Monday, 31 July 2017

आजादी आपनी सोच में लायें

आजादी आपनी सोच में लायें


भारत हर साल 15 अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस मनाता है।
यह दिन जहां हमारे आजाद होने की खुशी लेकर आता है वहीं इसमें भारत के खण्ड खण्ड होने का दर्द भी छिपा होता है।
वक्त के गुजरे पन्नों में भारत से ज्यादा गौरवशाली इतिहास किसी भी देश का नहीं हुआ।
लेकिन भारतीय उपमहाद्वीप से ज्यादा सांस्कृतिक राजनैतिक सामरिक और आर्थिक हमले भी इतिहास में शायद किसी देश पर नहीं हुए।
और कदाचित किसी देश के इतिहास के साथ इतना अन्याय भी कहीं नहीं हुआ।
वो देश जिसे इतिहास में 'विश्व गुरु' के नाम से जाना जाता हो, उस देश के प्रधानमंत्री को आज  "मेक इन इंडिया" की शुरूआत करनी पड़रही है।
'सोने की चिड़िया' जैसे नाम जिस देश को कभी दिया गया हो, उसका स्थान आज विश्व के विकासशील देशों में है।
शायद हमारा वैभव और हमारी  समृद्धि की कीर्ति ही हमारे पतन का कारण भी बनी।
भारत के ज्ञान और सम्पदा के चुम्बकीय आकर्षण से विदेशी आक्रमणता लूट के इरादे से इस ओर आकर्षित हुए।
वे आते गए और हमें लूटते गए।
हर आक्रमण के साथ चेहरे बदलते गए लेकिन उनके इरादे वो ही रहे
वो मुठ्ठी भर होते हुए भी हम पर हावी होते गए
हम वीर होते हुए भी पराजित होते गए
क्योंकि हम युद्ध कौशल से जीतने की कोशिश करते रहे
और वे जयचंदों के छल से हम पर विजय प्राप्त करते रहे
हम युद्ध भी ईमानदारी से लड़ते थे और वे किसी भी नियम को नहीं मानते थे
इतिहास गवाह है, हम दुशमनों से ज्यादा अपनों से हारे हैं शायद इसीलिए किसी ने कहा है,
" हमें तो अपनों ने लूटा , ग़ैरों में कहाँ दम था,
हमारी कश्ती वहाँ डूबी जहाँ पानी कम था  "
जो देश अपने खुद की गलतियों से नहीं सीखा पाता वो स्वयं इतिहास बन जाता है
हमें भी शायद अपनी इसी भूल की सज़ा मिली जो हमारी वृहद सीमाएं आज इतिहास बन चुकी हैं।
वो देश जिसकी सीमाएं उत्तर में हिमालय दक्षिण में हिन्द महासागर पूर्व में इंडोनेशिया और पश्चिम में ईरान तक फैली थीं ,आज  सिमट कर रह गईं और इस खंडित भारत को हम आजाद भारत कहने के लिए विवश हैं।
अखंड भारत का स्वप्न सर्वप्रथम आचार्य चाणक्य ने देखा था और काफी हद तक चन्द्रगुप्त के साथ मिलकर इसे यथार्थ में बदला भी था। तब से लेकर लगभग 700 ईसवी तक भारत ने इतिहास का स्वर्णिम काल अपने नाम किया था।
लेकिन 712 ईस्वी में सिंध पर पहला अरब आक्रमण हुआ फिर 1001 ईस्वी से महमूद गजनी , चंगेज खान ,अलाउद्दीन खिलजी ,मुहम्मद तुगलक ,तैमूरलंग , बाबर और उसके वंशजों द्वारा भारत पर लगातार हमले और अत्याचार हुए।
1612 ईस्वी में जहाँगीर ने अंग्रेजों को भारत में व्यापार करने की इजाज़त दी।
यहाँ इतिहास ने एक करवट ली और व्यापार के बहाने अंग्रेजों ने पूरे भारत पर अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया।
लेकिन इतने विशाल देश पर नियंत्रण रखना इतना आसान भी नहीं था यह बात उन्हें समझ में आई 1857 की क्रांति से ।
