तलाश में मुस्कुराहट खो गई? क्यों हम समझ नहीं पाए कि यह आराम  हम खरीद  रहे हैं अपने सुकून की कीमत पर ।
अब सुबह सुबह पार्कों में लोगों के झुंड अपने हाथ ऊपर करके जोर जोर से जबरदस्ती हँसने की आवाजें निकालते अवश्य दिखाई देते हैं ठहाकों की   आवाज दूर तक सुनाई देती है लेकिन दिल से निकलने वाली वो हँसी जो आँखों से झाँककर होठों से निकलती थी, वो अब सुनाई नहीं देती।उसने शायद अपना रास्ता बदल लिया,आज हँसी दिमाग के आदेश से मुख से निकलती है और चेहरे की मांसपेशियों पर दिखाई तो देती है लेकिन महसूस नहीं होती।
आधुनिक जीवनशैली के परिणाम स्वरूप आज हमारा भोजन और हमारा जीवन दोनों एक समान हो गए हैं। हेल्दी डाइट के मद्देनजर जिस प्रकार आज हम क्रीम निकले दूध ( स्किम्ड मिल्क ) , जर्दी रहित अंडे, बिना घी के उबला खाना, कम शक्कर और कम नमक वाले भोजन का सेवन करने के लिए मजबूर हैं, वैसे  ही हम जीने के लिए भी मजबूर  हैंन हमारे जीवन में  नमक है न मिठास।
और वैसे ही हमारे रिश्ते भी हो गए हैं बिना प्रेम और परवाह (घी मक्खन) के, स्वार्थ से भरे सूखे और नीरस।
तरक्की की दौड़ में नई संभावनाओं की तलाश में  भावनाओं को  पीछे छोड़ आए और खुशी के भी मोहताज हो गए।
  हम जीवन  जीने के लिए नहीं जी रहे बल्कि सुख सुविधाएँ और स्टेटस हासिल करने के लिए जी रहे हैं ।
दरअसल हम जीवन का उद्देश्य ही भूल गए हैं, इसे जीने से अधिक भोगना चाह रहे हैं  और इस मशीनी युग में हम भी कुछ कुछ मशीनी होते जा रहे  हैं ।
आधुनिक राजनीति विज्ञान की अवधारणा है कि समाज में जैसे जैसे समृद्धि और सम्पन्नता आती है वह खुशहाल होता जाता है। इसी प्रकार अर्थशास्त्र की मूल मान्यता यह है कि " वेल्थ इज द सोर्स आफ हैपीनेस , द मोर यू हैव , द हैपीयर यू आर " अर्थात खुशी का स्रोत धन है, जितना अधिक आपके पास धन है उतने अधिक आप खुश हैं।
लेकिन हम शायद सुखी होने और खुश होने का यह मामूली सा अन्तर नहीं समझ पाए कि सुख पैसे से खरीदा जा सकता है पर खुशी नहीं।
इसी प्रकार हम 'वेल्थ' और 'मनी ' अर्थात् सम्पत्ति और पैसे के बीच के अन्तर को नहीं समझ पाए कि हमारा परिवार हमारे दोस्त हमारे बच्चे हमारा अच्छा स्वास्थ्य हमारा जीवन हमारी सम्पत्ति है और इस सम्पत्ति को हम धन से नहीं खरीद सकते।
अर्थशास्त्र के उपर्युक्त सिद्धांत के विपरीत  जो व्यक्ति धनी हो आवश्यक नहीं कि वह स्वस्थ भी हो, उसके पास शारीरिक सुख देने वाली  भौतिक सम्पत्ति तो हो सकती है  लेकिन ह्रदय और मन को सुख देने वाली वो असली सम्पत्ति भी हो, यह आवश्यक नहीं।
आज विश्व की सबसे प्रतिष्ठित पत्रिकाओं ( टाइम न्यूजवीक द इकोनोमिस्ट वगैरह ) में  इस विषय पर लगातार शोध हो रहे हैं । रिचर्ड लेयर्ड ने भी एक अध्ययन के बाद यह माना कि " यह आवश्यक नहीं कि समाज की प्रसन्नता या खुशी का रिश्ता उसकी आय से हो " ।"अर्थ" को भारतीय दर्शन में भी चार पुरुषार्थों में शामिल किया गया है, धर्म अर्थ काम और मोक्ष , वह इन चार पुरुषार्थों में से एक है लेकिन आज हम उसे एकमात्र पुरुषार्थ समझ बैठे हैं ।
काश कि हम समझ पाते कि एक व्यक्ति हवाई जहाज में बैठकर भी दुखी हो सकता है वहीं दूसरी तरफ एक व्यक्ति खेतों के बीच पगडंडी पर ताजी हवा के झोंकों के बीच साइकिल चलाता हुआ भी खुश हो सकता है।
काश कि हम समझ पाते कि जो खुशी बचपन में तितलियों के पीछे भागने में मिलती थी वो बड़े होकर पैसे के पीछे भागने में कभी नहीं मिलेगी क्योंकि जिस खुशी को हम बाहर ढूँढ रहे हैँ, आलीशान बंगलों महंगी कारों ब्रांडेड कपड़ों में नहीं
दरअसल वो हमारे भीतर ही है।
चूँकि खुशी का कोई भौतिक स्वरूप नहीं है, वो एक भाव है जो दिखाई नहीं देता तो वो इन भौतिक चीजों में  मिलती भी नहीं है। वह मिलती भी उन्हीं भावों में है जो दिखाई नहीं देते ।
हमारी संस्कृति ने हमें शुरु से यह ही सिखाया है कि खुशी त्याग में है,सेवा में है, प्रेम में है मित्रता में है, लेने में नहीं देने में हैकिसी रोते हुए को हँसाने में है, किसी भूखे को खाना खिलाने में है ।
जो खुशी दोस्तों के साथ गली के नुक्कड़ पर खड़े होकर बातें करने में है वो अकेले माल में फर्स्ट डे फर्स्ट शो देखने में भी नहीं है ।
काश कि हम समझ पाते कि मल्टी नैशनल कम्पनियों ने अपने प्रोडक्टस बेचने के लिए और अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए विज्ञापनों द्वारा हमारी संस्कृति हमारी सोच पर बहुत ही नियोजित तरीके से आक्रमण करके हमारे समाज में उपभोक्तावाद संस्कृति को बढ़ावा दिया , जो उनके उत्पाद खरीदे वो माडर्न और जो ना खरीदे वो पिछड़ा । और अगर आपके पास खरीदने के पैसे नहीं हैं तो उधार खरीदिये लेकिन आधुनिकता और उपभोक्तावाद की दौड़ में शामिल रहिए । फिर उस उधार को चुकाने के लिए पैसों के लिए दौड़ें। और आपका एक उधार चुकने से पहले नए फीचर्स के साथ मार्केट में नया प्रोडक्ट लाँच हो जाता है। अब भले ही आप खुद को इस रेस से बाहर रखें आपके बच्चे इस रेस में शामिल हो चुके होते हैं और बच्चों को हारना कभी पसंद नहीं आता तो नया माडल खरीदिए और , और तेज दौड़िए ।
तो यह तो हमें चुनना है कि हम कब तक दौड़ेंगे और कहाँ रुकेंगे।
हम अपनी जरूरतों को पूरा करने मात्र से खुशी का अनुभव कर सकते है लेकिन इच्छाओं का कोई अन्त नहीं होता।
इसलिए जरूरत इस बात को समझने की है कि जहाँ इच्छाओं और अपेक्षाओं का अन्त हो जाता है खुशी वहाँ से शुरू होती है ।
डॉ नीलम महेंद्र