इसलिए उन्होंने "फूट डालो और राज करो" की नीति अपनाते हुए धीरे धीरे भारत को तोड़ना शुरू किया।
1857 से 1947 के बीच अंग्रेजों ने भारत को सात बार तोड़ा ।
1876 में अफगानिस्तान
1904 में नेपाल
1906 में भूटान
1914 में तिब्बत
1935 में श्रीलंका
1937 में म्यांमार
1947 में बांग्लादेश और पाकिस्तान
लेकिन हम भारतवासी अंग्रेजों की इस कुटिलता को नहीं समझ पाए कि उन्होंने हमारे देश की भौगोलिक सीमाओं को ही नहीं तोड़ा, बल्कि हमारे समाज, हमारी भारतीयता, इस देश की आत्मा को भी खण्डित कर गए। 
जाते जाते वे इस बात के बीज बो गए कि भविष्य में भी भारत कभी एक न रह पाए।बहुत ही चालाकी से वे हिन्दू समाज को जाती क्षेत्र और दल के आधार पर जड़मूल तक विभाजित कर गए।
जरा सोचिए कि क्यों जब हमसे आज हमारा परिचय पूछा जाता है तो हमारा परिचय ब्राह्मण बनिया ठाकुर मराठी कायस्थ दलित कुछ भी हो सकता है लेकिन भारतीय नहीं होता ?
अंग्रेजों के इस बीज को खाद और पानी दिया हमारे नेताओं ने जो देश के विकास की नहीं वोट बैंक की राजनीति करते आ रहे हैं।
जब  इक्कीसवीं सदी के इस ऊपर से, एक किन्तु भीतर ही भीतर विभाजित भारत की यह तस्वीर अंग्रेज देखते होंगे तो मन ही मन अपनी विजय पर गर्व महसूस करते होंगे।
हम भारत के लोग 15 अगस्त को किस बात का जश्न मनाते हैं?
आजादी का?
लेकिन सोचो कि हम आजाद कहाँ हैं?
हमारी सोच आज भी गुलाम है !
हम गुलाम हैं अंग्रेजी सभ्यता के जिसका अन्धानुकरण हमारी युवा पीढ़ी कर रही है।
हम गुलाम हैं उन जातियों के जिन्होंने हमें आपस में बाँटा हुआ है और हमें एक नहीं होने देती ।
हम गुलाम हैं अपनी सरकार की उन नीतियों की जो इस देश के नागरिक को उसके धर्म और जाति के आधार पर आंकती हैं उसकी योग्यता के आधार पर नहीं
हम गुलाम हैं उस तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के जिसने हमें बाँटा हुआ है धर्म के नाम पर
हम गुलाम हैं हर उस सोच के जो हमारे समाज को तोड़ती है और हमें एक नहीं होने देती।
हम आज भी गुलाम हैं अपने निज स्वार्थों के जो देश हित से पहले आते हैं।
अगर हमें वाकई में आजादी चाहिए तो सबसे पहले अपनी उस सोच अपने अहम से हमें आजाद होना होगा जो हमें अपनी पहचान "केवल भारतीय" होने से रोक देती है।
हमें आजाद होना पड़ेगा उन स्वार्थों से जो देश हित में रुकावट बनती हैं।
अब वक्त आ गया है कि हम अपनी आजादी को भौगोलिक अथवा राजनैतिक दृष्टि तक सीमित न रखें।
हम अपनी आज़ादी अपनी सोच में लाएँ । जो सोच और जो भौगोलिक सीमाएं हमें अंग्रेज दे गए हैं उनसे बाहर निकलें।
विश्व इतिहास से सीखें कि जब जर्मनी का एकीकरण हो सकता है, जब बर्लिन की दीवार गिराई जा सकती है, जब इटली का एकीकरण हो सकता है, तो भारत का क्यों नहीं?
चन्द्रशेखर आजाद भगतसिंह सुखदेव महारानी लक्ष्मीबाई मंगल पांडे रामप्रसाद बिस्मिल सुभाष चंद्र बोस अश्फाकउल्लाह खान ने अपनी जान अखंड भारत के लिए न्योछावर की थी खण्डित भारत के लिए नहीं।
जिस दिन हम भारत को उसकी खोई हुई अखंडता लौटा देंगे उस दिन हमारी ओर से हमारे वीरों को सच्चे श्रद्धांजलि अर्पित होगी।

डॉ नीलम महेंद्र

Thursday, 27 July 2017

धनुष के तीरों से निकले कुछ सवाल

धनुष के तीरों से निकले कुछ सवाल 

भ्रष्टाचार वो बीमारी है जिसकी शुरूआत एक व्यक्ति के नैतिक पतन से होती और अन्त उस राष्ट्र के पतन पर होता है , एक कटु सत्य।
जब सम्पूर्ण राष्ट्र की समृद्धि उस देश के हर नागरिक की समृद्धि का कारण बने तो वो राष्ट्र सम्पूर्ण विश्व के लिए एक उदाहरण बन जाता है 
 जब भ्रष्टाचार एक व्यक्ति की समृद्धि का कारण बने तो कालांतर में वो राष्ट्र विश्व के लिए  एक आसान लक्ष्य बन जाता है ।
भ्रष्ट आचरण के बीज एक व्यक्ति से परिवार में परिवार से समाज में और समाज से सम्पूर्ण  राष्ट्र में फैल जाते हैं।
यह वो पोधा है जो बहुत ही आसानी  और शीघ्रता से न सिर्फ स्वयं फलने फूलने लगता है अपितु अपने पालनहार के लिए भी उतनी ही आसानी से समृद्धि के द्वार खोल देता है।
लेकिन इसके बीज की एक खासियत यह होती है कि यह एक बार जिस स्थान पर पनप जाता है  उसे  हमेशा के लिए ऐसा बंजर कर देता है कि फिर उस पर मेहनत ईमानदारी स्वाभिमान जैसे फूल खिलने बन्द हो जाते हैं।
और इस बीज के सहारे एक व्यक्ति जितना समृद्ध होता जाता है परिवार के संस्कार उतने ही कमजोर होते जाते हैं
परिवार में संस्कारों के ह्रास से समाज की नींव कमजोर पड़ने लगती है
समाज के कमजोर पड़ते ही राष्ट्र पिछड़ने लगता है

कुछ खबरें ऐसी होती हैं जो हमें यह सब सोचने के लिए मजबूर कर देती हैं।
जब देश की सुरक्षा और देश की सुरक्षा करने वाले जांबाजों की सुरक्षा के साथ ही खिलवाड़ किया जा रहा हो तो क्या अब समय नहीं आ गया कि हम इस बात की गंभीरता को समझें कि इस देश में भ्रष्टाचार की जो जड़े अभी तक सरकारी कार्यालयों  नेताओं और ब्यूरोक्रेट्स तक फैली हुई थीं अब सेना के भीतर भी पहुँच गई हैं ?
जिस भ्रष्टाचार ने अब तक इस देश के आम आदमी के जीवन को दुश्वार बनाया हुआ था वो आज सेना के जवान के जीवन को दाँव पर लगा रहा है?
जो भ्रष्टाचार इस देश की जड़े खोद रहा था आज देश की सीमाओं और सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने से भी नहीं चूक रहा?
बात केवल इतनी नहीं है कि मेक इन इंडिया के तहत बनने वाली देश की पहली स्वदेशी तोप में लगने वाले कलपुर्जे चीनी निकले जिसका पता तब चला जब परीक्षण के दौरान एक बार बैरल बर्सट हो गया और दो बार तोप का मजल फट गया।
मुद्दा इससे कहीं गंभीर है
बात यह है कि गन कैरिज फैक्टरी,जीसीएफ का एक महत्वपूर्ण एवं महत्त्वकांशी प्रोजेक्ट है, स्वदेशी बोफोर्स "धनुष" का निर्माण।
वो बोफेर्स जिसने कारगिल युद्ध में भारतीय सेना को पाकिस्तानी सेना से टक्कर लेने एवं युद्ध जीतने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
वो धनुष जो दुनिया की शीर्ष पांच तोपों में शामिल है, बोफोर्स बीओ5 (स्वीडन) , एम 46 एस(इजरायल), जीसी 45(कनाडा), नेक्सटर (फ्रांस) , धनुष (भारत)
लेकिन जब देश की सुरक्षा से जुड़े ऐसा कोई संवेदनशील एवं महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट विवाद के कारण जांच की सीमा में आ जाता है तो न सिर्फ पूरे तंत्र की विश्वसनीयता शक के दायरे में आ जाती है बल्कि पूरी निर्माण प्रक्रिया जो अब तक तोपों को बनाने में लगी थी और तेजी से आगे बढ़ रही थी अब अचानक सभी कागजातों के सील होने के कारण थम जाती है और पूरा प्रोजेक्ट पीछे चला जाता है।
दरअसल जीसीएफ ने दिल्ली की जिस कम्पनी "सिद्ध सेल्स" को इन कलपुर्जों को बनाने का ठेका दिया था उसने एक सर्टिफ़िकेट दिया था कि यह कलपर्जे  "सीआरबी" नामक जर्मनी कम्पनी में निर्मित हैं।
इतना ही नहीं उन पर  "सीआरबी मेड इन जर्मनी" की सील भी लगी थी।
लेकिन अब सीबीआई की जांच में जो भी तथ्य सामने आ रहे हैं वे न सिर्फ चौंकाने वाले हैं बल्कि बेहद गंभीर एवं चिंताजनक भी है।
पता चला है कि जब यह पुर्जे जीसएफ ने टेस्ट किए थे तब भी इनके डायमेन्शन में गड़बड़ के बावजूद इन्हें स्वीकार कर लिया गया था।
जैसे जैसे जांच की परतें खुलती जा रही है इस मामले की जड़ों की गहराई भी बढ़ती जा रही है।
क्योंकि जो सर्टिफ़िकेट सिद्ध सेल्स ने जीसीएफ को दिया था वो फर्जी था , जर्मनी की उक्त कम्पनी ऐसे कलपुर्जों  निर्माण ही नहीं करती।
लेकिन इससे भी अधिक चिंता का विषय यह है कि सिद्ध सेल्स ने पूरी दुनिया में से चीन को ही क्यों चुना अपने ही देश की सेना को नकली माल सप्लाई करने के लिए?
इन नकली पुर्जों का निर्माण चीन के हेनान में स्थित "साइनो यूनाइटेड इन्डस्ट्री लूयांग चाइन" में हुआ था।
इसके अलावा सीबीआई को चीन और सिद्ध सेल्स के बीच कई ई मेल के आदान प्रदान का रिकॉर्ड भी मिला है।
तो दिल्ली की जिस कम्पनी ने इस पूरे फर्जीवाड़े को अंजाम दिया उसका यह आचरण किस दायरे में है?
चार सौ बीसी के या फिर देशद्रोह के?
सेना के जिन अफसरों की निगरानी में यह प्रोजेक्ट था उनसे यह नादानी में हुआ था फिर जानबूझकर?
उन्हें कम्पनी द्वारा धोखा दिया गया या फिर उन्होंने देश को धोखा दिया?
जिस सेना पर पूरा देश गर्व करता है उस सेना के ऐसे महत्वपूर्ण पदों पर न तो नादानी की गुंजाइश होती है और न ही विश्वासघात की।
दोनों के ही अंजाम घातक होते हैं ।
हमारा सैनिक अगर मातृभूमि की रक्षा में दुश्मन से लड़ते लड़ते वीरगति को प्राप्त हो तो उसे अपनी शहादत पर गर्व होता है लेकिन  जब एक देशभक्त सैनिक अपने ही किसी साथी की गद्दारी के कारण अपने प्राणों की बलि देता है तो उसे अपने प्राणों का नहीं, दुख इस बात का  होता है कि अब मेरा देश  असुरक्षित हाथों में है।
वो सैनिक जो अपनी जवानी देश की सीमाओं की रक्षा में लगा देता है,
वो पत्नी जो अपनी जिंदगी  सरहद की निगरानी करते पति पर गर्व करते हुए बिता देती है,
वो बच्चे जो अपने पिता के इंतजार में बड़े हो जाते हैं
और वो बूढ़ी आँखें जो अपने बेटे के इंतजार में दम तोड़ देती हैं
क्या इस देश के सर्वोच्च पदों पर बैठे नेता और कठिन से कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं को पास करके इन पदों पर आसीन अधिकारी कभी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़े ऐसे ही किसी सैनिक के परिवार से मिलकर उनके कुछ बेहद मासूम और सरल से सवालों के जवाब दे पाएंगे?

डॉ नीलम महेंद्र

Tuesday, 25 July 2017

कश्मीर में शान्ति बहाली ही शहीदों को सच्ची श्रधांजलि होगी

कश्मीर में शान्ति बहाली ही शहीदों को सच्ची श्रधांजलि होगी

26 जुलाई 2017, 18 वाँ कारगिल विजय दिवस
वो विजय जिसका मूल्य वीरों के रक्त से चुकाया गया,
वो दिवस जिसमें देश के हर नागरिक की आँखें विजय की खुशी से अधिक हमारे  सैनिकों की शहादत के लिए सम्मान में नम होती हैं ।
1999 के बाद से भारतीय इतिहास में जुलाई का महीना हम भारतीयों के लिए कभी भी केवल एक महीना नहीं रहा  और इस महीने की 26 ता० कभी अकेली नहीं आई।
26 जुलाई की तारीख़ अपने साथ हमेशा भावनाओं का सैलाब लेकर आती है।
गर्व का भाव उस विजय पर जो हमारी सेनाओं ने हासिल की थी
श्रद्धा का भाव उन अमर शहीदों के लिए जिन्होंने तिरंगे की शान में हँसते हँसते अपने प्राणों की आहुति दे दी
आक्रोश का भाव उस दुश्मन के लिए जो अनेकों समझौतों के बावजूद 1947 से आज तक तीन बार हमारी पीठ में छुरा घोंप चुका है।
क्रोध का भाव उस स्वार्थी राजनीति, सत्ता और सिस्टम के लिए जिसका खून अपने ही देश के जवान बेटों की  बली के बावजूद नहीं खौलता कि इस समस्या का कोई ठोस हल नहीं निकाल सकें।
बेबसी का भाव उस अनेक अनुत्तरित प्रश्नों से मचलते ह्रदय के लिए कि क्यों आज तक हम अपनी सीमाओं और अपने सैनिकों की रक्षा करने में सक्षम नहीं हो पाए ?
उस माँ के सामने असहाय होने का भाव जिसने अपने जवान बेटे को तिरंगे में देख कर भी आँसू रोक लिए क्योंकि उसे अपने बेटे पर अभिमान था कि वह अमर हो गया
उस पिता के लिए निशब्दता और निर्वात का भाव जो अपने भीतर के खालीपन को  लगातार देशाभिमान और गर्व से भरने की कोशिश करता है।
उस पत्नी से क्षमा का भाव जिसके घूँघट में छिपी आँसुओं से भीगी आँखों से आँख मिलाने की हिम्मत  आज किसी भी वीर में नहीं।
26 जुलाई अपने साथ यादें लेकर आती है टाइगर हिलतोलोलिंग, पिम्पल काम्पलेक्स जैसी पहाड़ियों की।
कानों में गूँजते  हैं कैप्टन सौरभ कालिया, विक्रम बत्रा,मनोज पाण्डे,संजय कुमार जैसे नाम जिनके बलिदान के आगे नतमस्तक है यह देश।
12 मई 1999 को एक बार फिर वो हुआ जिसकी अपेक्षा नहीं थी
दुनिया के सबसे ऊंचे युद्ध क्षेत्रों में लड़ी गई थी वो जंग
160 किमी के कारगिल क्षेत्र एलओसी पर चला था वो युद्ध
30000 भारतीय सैनिकों ने दुश्मन से लोहा लिया
527 सैनिक व सैन्य अधिकारी शहीद हुए
1363 से अधिक घायल हुए
18000 ऊँची पहाड़ी पर 76 दिनों तक चलने वाला यह युद्ध भले ही 26 जुलाई 1999 को  भारत की विजय की घोषणा के साथ समाप्त हो गया लेकिन पूरा देश उन वीर सपूतों का ॠणी हो गया जिनमें से अधिकतर 30 वर्ष के भी नहीं थे।
" मैं या तो विजय के बाद भारत का तिरंगा लहरा के आऊँगा या फिर उसी तिरंगे में लिपटा
आऊँगा "  शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा के यह शब्द इस देश के हर युवा के लिए प्रेरणा स्रोत हैं।
कारगिल का  पाइन्ट 4875 अब विक्रम बत्रा टाप नाम से जाना जाता है जो कि उनकी वीरता की कहानी कहता है।

और 76 दिन के संघर्ष के बाद जो तिरंगा कारगिल की सबसे ऊँची चोटी पर फहराया गया था वो ऐसे ही अनेक नामों की विजय गाथा है।
स्वतंत्रता का  जश्न वो पल लेकर आता है जिसमें कुछ पाने की खुशी से अधिक बहुत कुछ खो देने से उपजे खालीपन का एहसास भी होता है।
लेकिन इस विजय के 18 सालों बाद आज फिर कश्मीर सुलग रहा है।
आज भी कभी हमारे सैनिक सीमा रेखा पर तो कभी कश्मीर की वादियों में दुश्मन की ज्यादतियों के शिकार हो रहे हैं।
युद्ध में देश की आन बान और शान के लिए वीरगति को प्राप्त होना एक सैनिक के लिए गर्व का विषय है लेकिन बिना युद्ध के कभी सोते हुए सैनिकों के कैंप पर हमला तो कभी आतंकवादियों से मुठभेड़ के दौरान अपने ही देशवासियों के हाथों पत्थरबाजी का शिकार होना कहाँ तक उचित है?
अभी हाल ही के ताजा घटनाक्रम में जम्मू कश्मीर पुलिस के डीएसपी मोहम्मद अयूब पंडित को शब ए कद्र के जुलूस के दौरान भीड़ ने पीट पीट कर मार डाला।
इससे पहले 10 मई 2017 को मात्र 23 वर्ष के आर्मी  लेफ्टिनेन्ट उमर फैयाज़ की शोपियाँ में आतंकवादियों द्वारा हत्या कर दी गई थी जब वे छुट्टियों में अपने घर आए थे, अभी छ महीने पहले ही वे सेना में भर्ती हुए थे।
इस प्रकार की घटनाओं से पूरे देश में आक्रोश है।

हमारे देश की सीमाओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी हमारे सैनिकों की है जिसे वे बखूबी निभाते भी हैं लेकिन हमारे सैनिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी हमारी सरकार की है।
हमारी सरकारें चाहे केंद्र की हो चाहे राज्य की , क्या वे अपनी जिम्मेदारी निभा रही हैं?
अगर हाँ तो हमारे सैनिक देश की सीमाओं के भीतर ही वीरगति को क्यों प्राप्त हो रहे हैं?
क्या सरकार की जिम्मेदारी खेद व्यक्त कर देने और पीड़ित परिवार को मुआवजा देने भर से समाप्त हो जाती है?
कब तक बेकसूर लोगों की बली ली जाती रहेगी?
समय आ गया है कि कश्मीर में चल रहे इस छद्म युद्ध का पटाक्षेप हो।
सालों से सुलगते कश्मीर को अब एक स्थायी हल के द्वारा शांति की तलाश है।
 जिस दिन कश्मीर की वादियाँ फिर से केसर की खेती से लहलहाते हुए खेतों से  खिलखिलाएँगी, जिस दिन कश्मीर के  बच्चों के हाथों में पत्थर नहीं लैपटॉप होंगे और कश्मीर का युवा वहाँ के पर्यटन उद्योग की नींव मजबूत करने में अपना योगदान देकर स्वयं को देश की मुख्य धारा से जोड़ेगा उस दिन कारगिल शहीदों को हमारे देश की ओर से सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
डॉ नीलम महेंद्र